By नीरज कुमार दुबे | Sep 19, 2026
बांग्लादेश को आखिरकार भारत की जरूरत का एहसास होने लगा है! जिस समय नई दिल्ली ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में आमंत्रित कर पड़ोसी संबंधों को आगे बढ़ाने का अवसर दिया, उस समय ढाका ने दूरी बनाए रखना पसंद किया। शायद उसे लगा कि दिल्ली जाने से अच्छा है इस्लामाबाद या मक्का जाया जाये और मक्का पैक्ट में शामिल हुआ जाये। लेकिन मक्का में हूतियों का हमला और मक्का पैक्ट की हवा निकलते देख बांग्लादेश को शायद अपनी गलती का अहसास होने लगा है। अब बांग्लादेश के सामने दो तस्वीरें हैं। एक ओर भारत में आयोजित ब्रिक्स की शानदार सफलता की पूरी दुनिया में गूंज उसे सुनाई दे रही है और दूसरी तरफ 'एक पर हमला सब पर हमला' की घोषित नीति के बावजूद सऊदी अरब की मदद के लिए नहीं उतरने की पाकिस्तान और तुर्की की वादाखिलाफी दिखाई दे रही है। इसके चलते तस्वीर अब तेजी से बदलती दिखाई दे रही है। ब्रिक्स सम्मेलन संपन्न होने के ठीक बाद भारत तथा बांग्लादेश के बीच उच्चस्तरीय बातचीत फिर शुरू हो गई है। बताया जा रहा है कि दोनों देश नवंबर में तारिक रहमान की भारत यात्रा की संभावित तारीखों पर विचार कर रहे हैं। यह पिछले कुछ समय से तनावपूर्ण चल रहे भारत-बांग्लादेश संबंधों को फिर पटरी पर लाने की कोशिश है।
यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत-बांग्लादेश संबंध वर्ष 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद गंभीर तनाव से गुजरे हैं। हसीना के भारत में रहने और उनके प्रत्यर्पण की मांग को लेकर ढाका लगातार दबाव बनाता रहा है। अगस्त में शेख हसीना की ओर से मीडिया कार्यक्रम को संबोधित करने के बाद यह तनाव और बढ़ गया। बांग्लादेश की मौजूदा सरकार चाहती है कि शेख हसीना का प्रत्यर्पण हो और उनकी सार्वजनिक बयानबाजी पर रोक लगे। इस पर भारत की ओर से फिलहाल यही कहा गया है कि प्रत्यर्पण अनुरोध की जांच की जा रही है। साथ ही नई दिल्ली व्यापक संबंधों को पारस्परिक हितों और पारस्परिकता के आधार पर आगे बढ़ाने पर जोर दे रही है।
दोनों पक्ष इस टकराव के बीच ऐसा रास्ता खोज रहे हैं जिसमें किसी एक मुद्दे के कारण दोनों देशों के व्यापक हित प्रभावित न हों। यही कारण है कि नवंबर में प्रस्तावित तारिक रहमान यात्रा को दोनों राजधानियां बेहद महत्वपूर्ण मान रही हैं। रणनीतिक स्तर पर देखें तो भारत और बांग्लादेश के बीच मजबूत संबंध केवल दो सरकारों का मामला नहीं है। बंगाल की खाड़ी, पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, नदी जल, व्यापार, संपर्क और क्षेत्रीय सहयोग, इन सभी मोर्चों पर दोनों देशों के हित एक-दूसरे से जुड़े हैं।
आर्थिक मोर्चे पर भी बातचीत का एजेंडा महत्वपूर्ण है। दोनों देशों के अधिकारी द्विपक्षीय व्यापार को नियमित करने के उपायों पर विचार कर रहे हैं, क्योंकि राजनीतिक अस्थिरता के कारण व्यापार प्रभावित हुआ है। इसके साथ ही गंगा जल संधि के नवीनीकरण का प्रश्न भी एजेंडे में शामिल है। जल संसाधन से जुड़े मुद्दे दोनों देशों के लिए अत्यंत संवेदनशील हैं और इनके समाधान का सीधा प्रभाव सीमावर्ती क्षेत्रों तथा करोड़ों लोगों के हितों पर पड़ता है।
इसके अलावा, ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में तारिक रहमान को आमंत्रण मिलना भी इस पूरे घटनाक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बांग्लादेश को यह निमंत्रण इसलिए दिया गया था क्योंकि वह बहुक्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग के लिए बंगाल की खाड़ी पहल यानि बिम्सटेक का वर्तमान अध्यक्ष है। इसके बावजूद बांग्लादेश ने सम्मेलन में अपना प्रतिनिधि नहीं भेजा। उसके विदेश मंत्रालय के राज्य मंत्री ने तब कहा था कि ढाका भारत के साथ संबंधों को नए सिरे से व्यवस्थित करना चाहता है और इसके लिए उपयुक्त समय पर द्विपक्षीय यात्रा को प्राथमिकता देगा। अब वही द्विपक्षीय रास्ता सक्रिय होता दिखाई दे रहा है।
इस पूरी कहानी का एक और महत्वपूर्ण पहलू तारिक रहमान और भारत के बीच पुराने संपर्क हैं। बताया जा रहा है कि तारिक रहमान ने लंदन में निर्वासन के वर्षों के दौरान भी भारत से संपर्क बनाए रखा था। फरवरी 2024 में उनके एक दूत ने नई दिल्ली आकर भारत का रुख समझने की कोशिश की थी। इससे संकेत मिलता है कि मौजूदा संपर्क अचानक शुरू नहीं हुए, बल्कि इनके पीछे लंबे समय से चल रही राजनीतिक और कूटनीतिक बातचीत की एक पृष्ठभूमि मौजूद है।
हम आपको याद दिला दें कि 2018 में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल नई दिल्ली आया था। उस यात्रा का उद्देश्य भारत के प्रति पार्टी की नीति में सुधार करना था और पार्टी नेतृत्व ने यह स्वीकार किया था कि भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण नीति गलत दिशा में थी। 2024 के चुनाव से पहले भी पार्टी के वरिष्ठ नेता नई दिल्ली पहुंचे थे और भारत से बांग्लादेश की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के समर्थन की अपील की थी।
इसलिए नवंबर में तारिक रहमान की संभावित भारत यात्रा उस प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें ढाका और नई दिल्ली अपने संबंधों में आई खटास को पीछे छोड़कर व्यावहारिक हितों पर लौटने की कोशिश कर रहे हैं। बांग्लादेश के लिए भारत के साथ स्थिर संबंध व्यापार, जल, सीमा, संपर्क और सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं, जबकि भारत के लिए बांग्लादेश पूर्वी सीमा और बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ोसी है।
हालांकि गंगा जल संधि पर अब भारत-बांग्लादेश संबंधों की अगली बड़ी परीक्षा होने वाली है। हम आपको बता दें कि 1996 में हुई तीस वर्ष की यह संधि दिसंबर 2026 में समाप्त हो रही है और ढाका ने इसके नवीनीकरण के लिए बातचीत की मांग पहले ही रख दी है। बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री शाहिदुद्दीन चौधरी अनी ने यहां तक कहा है कि नए समझौते में जल की उपलब्धता की गारंटी वाली धारा होनी चाहिए और अपने जल अधिकारों की रक्षा के लिए बांग्लादेश अंतरराष्ट्रीय मंचों का रुख भी कर सकता है। दूसरी ओर भारत में सत्तारुढ़ गठबंधन एनडीए के महत्वपूर्ण घटक जनता दल यूनाइटेड के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने संधि को दोबारा लागू करने की बजाय दिसंबर में इसे समाप्त करने की मांग की है और बिहार के हिस्से के पानी को लेकर गंभीर आपत्ति जताई है। हालांकि केंद्र ने अभी संधि के भविष्य पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने जनता दल यूनाइटेड को आश्वासन दिया है कि बिहार की पेयजल और औद्योगिक जरूरतों को ध्यान में रखकर उचित निर्णय किया जाएगा। ऐसे में तारिक रहमान की संभावित भारत यात्रा के दौरान गंगा जल संधि सबसे कठिन मुद्दों में से एक बन सकती है। दिलचस्प बात यह है कि बांग्लादेश तत्काल बातचीत और जल की गारंटी चाहता है, जबकि भारत के भीतर ही बिहार के हितों को लेकर संधि की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। साथ ही विशेषज्ञों का कहना है कि 1996 के बाद नदी की जलविज्ञान संबंधी परिस्थितियां, वर्षा का स्वरूप, जलवायु परिवर्तन और ऊपरी हिस्सों में पानी की बढ़ती मांग काफी बदल चुकी है; इसलिए अगला समझौता हुआ तो वह पुराने प्रावधानों की पुनरावृत्ति न होकर नई परिस्थितियों के अनुरूप हो सकता है।
बहरहाल, तारिक रहमान की नवंबर में होने वाली संभावित भारत यात्रा इसी परीक्षा का अगला बड़ा पड़ाव होगी। यदि दोनों पक्ष किसी मध्य मार्ग पर पहुंचते हैं, तो यह संबंधों में नई शुरुआत का आधार बन सकता है। फिलहाल सबसे बड़ा संकेत यही है कि जिस संवाद पर विराम लगा था, वह फिर शुरू हो चुका है और इस बार बातचीत का केंद्र टकराव नहीं, बल्कि संबंधों को फिर से व्यवस्थित करने की कोशिश है।
-नीरज कुमार दुबे