Dalai Lama Birthday: चीन के धोखे से Nehru ने बचाया, कैसे India बना Dalai Lama के Mission-Tibet की कर्मभूमि

By अनन्या मिश्रा | Jul 06, 2026

बौद्ध धर्म के आध्यात्मिक प्रमुख दलाई लामा आज यानी की 06 जुलाई को अपना 91 जन्मदिन मना रहे हैं। भले ही वह खुद को एक साधारण भिक्षु कहते हैं। लेकिन पिछले 60 सालों से ज्यादा वह दृढ़ विश्वास के साथ तिब्बत के लोगों और उनके हितों के लिए काम करते आए हैं। वह अपने लोगों के हितों को अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में बनाए रखने में कामयाब रहे हैं। दलाई लामा के इस मिशन की कार्यभूमि भारत रहा है। तो आइए जानते हैं उनके जन्मदिन के मौके पर दलाई लामा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...

क्यों छोड़ना पड़ा तिब्बत

चीन ने साल 1950 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया। इस कब्जे को चीन ने 'शांतिपूर्ण मुक्ति' कहा। वहीं किशोर दलाई लामा ने कुछ समय बाद राजनीतिक भूमिका निभाई। दलाई लामा ने माओत्से तुंग और अन्य चीनी नेताओं से मिलने के लिए बीजिंग यात्रा की। जिसके 9 साल बाद इस डर से कि कहीं उनका अपहरण न कर लिया जाए, तिब्बत में एक बड़े विद्रोह को बढ़ावा मिला। तिब्बत में किसी भी तरह के विद्रोह को दबाने के लिए चीनी सेना ने वहां पर जुल्म किए।

फिर 10 मार्च 1959 को 23 साल के दलाई लामा को चीनी जनरल ने डांस परफार्मेंस के लिए न्योता दिया। लेकिन बिना किसी बॉडीगार्ड के। जिससे तिब्बती लोग अपने आध्यात्मिक नेता के किडनैप होने को लेकर अधिक सतर्क हो गए। दलाई लामा के हजारों तिब्बती समर्थक डांस परफार्मेंस के दिन उनके महल के बाहर जमा होकर विरोध प्रदर्शन करने लगे। साथ ही यह अफवाह फैल गई कि चीनी सेना कभी भी महल पर हमला कर सकती है।

भारत ने किया स्वागत

जिसके बाद 17 मार्च 1959 की रात में दलाई लामा सैनिक के वेश में, उनका परिवार और कई शीर्ष अधिकारी महल से भाग निकले। इससे पहले ही उन्होंने ल्हासा में भारतीय वाणिज्य दूत से भारत में शरण के लिए अनुरोध किया था। वहीं भारत ने भी उनका दिल खोलकर स्वागत किया। भारत ने तिब्बत को हमेशा आजाद देश माना है और तिब्बत के साथ मजबूत वाणिज्यिक और सांस्कृतिक संबंध साझा किए हैं।

हालांकि पहले तो सीमा शांतिपूर्ण बनी रही। लेकिन साल 1954 में यह बदल गया। जब भारत ने चीन के साथ पंचशील समझौते पर साइन किए। साथ ही इसको 'चीन के तिब्बत क्षेत्र' के रूप में स्वीकार किया। भारत ने दलाई लामा की सुरक्षा का ध्यान रखा। दलाई लामा का दल कुछ समय अरुणाचल प्रदेश के तवांग मठ में रुका। फिर मसूरी में पंडित नेहरू के मुलाकात के बाद 03 अप्रैल 1959 को उनको शरण दी गई।

चीनी दमन से परेशान होकर भाग रहे हजारों तिब्बतियों के लिए हिमाचल प्रदेश का धर्मशाला पहले ही घर बन गया था। फिर बाद में दलाई लामा भी वहां पर स्थाई रूप से बस गए और निर्वासित तिब्बती सरकार की स्थापना की। लेकिन भारत के इस साहसिक कदम से चीन नाराज हो गया।

वहीं साल 2011 में दलाई लामा ने घोषणा की थी कि वह अपनी राजनीतिक भूमिका को छोड़ देंगे। वहीं निर्वासित तिब्बती सरकार के एक निर्वाचित नेता को सभी जिम्मेदारियां सौंप देंगे। लेकिन अभी भी वह सक्रिय हैं।

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