भारत-चीन विवाद का हल मुश्किल नहीं है, दोनों देशों को लचीला रुख अपनाना होगा

By डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Sep 08, 2020

भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और चीन के रक्षा मंत्री वेई फेंगहे की मास्को में दो घंटे बात हुई लेकिन उसका नतीजा क्या निकला ? दोनों अपनी-अपनी टेक पर अड़े रहे। फेंगहे कहते रहे कि वे चीन की एक इंच जमीन नहीं छोड़ेंगे और यही बात भारत की जमीन के बारे में राजनाथ भी कहते रहे। दोनों एक-दूसरे पर उत्तेजना फैलाने का आरोप लगाते रहे, फिर भी दोनों सारे मामले को बातचीत से हल करने की इच्छा दोहराते रहे। क्या आपने कभी सोचा कि दोनों देशों के नेता इस मुद्दे पर खोए-खोए—से क्यों लगते हैं ? 

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चीन कह सकता है कि जैसे आप मानते हैं कि आपके कब्जे से आपने वास्तविक नियंत्रण रेखा का कोई उल्लंघन नहीं किया है, वैसे ही हमने भी गलवान घाटी में कोई सीमा नहीं लांघी है। जाहिर है कि चीन ने अप्रैल माह तक ऐसी कई जगहों को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। संसद में विरोधी पूछेंगे कि चीनी जब ऐसी हरकतें कर रहे थे, तब क्या हमारी सरकार सो रही थी ? उसने तत्काल जवाबी कार्रवाई क्यों नहीं की ? हो सकता है कि कब्जे की ये कार्रवाइयां वास्तविक नियंत्रण रेखा के साथ वाले उन इलाकों में हुई हों, जो दोनों तरफ खाली रखे जाते हैं। दूसरे शब्दों में दोनों देशों के बीच जो झंझट चल रहा है, वह नकली है, तात्कालिक है, आकस्मिक है और स्थानीय है। उसे अब दोनों देश बैठकर सुलझा सकते हैं। जब बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल के साथ सीमा-विवादों को कुछ ले-देकर सुलझाया जा सकता है तो चीन के साथ क्यों नहीं सुलझाया जा सकता है ? यदि चीनी रक्षा मंत्री हमारे रक्षा मंत्री से बार-बार मिलने का अनुरोध कर सकता है और उनसे मिलने के लिए उनके होटल में आ सकता है तो सारे विवाद को आसानी से हल भी किया जा सकता है।

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

(लेखक भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)

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