Vishwakhabram: बदलने वाली है India की China Policy? Early Harvest Deal की तैयारी! Xi Jinping India Visit से पहले आई बड़ी खबर

By नीरज कुमार दुबे | Jun 26, 2026

सितंबर में नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के शामिल होने की पूरी संभावना है जिसके चलते भारत चीन संबंधों में नई कूटनीतिक हलचल देखने को मिल रही है। पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर वर्ष 2020 से 2024 तक चले लंबे सैन्य गतिरोध के बाद दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाने की कोशिशें अब अधिक स्पष्ट दिखाई दे रही हैं। नई दिल्ली में हाल ही में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच हुई वार्ता ने यह संकेत दिया है कि दोनों देश सीमा विवाद के कम संवेदनशील हिस्सों में प्रारंभिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

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इसके अलावा, नई दिल्ली में ब्रिक्स बैठक से इतर चीनी विदेश मंत्री वांग यी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात ने भी दोनों देशों के बीच संवाद प्रक्रिया को नई गति दी है। चीन के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट कहा है कि बीजिंग भारत के साथ मिलकर आपसी विश्वास बढ़ाने, संदेह दूर करने और संवेदनशील मुद्दों को सावधानी से संभालने के लिए तैयार है। चीन ने यह भी दोहराया कि सीमा विवाद को दोनों देशों के व्यापक संबंधों पर हावी नहीं होने देना चाहिए। दूसरी ओर भारत लगातार यह कहता रहा है कि द्विपक्षीय संबंधों के सामान्य विकास के लिए सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता अनिवार्य है।

हम आपको यह भी बता दें कि दोनों देशों के बीच सीमा प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाने के लिए नई कार्य प्रणाली विकसित करने पर भी चर्चा हो रही है। यह व्यवस्था सीमा क्षेत्रों में तनाव कम करने, सैन्य गतिविधियों पर नियंत्रण रखने और आकस्मिक टकराव रोकने के उद्देश्य से तैयार की जा सकती है। साथ ही भारत ने सीमा पार नदियों से संबंधित विशेषज्ञ स्तर की वार्ता शीघ्र शुरू करने की मांग भी उठाई है। यह मुद्दा जल सुरक्षा, पर्यावरण और भविष्य की सामरिक स्थिरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

देखा जाये तो इन घटनाक्रमों का सामरिक महत्व बहुत व्यापक है। भारत और चीन एशिया की दो सबसे बड़ी शक्तियां हैं और दोनों के बीच संबंधों का प्रभाव पूरे हिंद प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता पर पड़ता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अमेरिका, जापान और यूरोपीय देशों के साथ अपने रणनीतिक संबंध मजबूत किए हैं। वहीं चीन के साथ उसका व्यापारिक संबंध भी लगातार बढ़ता रहा है। यही कारण है कि नई दिल्ली अब ऐसी नीति पर काम कर रही है जिसमें प्रतिस्पर्धा और सहयोग दोनों साथ-साथ चल सकें।

साथ ही अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक हलकों में यह तर्क भी तेजी से उभर रहा है कि भारत को जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के अनुभवों से सीख लेनी चाहिए। जापान अमेरिका का प्रमुख सुरक्षा सहयोगी होने के बावजूद चीन के साथ अपने आर्थिक संबंध बनाए रखता है। दोनों देशों के बीच समुद्री विवाद और राजनीतिक मतभेद हैं, लेकिन टोक्यो ने कभी चीन के साथ आर्थिक संपर्क पूरी तरह समाप्त नहीं किया। जापान ने सुरक्षा और अर्थव्यवस्था को अलग स्तर पर संभालने की नीति अपनाई है। भारत के लिए भी यह मॉडल उपयोगी माना जा रहा है।

दक्षिण कोरिया का उदाहरण भी महत्वपूर्ण है। सियोल अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर है, लेकिन उसकी अर्थव्यवस्था चीन के विशाल बाजार से गहराई से जुड़ी हुई है। थाड मिसाइल प्रणाली को लेकर चीन और दक्षिण कोरिया के बीच गंभीर तनाव पैदा हुआ था, फिर भी सियोल ने संबंध समाप्त करने की बजाय संतुलित नीति अपनाई। उसने आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता लाने के साथ संवाद बनाए रखा। भारत भी अब वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है और चीन के साथ उसका व्यापारिक संबंध अत्यंत व्यापक है। ऐसे में पूर्ण टकराव की नीति भारत के आर्थिक हितों को प्रभावित कर सकती है।

रणनीतिक दृष्टि से देखें तो भारत अब बहु संतुलन वाली विदेश नीति की ओर बढ़ रहा है। एक ओर वह अमेरिका के साथ रक्षा, प्रौद्योगिकी और हिंद प्रशांत क्षेत्र में सहयोग मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर चीन के साथ तनाव प्रबंधन और आर्थिक संपर्क बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। यह नीति भारत को अधिक सामरिक स्वायत्तता प्रदान कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत चीन संबंधों में स्थिरता आती है तो इससे नई दिल्ली को वैश्विक स्तर पर अधिक स्वतंत्र कूटनीतिक भूमिका निभाने का अवसर मिलेगा।

भारत और चीन दोनों प्राचीन सभ्यताएं, विशाल बाजार और उभरती वैश्विक शक्तियां हैं। दोनों देशों की संयुक्त आबादी विश्व की लगभग एक तिहाई है। ऐसे में निरंतर शत्रुता न केवल एशिया की स्थिरता के लिए चुनौती होगी, बल्कि वैश्विक आर्थिक संतुलन को भी प्रभावित करेगी। यही कारण है कि दोनों देश अब सीमित सहयोग, नियंत्रित प्रतिस्पर्धा और निरंतर संवाद की नीति पर आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।

बहरहाल, सीमा विवाद, आपसी अविश्वास और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं, लेकिन हालिया कूटनीतिक गतिविधियां यह संकेत देती हैं कि नई दिल्ली और बीजिंग संबंधों को टकराव के बजाय स्थिरता की दिशा में ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। यदि यह प्रक्रिया सफल होती है तो इससे न केवल एशिया में शक्ति संतुलन मजबूत होगा, बल्कि भारत को अपनी सामरिक स्वायत्तता, आर्थिक विकास और वैश्विक प्रभाव बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण लाभ मिल सकता है।

-नीरज कुमार दुबे

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