By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Oct 25, 2026
(अपर्णा बोस) नयी दिल्ली, 25 अक्टूबर तुर्किये में होने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (सीओपी31) से लगभग तीन महीने पहले, भारत ने आधिकारिक तौर पर ‘लू’ को प्राकृतिक आपदा घोषित किया है। अधिकारियों और विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम वैश्विक जलवायु वित्त प्रणाली की एक कड़वी सच्चाई को सामने लाता है, जो जोखिम का सामना कर रहे देशों को अपने अस्तित्व को बचाने के लिए आवश्यक जलवायु संबंधी खर्चों का पूरा बोझ खुद उठाने पर मजबूर करती है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के सदस्य और विभाग प्रमुख, के. एस. वत्स ने ‘पीटीआई वीडियो’ को दिए एक साक्षात्कार में कहा, ‘‘अगर हमें अच्छी-खासी अंतरराष्ट्रीय मदद मिली होती, जिससे हम अनुकूलन के विभिन्न उपायों के लिए निधि जुटा पाते, तो यह काम काफी आसान हो जाता।’’ यह रेखांकित करते हुए कि अनुकूलन के लिए उपलब्ध संसाधन ‘‘अपर्याप्त और अनिश्चित‘‘ हैं, वत्स ने उच्च प्रौद्योगिकी तक पहुंच बेहतर बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया, जिसमें शीतलन के लिए जरूरी तकनीकें भी शामिल हैं।
तापमान का बढ़ना हमारे लिए एक बहुत बड़ी चिंता का विषय है, इसलिए हमने अपने राष्ट्रीय और राज्य आपदा न्यूनीकरण कोष के जरिए भीषण गर्मी के प्रभावों से निपटने का फैसला किया है। हम राज्यों को भीषण गर्मी से निपटने की कार्ययोजना बनाने और उन्हें जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए जरूर प्रोत्साहित करना चाहेंगे।’’ वत्स ने इस बात पर जोर दिया कि अंतरराष्ट्रीय अनुकूलन वित्त राष्ट्रीय प्रयासों का पूरक बन सकता है और कार्यान्वयन के पैमाने तथा गति में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है। भारत में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के कूल कोअलिशन कार्यक्रम का नेतृत्व करने वाले बेंजामिन हिकमैन ने बताया कि सर्वाधिक जरूरतमंद लोगों तक वित्तीय मदद पहुंचाने का मतलब सिर्फ निधि की उपलब्धता सुनिश्चित करना नहीं है, बल्कि सरकारों के साथ मिलकर काम करना और ऐसे व्यावहारिक प्रस्ताव तैयार करना भी है, जिनसे वित्तीय प्रवाह सुचारू रूप से हो सके।
हिकमैन ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ‘‘हम विभिन्न देशों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं ताकि वे जलवायु वित्त के लिए तैयार हो सकें और इसके लिए आवेदन करने हेतु अपनी संस्थागत क्षमता विकसित कर सकें।’’ उन्होंने कहा कि असल में, जलवायु वित्त के दायरे को बढ़ाने की जरूरत है, इसके लिए हमें ऐसी प्रायोगिक परियोजनाओं की भी आवश्यकता है, जो वित्त प्रणाली के तरीकों को परख सके। साथ ही, ऐसे उपाय खोजने होंगे जिनसे लोगों को आर्थिक प्रोत्साहन मिल सके या उनके पास पैसे पहुंच सके, ताकि वे इन चीजों का खर्च उठा सकें -- चाहे अपने घर को भीषण गर्मी के दौरान शीतल रखना हो या अधिक दक्ष वातानुकलन खरीदना हो। यूएनईपी की एमिशन्स गैप रिपोर्ट 2026 का हवाला देते हुए, ‘क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क साउथ एशिया’ के निदेशक संजय वशिष्ठ ने इस बात पर जोर दिया कि हर देश के लिए अनुकूलन एक अत्यंत जरूरी प्राथमिकता बन गई है।
उन्होंने कहा कि विकसित देशों को साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं के तहत जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। वशिष्ठ ने तर्क दिया कि विकसित देश पीछे हट रहे हैं—जबकि वे पहले भी कभी जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते थे—भले ही जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब उनकी अपनी दहलीज तक पहुंच चुके हैं। सीओपी31 का आयोजन 9 नवंबर से 20 नवंबर तक तुर्किये के अंताल्या में होगा।