पहली बार ओलंपिक में भारत को मिले 7 मेडल, जानें इतिहास बदलने वाले हर एक की कहानी

By अभिनय आकाश | Aug 07, 2021

जापान के टोक्यो में 23 जुलाई से शुरू हुए ओलंपिक खेलों के आयोजन का 8 अगस्त यानी रविवार के दिन समापन हो जाएगा। लेकिन भारत के लिहाजे से देखें तो आज ही उसके सारे मैच खत्म हो गए। इस बार के टोक्यो ओलंपिक 2020 में भारत ने कुल 7 मेडल जीते। भारत का अब तक तक इससे पहले सबसे अच्छा प्रदर्शन लंदन के 2012 ओलंपिक में रहा था जहां उसके खाते में 6 पदक आए थे। 

ओलंपिक में मीराबाई चानू से पदक की उम्मीद तो की जा ही रही थी और इसमें उन्होने देश को निराश नहीं किया। टोक्यो ओलंपिक में मीराबाई चानू ने वेटलिफ्टिंग में भारत का सिल्वर मेडल से खाता खोला। वेटलिफ्टिंग के 49 किलोग्राम वर्ग में चानू को सिल्वर मेडल मिला। मीराबाई ने रजत पदक जीतने के बाद कहा कि उनका सपना साकार हो गया है लेकिन इसे साकार करने के लिए उन्हें दिन-प्रतिदिन एक के बाद एक बाधाओं को पार करना पड़ा। इम्फाल से लगभग 20 किमी दूर नोंगपोक काकजिंग गांव की रहने वाले मीराबाई छह भाई-बहनों में सबसे छोटी हैं। उनका बचपन पास की पहाड़ियों में लकड़ियां काटते और एकत्रित करते तथा दूसरे के पाउडर के डब्बे में पास के तालाब से पानी लाते हुए बीता। मीराबाई के जज्बे का अंदाजा इस बात से लगता है कि एक बार जब उनका भाई लकड़ियां नहीं उठा पाया तो वह 12 साल की उम्र में दो किलोमीटर चलकर लकड़ियां उठाकर लाई। चानू ने अपने जीवन में काफी पहले फैसला कर लिया था कि वह खेलों से जुड़ेंगी। अपने की राज्य मणिपुर की दिग्गज भारोत्तोलक कुंजरानी देवी के बारे में पढ़ने के बाद वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी उपलब्धियों से प्रभावित हुई। मीराबाई ने अपना पहला राष्ट्रीय पदक 2009 में जीता। वह इसके बाद काफी जल्दी आगे बढ़ी और उन्होंने 2014 राष्ट्रमंडल खेलों में रजत पदक हासिल किया। रियो ओलंपिक 2016 में पदक की प्रबल दावेदार तब 21 बरस की मीराबाई का दिल उस समय टूट गया जब वह क्लीन एवं जर्क में अपने तीनों प्रयासों में नाकाम रही और इसके कारण उनका कुल वजन रिकॉर्ड नहीं हुआ। मणिपुर की इस खिलाड़ी ने इस निराशा से उबरते हुए अगले साल 2017 विश्व चैंपियनशिप में खिताब जीता। वह इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में दो दशक से अधिक समय में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय भारोत्तोलक बनीं। कुछ महीनों बाद मीराबाई ने 2018 राष्ट्रमंडल खेलों में भी स्वर्ण पदक हासिल किया। 

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लवलीना ने अपने पंच से भारत के लिए मेडल किया पक्का

बचपन में मोहम्मद अली की कहानी सुनकर बॉक्सिंग की ओर कदम बढ़ाने वाली लवलीना बॉरगोहेन ने टोक्यो ओलंपिक में शानदार प्रदर्शन करते हुए ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया। अपना पहला ओलंपिक खेल रही लवलीना बोरगोहेन (69 किलो) ने पूर्व विश्व चैम्पियन चीनी ताइपै की नियेन चिन चेन को हराकर मुक्केबाजी स्पर्धा में भारत का पदक पक्का कर दिया। असम के गोलाघाट में 2 अक्टूबर 1997 को टिकेन और मामोनी बॉरगोहेन के घर लवलीना का जन्म हुआ। उनके पिता टिकेन एक छोटे व्यापारी थे और 1300 रुपये महीना कमाते थे। लवलीना की दो बड़ी जुड़वां बहनों लिचा और लीमा ने भी राष्ट्रीय स्तर पर किक बॉक्सिंग स्पर्धा में भाग लिया, लेकिन दोनों इसके आगे नहीं बढ़ सकीं। इधर स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने लवलीना की दक्षता का अंदाजा लगातार नौंवी कक्षी में ही उसे परंपरागत करने का बीड़ा उठाया। लवलीना का बॉक्सिंग सफर 2012 से शुरू हो गया। पांच साल के भीतर ही वो एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज तक पहुंच गई। असम से ओलंपिक की राह इतनी आसान नहीं थी। विश्व व्यापी मुकाबले में जहां हर कोई जी-तोड़ कोशिश और अभ्यास में लगा था लेकिन इन सब से इतर लवलीना अपनी मां के स्वास्थ्य को लेकर संघर्षर्त थीं। उनकी मां का किडनी ट्रांसफ्लांट होना था। जिसकी वजह से वे बॉक्सिंग से दूर और मां के करीब थीं। मां की सफल सर्जरी के बाद ही लवलीना वापस अभ्यास के लिए गईं। कोरोना की सेंकेंड वेब की वजह से बंद कमरे में ही लवलीना ने वीडियो का सहारा लेकर ट्रेनिंग किया।  

हर दांव को धता बताते हुए रवि दाहिया ने दिलाया दूसरा सिल्वर

कुश्ती रवि दहिया के कमाल और धमाल ने पूरी दुनिया में हिंदुस्तान का ढंका बजाया और भारत को दूसरा सिल्वर मेडल भी दिलवाया।  रवि ने सेमीफाइनल मैच में हार के मुंह से जीत को निकालते हुए भारतीय टीम को उसका चौथा मेडल दिलवाया था जिसके बाद से उनसे गोल्ड मेडल की आस बढ़ गई थी। लेकिन फाइनल में दहिया रूसी ओलंपिक समिति के मौजूदा विश्व चैंपियन जावुर युगुएवसे 4-7 से हार गये। रवि कुमार दहिया ओलंपिक में सिल्वर मेडल जीतने वाले भारत के दूसरे पहलवान हैं और इससे पहले सुशील कुमार ने 2012 के ओलंपिक में सिल्वर मेडल जीता था। रवि दहिया ने 2015 में अंडर-23 विश्व चैम्पियनशिप में रजत पदक जीता था जिससे उनकी प्रतिभा की झलक दिखी थी। उन्होंने प्रो कुश्ती लीग में अंडर-23 यूरोपीय चैम्पियन और संदीप तोमर को हराकर खुद को साबित किया। दहिया के आने से पहले तोमर का 57 किग्रा वर्ग में दबदबा था। 019 विश्व चैम्पियनशिप में उन्होंने सभी आलोचकों को चुप कर दिया। उन्होंने 2020 में दिल्ली में एशियाई चैम्पियनशिप जीती और अलमाटी में इसी साल खिताब का बचाव किया। 

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41 साल बाद हॉकी की खोई चमक आई वापस

41 साल बाद भारतीय पुरुष हॉकी टीम को पदक मिलने के बाद ओलंपिक में भारतीय हॉकी में सूखे के दौर पर विराम लग गया। बहुत दिन बाद हुआ है कि हॉकी चर्चा में लौटी बल्कि ओलंपिक जैसे प्रतिष्ठित खेल उत्सव में बढ़िया प्रदर्शन किया है। मेडल तो आया ही है लेकिन ये बात तथ्य है कि हॉकी अब निराशा के अंधेरे से बाहर आकर चमक रही है। हॉकी में भारत को आखिरी गोल्ड मेडल मास्को के ओलंपिक में मिला था। उसके बाद फिर दोबारा हमारी टीम पोडियम तक नहीं पहुंच सकी। कांस्य हमारी आखिरी उम्मीद थी, अगर हम ये हार जाते तो दुनिया हॉकी के लिए भारत को याद नहीं करती। हॉकी के खेल में हुआ एक बदलाव भी था। तब तक हॉकी का खेल घास के मैदान से आर्टिफिशियल ग्रास पर शिफ्ट हो गया था। 1976 में पहली बार जब इन बदलावों के साथ खेल हुए तो भारत सातवें स्थान पर रहा। वर्ष 2008 के बीजिंग ओलंपिक में तो हॉकी में हमारा देश क्वालिफाई ही नहीं कर पाया। लेकिन ये भारतीय हॉकी टीम का कमाल ही था जिसके बाद जिस देश में खेल का मतलब सिर्फ क्रिकेट होता है उस देश में आज हॉकी की कितनी चर्चा हो रही है।

दो पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला पीवी सिंधु

भारत की पीवी सिंधु ने चीन की ही बिंग जियाओ को 21-13, 21-15 से हराकर टोक्यो ओलंपिक में बैडमिंटन महिला एकल का ब्रॉन्ज़ मेडल जीता। इसके साथ ही सिंधु दो ओलंपिक मेडल जीतने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बनीं। दुनिया की सातवें नंबर की खिलाड़ी सिंधू ने मुसाहिनो फॉरेस्ट स्पोर्ट्स प्लाजा में 53 मिनट चले कांस्य पदक के मुकाबले में चीन की दुनिया की नौवें नंबर की बायें हाथ की खिलाड़ी बिंग जियाओ को 21-13, 21-15 से शिकस्त दी। सिंधू को सेमीफाइनल में चीनी ताइपे की ताइ जू यिंग के खिलाफ 18-21, 12-21 से शिकस्त झेलनी पड़ी थी। पीवी सिंधु का जन्म 5 जुलाई 1995 को आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद में हुआ। उनके माता-पिता राष्ट्रीय स्तर के वॉलीबॉल खिलाड़ी थे। उनके पिता पीवी रमाना ने 1986 के सियोल एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीता था। बैडमिंटन में पुलेला गोपीचंद के प्रदर्शन को देखकर पीवी सिंधु ने अपने हाथ में बैडमिंटन थाम लिया और आठ साल की उम्र में ही वो इस खेल को नियमित रूप से खेलने लगीं। पहले रियो ओलंपिक में सिल्वर, फिर चीन ओलंपिक में गोल्ड, जापान बैडमिंटन चैपिंयनशिप में गोल्ड और अब वर्ल्ड चैंपियन का खिताब। सिंधु के कदम हर अग्निपथ को पार करते हुए हर कदम पर चुनौतियों को चूमते गए। लेकिन मजबूत हौसले ने कभी उन्हें हारने नहीं दिया। साल 2017 में फाइनल में पहुंचकर विश्व खिताब के नजदीक जाकर भी सिंधू चूक गईं। लेकिन दो सालों में सिंधु ने खुद को फिर तैयार किया और नए जंग के लिए वो चल पड़ी। आखिर में जीत को अपने कदमों में खींच लिया। 

कड़ी मेहनत और त्याग के बाद मिला बजरंग को सिल्वर 

भारतीय पहलवान बजरंग पूनिया भले ही स्वर्ण पदक जीतने की उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाये हों लेकिन उन्होंने आज कजाखस्तान के दौलत नियाजबेकोव को 8-0 से हराकर टोक्यो ओलंपिक की कुश्ती प्रतियोगिता में पुरुषों के 65 किग्रा भार वर्ग में ब्रॉन्ज मेडल जीत लिया। बजरंग पूनिया को यह सफलता वर्षों की कड़ी मेहनत और त्याग के बाद मिली है। बजरंग 2008 में जब 34 किलो के थे तब मछरोली गांव के एक दंगल में उन्होंने लगभग 60 किग्रा के पहलवान के खिलाफ कुश्ती करने की अनुमति मांगी। 2008 में उनके पिता बलवान सिंह ने उनका नामांकन प्रसिद्ध छत्रसाल स्टेडियम में कराया। बजरंग दो साल में एशियाई कैडेट चैंपियन बन गए और 2011 में उन्होंने खिताब का बचाव किया। उन्हें सबसे बड़ी सफलता तब मिली जब उन्होंने 2018 विश्व चैम्पियनशिप रजत पदक जीता।  उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों, एशियाई खेलों और विश्व चैम्पियनशिप में पदक जीता था। उन्होंने 2019 विश्व चैम्पियनशिप में कांस्य पदक जीतकर ओलंपिक कोटा हासिल किया। 

टूटी कलाई नहीं तोड़ पाई नीरज का हौंसला

टोक्यो ओलंपिक 2020 में भारत ने इतिहास रच दिया। 13 साल बाद भारत में एक बार फिर ओलंपिक का गोल्ड मेडल आ गया है। तेरह सालों के लंबे इंतजार के बाद इसे भारत के सुपर जेवलियन थ्रोअर नीरज चोपड़ा लेकर आए हैं। ओलंपिक खेलों के इतिहास में पहली बार भारत का कोई खिलाड़ी एथलेटिक्स में गोल्ड मेडल जीतने में कामयाब हुआ है। नीरज से पहले साल 2008 के बीजिंग ओलंपिक में अभिनव बिंद्रा ने निशानेबाजी में गोल्ड मेडल जीता था। इन दोनों के अलावा भारत मेन्स हॉकी ने आठ गोल्ड मेडल जीते हैं। लेकिन ओलंपिक खत्म होते-होते नीरज का गोल्ड भारतीयों के लिए गर्व का पल है। हरियाणा के खांद्रा गांव के एक किसान के बेटे 23 वर्षीय नीरज ने टोक्यो ओलंपिक में भाला फेंक के फाइनल में अपने दूसरे प्रयास में 87.58 मीटर भाला फेंककर दुनिया को स्तब्ध कर दिया और भारतीयों को जश्न में डुबा दिया। अनुभवी भाला फेंक खिलाड़ी जयवीर चौधरी ने 2011 में नीरज की प्रतिभा को पहचाना था। नीरज इसके बाद बेहतर  सुविधाओं की तलाश में पंचकूला के ताऊ देवी लाल स्टेडियम में आ गये। बास्केटबॉल खेलने के दौरान एक बार नीरज की कलाई की हड्डी टूट गई थी। जिसके बाद डॉक्टरों ने उन्हें छह महीने आराम की सलाह दी थी। लेकिन नीरज ने हार नहीं मानी। इस दौरान उनका वजन 82 किलो तक बढ़ गया था। कलाई ठीक होने के बाद लगातार 4 महीेने तक एक्सरसाइज कर उन्होंने अपने वजन को मेंटेन किया। 2012 के आखिर में वह अंडर-16 राष्ट्रीय चैंपियन बन गए थे। उन्हें इस खेल में अगले स्तर पर पहुंचने के लिए वित्तीय मदद की जरूरत थी जिसमें बेहतर उपकरण और बेहतर आहार की आवश्यकता थी। ऐसे में उनके संयुक्त किसान परिवार ने उनकी मदद की और 2015 में नीरज राष्ट्रीय शिविर में शामिल हो गए। वह 2016 में जूनियर विश्व चैंपियनशिप में 86.48 मीटर के अंडर-20 विश्व रिकॉर्ड के साथ एक ऐतिहासिक स्वर्ण पदक जीतने के बाद सुर्खियों में आये और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 

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