West Bengal से सटे Bangladesh के इलाकों में Jamaat-e-Islami को मिली प्रचंड जीत से भारत चिंतित

By नीरज कुमार दुबे | Feb 14, 2026

बांग्लादेश में हुए आम चुनाव के नतीजों ने भारत और बांग्लादेश के बीच सीमा से लगे इलाकों में नई चिंता पैदा कर दी है। शुक्रवार को आए परिणामों में कट्टर रुख वाली पार्टी जमात-ए-इस्लामी और उसके सहयोगियों ने सीमा से लगे कई इलाकों में अच्छी सफलता हासिल की है। बताया जा रहा है कि 68 सीटों वाले जिन क्षेत्रों में कड़ा मुकाबला था, वहां जमात और उसके साथियों ने उल्लेखनीय जीत दर्ज की। कुल मिलाकर यह प्रदर्शन पिछले 25 साल से अधिक समय में जमात का सबसे मजबूत चुनावी प्रदर्शन माना जा रहा है।


राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जमात-ए-इस्लामी का इतिहास और उसका वैचारिक झुकाव पाकिस्तान के करीब माना जाता रहा है, इसलिए उसके उभार को भारत की सुरक्षा नजर से भी देखा जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने भी इस पर चिंता जताई है। पार्टी का कहना है कि सीमा के दोनों ओर कट्टर सोच का फैलाव भविष्य के लिए चुनौती बन सकता है।

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भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार ने कहा कि बांग्लादेश एक अलग देश है और वहां की नई सरकार से उम्मीद है कि वह कानून व्यवस्था मजबूत रखेगी और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगी। उन्होंने कहा कि सीमा के पास जमात की जीत चिंता का विषय है और यह दिखाता है कि सीमा के दोनों ओर कट्टर सोच को समर्थन मिल रहा है। उनके अनुसार भारत को इस स्थिति पर नजर रखनी होगी और सीमा प्रबंधन को और मजबूत करना होगा।


हम आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल के कई जिले ऐसे हैं जिनकी सीमा उन बांग्लादेशी इलाकों से लगती है जहां जमात को सफलता मिली है। इनमें दक्षिण 24 परगना, उत्तर 24 परगना, नदिया, मुर्शिदाबाद, मालदा और अलीपुरद्वार प्रमुख हैं। इन जिलों में पहले भी सीमा पार आवागमन, तस्करी और अवैध गतिविधियों को लेकर चर्चा होती रही है। अब राजनीतिक बदलाव ने सुरक्षा एजेंसियों का ध्यान फिर से इन क्षेत्रों पर केंद्रित कर दिया है।


बांग्लादेश के भीतर देखें तो जमात ने पश्चिमी हिस्से के कई इलाकों में अपना प्रभाव बढ़ाया है। सतखीरा, मयमनसिंह, राजशाही, रंगपुर और गाइबांधा जैसे इलाकों में पार्टी की पैठ मजबूत होती दिख रही है। स्थानीय जानकारों का कहना है कि पिछले एक साल में जमात ने जमीनी स्तर पर संगठन को सक्रिय किया और समाज के कुछ वर्गों में समर्थन जुटाया।


पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग के कुछ नेताओं ने आरोप लगाया है कि जमात ने अंतरिम सरकार के कार्यकाल में अपना असर फैलाया। आवामी लीग के पूर्व सांसद सलीम महमूद ने कहा कि जमात एक कट्टर संगठन है जिसकी सोच लोकतांत्रिक दलों को कभी स्वीकार नहीं रही। उनके अनुसार जब पहले जमात पर रोक थी तब उसका असर सीमित था, लेकिन रोक हटने के बाद उसने फिर से काम तेज किया।


इतिहास पर नजर डालें तो वर्ष 2001 के चुनाव में जमात ने 17 सीटें जीती थीं। वर्ष 2008 में उसका प्रदर्शन घटकर दो सीटों पर आ गया था। वर्ष 2013 में बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने जमात का पंजीकरण रद्द कर दिया था, जिसके बाद उसकी राजनीतिक गतिविधियों पर असर पड़ा। बाद में शेख हसीना सरकार ने जमात पर प्रतिबंध लगाया था। हालांकि वर्ष 2024 में अंतरिम सरकार ने यह प्रतिबंध हटा दिया, जिसके बाद पार्टी ने खुलकर संगठन विस्तार शुरू किया।


वर्तमान नतीजों ने बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति के साथ साथ क्षेत्रीय समीकरणों पर भी असर डाला है। भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से सहयोग, व्यापार और सुरक्षा संवाद चलता रहा है। ऐसे में सीमा से लगे इलाकों में किसी भी तरह का कट्टर राजनीतिक उभार दोनों देशों के नीति निर्धारकों के लिए विचार का विषय बन गया है।


विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बांग्लादेश की नई सरकार किस तरह काम करती है, कानून व्यवस्था को कैसे संभालती है और सभी समुदायों का भरोसा कैसे बनाए रखती है। वहीं भारत की ओर से भी कूटनीतिक संपर्क और सीमा सुरक्षा पर जोर बढ़ने की संभावना है। फिलहाल चुनाव नतीजों ने क्षेत्र की राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है और दोनों देशों की नजरें आगे के घटनाक्रम पर टिकी हैं।

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