महामारी से जूझते देश में चिताओं के पास बैठकर लाइव कमेंट्री करना गिद्ध भोज के तुल्य है

By तरुण विजय | Apr 30, 2021

संकट ग्रस्त राष्ट्र को नेतृत्व आशा और विश्वास के साथ विजय की ओर बढ़iता है। नेतृत्व दवा नहीं, डॉक्टर नहीं, लेकिन दवा और डॉक्टर के प्रभावी उपयोग का सशक्त माध्यम जरूर है। युद्ध सैनिक करते हैं मनोबल, उनमें समर्पण और विजय की उद्दाम इच्छा, उच्च मनोबल नेतृत्व भरता है। चर्चिल ने हार रहे इंग्लॅण्ड को इसी भाव से जिताया था। मोदी कोविड युद्ध में भारत के हर सामान्य जन में आशा और विश्वास की किरण अपने उदाहरण और अपने समर्पण से भर रहे हैं, उनकी साख का जो गहरा असर है- हर सामान्य भारतीय में- उसके पीछे एक वजह है कि जो मोदी कहते हैं, करते हैं। कोविड युद्ध में मोदी के नेतृत्व ने राजनीति से ऊपर उठकर सबको एकजुट करने की पहल की है। यही विजय का मार्ग है।


इस सबके कारण जो वातावरण बना है, उसने भारतीय नागरिकों के भीतर असामान्य सेवा भावना का दर्शन कराया है। मोदी ने सुनिश्चित किया कि भारत में ऑक्सीजन का उत्पादन प्रतिदिन 5700 मीट्रिक टन से बढ़ कर 8922 मीट्रिक टन प्रतिदिन हो जाये (अप्रैल 2021) जो इसी मासांत तक 9250 मीट्रिक टन प्रतिदिन हो जायेगा।

दुनिया भर से अमेरिका, फ़्रांस, इजराइल आदि से भारत को तुरंत कोविड चिकित्सा सामग्री, दवाएं, उपकरण, वैक्सीन निर्माण के अवयव प्राप्त हो रहे हैं। रेल, विमान, सैन्य सेवाएं कोविड युद्ध में पूरी तरह लगा दी गयीं हैं। 26 अप्रैल तक 14 करोड़ से ज्यादा लोगों को वैक्सीन दी गयीं हैं, 28 करोड़ से ज्यादा सैंपलों का परीक्षण हुआ है। कोविड के कुल एक करोड़ छियत्तर लाख मामले मिले, जिनमें 28 लाख 82 हज़ार 'एक्टिव' मामले पाए गए, इलाज के लिए भर्ती लोगों में से एक करोड़ पैंतालीस लाख अस्पतालों से घर ठीक होकर चले गए, फिर भी दो लाख लोगों को बचाया नहीं जा सका इसका अपार दुःख और वेदना है।

यदि पश्चिमी देशों पर नजर डालें तो उन सबकी कुल आबादी 139 करोड़ है। वहां कुल 20 लाख 63 हज़ार से ज्यादा मौतें हो चुकीं हैं। भारत की कुल आबादी 138 करोड़ है। यहाँ दुर्भाग्य से 2 लाख मौतें हुई हैं। लेकिन क्या यह कहना गलत होगा कि यह मोदी नीति का ही परिणाम था कि हम अपने देश में पश्चिमी देशों की तुलना में क्षति को काफी बड़े पैमाने पर सीमित रख सके ? इस तथ्य की अनदेखी क्यों की जा रही है ? भारत पश्चिमी देशों की तुलना में कोविड युद्ध में काफी अधिक एकजुट, समर्पण और सफलता से बढ़ रहा है यह सत्य कहते हुए क्यों और किस कारण से संकोच किया जा रहा है ?

हर जिले, गाँव, क्षेत्र में महान भारतीयों के अनेक प्रेरक उदाहरण भी मिल रहे हैं लेकिन वे लोग कौन हैं जो इनको 'खबर योग्य' ही नहीं मानते ? नागपुर के नारायण भाऊराव का ही उदाहरण देखिये। 85 वर्ष की आयु। गंभीर बीमार। बहुत कठिनाई से स्थानीय अस्पताल में दाखिला मिला। दूसरे दिन उन्होंने देखा एक स्त्री प्रायः 40 वर्ष के अपने बीमार पति के लिए शय्या मांग रही है, पर डॉक्टर की बेबसी  है। नारायण राव ने अपनी शय्या उस स्त्री के पति हेतु खली कर दी, यह कहते हुए कि मैंने तो अपनी ज़िंदगी जी ली, पर इस व्यक्ति का परिवार अभी भी उस पर निर्भर है, उसका इलाज जरूरी है। नारायण राव अगले दिन चल बसे, पर शानदार सेवा का उदाहरण बन गए, अमर हो गए। ऐसे हज़ारों उदाहरण भारत के समाज को कोविड-योद्धा बना रहे हैं। हर स्तर पर, हर जगह यह भारतीय असामान्य कर्तृत्व के धनी विश्व में भारत को सबसे अधिक एकजुट देश के नाते प्रस्तुत कर रहे हैं।


यह सही है कि कोविड ने देश के जनसामान्य को हिला दिया है। हमारी स्वास्थ्य सेवाएं, डॉक्टर, नर्सेज, मेडिकल सहायक, एम्बुलेंस ड्राइवर, सब इस महामारी से जूझते हुए भी श्रांत क्लांत नहीं दीखते हैं। ऑक्सीजन की कमी, प्लाज्मा, वेंटीलेटर, इन सबके अभाव के कारण अनेक असमय, अकाल मौतें हुईं हैं जिनकी कोई भी कभी क्षतिपूर्ति नहीं कर सकता। परन्तु इसी असाधारण चिकित्सकीय आपात काल के भीतर असाधारण सेवा और समर्पण के जो उदाहरण मिले हैं क्या उनको नजरअंदाज करते हुए केवल श्मशान पत्रकारिता हमारे लेखकों और पत्रकारों का 'धर्म' हो सकता है ? यह तो सरासर अधर्म और कलुषित पत्रकारिता एवं विकृति का ही परिचायक माना जायेगा।

किसी परिवार में स्वजन, प्रियजन का काल कवलित होना अत्यंत दारुण दुःख की चरम निजी वेदना का क्षण होता है। हमारे अनेक विदेश निष्ठ एवं मोदी शासन के प्रति अंध घृणा से ग्रस्त पत्रकारों ने जलती चिताओं के पास बैठकर माइक पर जो कमेंट्री की है वह न केवल भारतीय नागरिकों के प्रति एक अक्षम्य अपराध है बल्कि स्वदेश के प्रति उनकी गहरी संवेदन हीनता का भी परिचायक है। यह पत्रकारिता नहीं अपितु श्मशान मीडिया का उदय है जो गिद्ध भोज के ही तुल्य है।

यदि आप संलग्न नक़्शे पर एक नजर दौड़ाएंगे तो पाएंगे कि प्रति दस लाख पर विश्व के सबसे विकसित और चिकित्सा क्षेत्र में अग्रणी देशों के तुलना में भारत ने अप्रतिम धैर्य और कोविड जागरूकता का परिचय देकर कोविड युद्ध में प्रारंभिक बढ़त पायी है। एक भी मृत्यु बहुत अधिक होती है। मृत्यु के पैमाने को संख्या के लिहाज से तौलना क्रूरता है। लेकिन यदि हम चीन, ऑस्ट्रेलिया, रूस जैसे देशों के साथ भारत के कोविड युद्ध के स्थिति का जायजा लें तो क्या जरूरी है कि हम अपने ही देश को दुनिया में नीचे और असफल घोषित करें ?

पिछले वर्ष भारत दुनिया के प्रथम देशों में था जिसने 21 दिनों का लॉकडाउन घोषित किया, स्वदेश में वैक्सीन बनाई, 95 से ज्यादा देशों को करोड़ों की संख्या में वैक्सीन भेजी, प्रधानमंत्री हर कोविड रोकथाम बैठक की स्वयं अध्यक्षता/ समीक्षा/ मार्गदर्शन कर रहे हैं।

मोदी के विरुद्ध जो लॉबी गुजरात में सक्रिय थी, जो अयोध्या, कश्मीर, तलाक आदि निर्णयों से कुपित हैं वे दुनिया के सामने भारत को असफल देश दिखाने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं। संकट के  समय देश की अनदेखी करते हुए मोदी घृणा में अंध मीडिया का यह प्रयास समस्त देश की जनता और कोविड योद्धाओं का अपमान है।

भारत दुनिया के अन्य देशों की भांति, बहुत कुछ उनसे बेहतर तरीके से इस महामारी के संकट का सामना कर रहा है। स्वदेशी अंध घृणा की राजनीति, सुरक्षा चुनौतियां, इन सबके बावजूद भारत ने अपने महान नागरिकों और एक समर्पित नेतृत्व के कारण कोविड युद्ध में संवेदना और सामूहिकता का अद्भुत उदiहरण प्रस्तुत किया है। इन महान नागरिकों को प्रणाम, भारत इस युद्ध में मोदी के नेतृत्व में अवश्य ही विजयी होगा।

-तरुण विजय

(लेखक देश के वरिष्ठ पत्रकार और राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं)

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