By नीरज कुमार दुबे | Jun 24, 2026
भारत की सामरिक शक्ति का नया अध्याय अब केवल मिसाइलों की मारक क्षमता से नहीं, बल्कि उन्हें बनाने, तेजी से उन्नत करने और युद्धकाल में भारी संख्या में तैयार करने की क्षमता से तय होगा। यही संदेश रक्षा मंत्रालय की मसौदा रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2026 से उभरकर सामने आया है। देखा जाये तो दशकों तक भारत की मिसाइल व्यवस्था एक तय ढांचे पर चलती रही। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन मिसाइल बनाता था, भारत डॉयनेमिक्स लिमिटेड उनका उत्पादन करता था और फिर सेना उन्हें अपने बेड़े में शामिल करती थी। अब यह व्यवस्था बदल रही है।
देखा जाये तो आधुनिक युद्धों ने दुनिया को एक कठोर सच्चाई दिखा दी है। यूक्रेन से लेकर पश्चिम एशिया तक हर संघर्ष में सटीक निशाना साधने वाली मिसाइलों ने निर्णायक भूमिका निभाई। दुश्मन के राडार, वायु रक्षा तंत्र, कमांड केंद्र, रसद नेटवर्क और सैन्य ठिकानों को दूर से नष्ट करने के लिए सामरिक मिसाइलें सबसे प्रभावी हथियार बनकर उभरी हैं। अब मिसाइलें केवल विशेष अवसरों पर उपयोग होने वाले हथियार नहीं रहीं, बल्कि युद्ध का रोजमर्रा का औजार बन चुकी हैं।
भारत के लिए यह आवश्यकता और भी गंभीर है क्योंकि उसके सामने दो परमाणु शक्ति संपन्न प्रतिद्वंद्वी मौजूद हैं। चीन और पाकिस्तान के साथ बदलते सुरक्षा समीकरण भारत को मजबूर कर रहे हैं कि वह केवल मिसाइल तकनीक विकसित करने तक सीमित नहीं रहे, बल्कि युद्धकाल में हजारों मिसाइलें तेजी से तैयार करने की क्षमता भी हासिल करे। यही वह बिंदु है जहां पुराना केंद्रीकृत मॉडल कमजोर दिखाई देने लगा था।
हम आपको बता दें कि अब तक भारत की मिसाइल व्यवस्था में भारत डॉयनेमिक्स लिमिटेड की लगभग एकाधिकार वाली स्थिति थी। आकाश, नाग, अस्त्र जैसी कई सफल मिसाइल प्रणालियां इसी ढांचे में तैयार हुईं। उस दौर में यह व्यवस्था उपयुक्त थी क्योंकि निजी उद्योग के पास तकनीकी क्षमता, अनुसंधान आधार और उत्पादन ढांचा नहीं था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। युद्ध की गति तेज हो चुकी है, तकनीक तेजी से बदल रही है और मिसाइलों की मांग कई गुना बढ़ने वाली है। ऐसे में एकमात्र उत्पादन एजेंसी पर निर्भर रहना सामरिक जोखिम बन सकता है।
मसौदा रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2026 इसी सोच को सामने लाती है। इसमें स्पष्ट कहा गया है कि भारत को केवल देश के भीतर हथियार निर्माण तक सीमित नहीं रहना, बल्कि स्वदेशी डिजाइन, बौद्धिक संपदा और सह विकास पर ध्यान देना होगा। इसी उद्देश्य से विकास और उत्पादन भागीदार व्यवस्था लाई जा रही है। इसके तहत रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन निजी उद्योगों के साथ मिलकर मिसाइल विकसित करेगा, परीक्षण करेगा और फिर उत्पादन भी करेगा।
अडाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस, भारत फोर्ज, आईकॉम और सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस जैसी कंपनियों को सामरिक मिसाइल परियोजनाओं में भागीदारी के लिए चुना गया है। हालांकि भारत डॉयनेमिक्स लिमिटेड और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड को बाहर नहीं किया गया है। फर्क केवल इतना है कि अब वे अकेले खिलाड़ी नहीं रहेंगे। मोदी सरकार ने साफ कर दिया है कि भविष्य की रक्षा व्यवस्था प्रतिस्पर्धा और क्षमता आधारित होगी, केवल सरकारी स्वामित्व आधारित नहीं।
इस बदलाव का सबसे बड़ा सामरिक निहितार्थ यह है कि भारत युद्धकाल में अपनी उत्पादन क्षमता को तेजी से बढ़ा सकेगा। आधुनिक संघर्षों में मिसाइलों का उपयोग इतनी तेज गति से होता है कि भंडार जल्दी खाली हो जाते हैं। यदि उत्पादन केवल एक कंपनी पर निर्भर रहेगा तो आपूर्ति बाधित हो सकती है। लेकिन कई कंपनियों और उत्पादन केंद्रों वाला ढांचा युद्ध के समय निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करेगा। यही कारण है कि सरकार उत्पादन के विस्तार, औद्योगिक गहराई और तकनीकी लचीलेपन पर जोर दे रही है।
रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह का यह संकेत कि भविष्य में बैलिस्टिक मिसाइल उत्पादन में भी निजी उद्योग को शामिल किया जा सकता है, इस परिवर्तन को और भी बड़ा बना देता है। हम आपको बता दें कि बैलिस्टिक मिसाइलें भारत की सामरिक प्रतिरोधक क्षमता का सबसे संवेदनशील हिस्सा मानी जाती हैं। यदि इस क्षेत्र में भी निजी भागीदारी बढ़ती है तो यह भारतीय रक्षा उद्योग की परिपक्वता और सरकार के बढ़ते आत्मविश्वास का प्रमाण होगा।
इसके अलावा, सेना के भीतर एक समर्पित रॉकेट बल बनाने पर भी चर्चा चल रही है। यदि ऐसा बल अस्तित्व में आता है तो उसे भारी संख्या में सामरिक और अर्ध बैलिस्टिक मिसाइलों की आवश्यकता होगी। इसका सीधा अर्थ है कि आने वाले वर्षों में मिसाइल उत्पादन कई गुना बढ़ाना पड़ेगा। एकल उत्पादन व्यवस्था के बूते यह संभव नहीं होगा। इसलिए औद्योगिक विविधीकरण अब केवल आर्थिक सुधार नहीं, बल्कि सामरिक आवश्यकता बन चुका है।
साथ ही यह नई व्यवस्था निजी उद्योग के लिए भी ऐतिहासिक अवसर लेकर आई है। अब तक निजी कंपनियां केवल पुर्जों, इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों और उप घटकों तक सीमित थीं। अब उन्हें सह विकास, प्रणाली एकीकरण और पूर्ण उत्पादन की जिम्मेदारी दी जा रही है। हालांकि सरकार ने सुरक्षा और गुणवत्ता पर कड़ा नियंत्रण बनाए रखा है। हर कंपनी को परीक्षण, तकनीकी मूल्यांकन और गुणवत्ता मानकों से गुजरना होगा। सेना और रक्षा अनुसंधान संस्थान पूरी प्रक्रिया की निगरानी करेंगे।
इस पूरी रणनीति का एक और महत्वपूर्ण पक्ष सात विशेष रक्षा विनिर्माण समूहों की स्थापना है। हम आपको बता दें कि रक्षा मंत्रालय देशभर में ऐसे औद्योगिक समूह विकसित करने जा रहा है जो परीक्षण, गुणवत्ता प्रमाणन, निर्यात, कौशल विकास, अनुसंधान और अवसंरचना निर्माण जैसे अलग अलग क्षेत्रों पर केंद्रित होंगे। यह उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु रक्षा गलियारों से अलग व्यापक राष्ट्रीय ढांचा होगा।
कर्नाटक नीति और प्रशासन, महाराष्ट्र स्वदेशीकरण और निजी भागीदारी, उत्तर प्रदेश परीक्षण और गुणवत्ता, असम पूर्वोत्तर और सीमावर्ती पहल, तेलंगाना निर्यात, गुजरात कौशल विकास और उद्योग शिक्षण संस्थान समन्वय तथा तमिलनाडु रक्षा अवसंरचना पर काम करेगा। भारतीय विज्ञान संस्थान और विभिन्न भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों को भी इस परियोजना से जोड़ा गया है। इसका उद्देश्य केवल हथियार बनाना नहीं, बल्कि पूरे देश में रक्षा नवाचार और उत्पादन का व्यापक पारितंत्र तैयार करना है।
यह परिवर्तन भारत की आत्मनिर्भरता नीति को भी नई दिशा देता है। पहले आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल सरकारी कंपनियों के जरिए घरेलू उत्पादन माना जाता था। अब सरकार आत्मनिर्भरता को व्यापक औद्योगिक शक्ति के रूप में देख रही है, जहां सार्वजनिक क्षेत्र, निजी उद्योग, नवउद्यम और शैक्षणिक संस्थान मिलकर रक्षा उत्पादन को नई ऊंचाई दें।
हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं। अधिक कंपनियों के आने से समन्वय, गुणवत्ता नियंत्रण और तकनीकी अनुशासन बनाए रखना कठिन होगा। जटिल हथियार निर्माण के लिए अत्यधिक परिशुद्धता और विश्वसनीयता चाहिए। लेकिन मोदी सरकार का मानना है कि नियंत्रित प्रतिस्पर्धा और कठोर निगरानी के जरिए इन जोखिमों को संभाला जा सकता है।
बहरहाल, रक्षा क्षेत्र में यह नई क्रांति उस नए भारत की कहानी है जो भविष्य के युद्धों को विशाल औद्योगिक शक्ति, तकनीकी आत्मनिर्भरता और निरंतर उत्पादन क्षमता से जीतना चाहता है। रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2026 इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत अब मिसाइलों को केवल हथियार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय शक्ति के केंद्रीय स्तंभ के रूप में देख रहा है। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को केवल नारा नहीं, बल्कि मिशन मोड की राष्ट्रीय रणनीति बना दिया है। मोदी सरकार का लक्ष्य है भारत को दुनिया के सबसे मजबूत और आत्मनिर्भर रक्षा विनिर्माण केंद्रों में बदलना। आने वाले वर्षों में यही रणनीति भारत की सैन्य विश्वसनीयता, युद्धक तैयारी और वैश्विक सामरिक स्थिति को नई ऊंचाई देगी।