Border Trade में आया नया मोड़, Myanmar सीमा पर व्यापार शुरू, मगर घोषणा के बावजूद China सीमा पर ट्रेड शुरू नहीं हो पाया

By नीरज कुमार दुबे | Jul 13, 2026

कभी सीमाओं पर पसरा सन्नाटा कहानी का अंत लगता है, तो कभी वही खामोशी नए दौर की सबसे बड़ी दस्तक बन जाती है। सीमाएं जब खुलती हैं तो केवल रास्ते नहीं खुलते, बल्कि बाजारों में रौनक लौटती है, रोजी रोटी की उम्मीदें जागती हैं और सीमावर्ती बस्तियों की धड़कन फिर तेज हो जाती है। इस बार भी सीमाई व्यापार के मंच पर दो अलग अलग दृश्य सामने हैं। एक ओर भारत और म्यांमार के बीच छह वर्षों से बंद पड़ा व्यापारिक रास्ता फिर जीवन से भरने जा रहा है, जबकि दूसरी ओर लिपुलेख के रास्ते भारत और चीन के बीच व्यापार की पटकथा अभी अधूरी है। वहां बाजार तैयार नहीं होने से कारोबारी इंतजार की अगली कड़ी लिखने को मजबूर हैं।

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सबसे पहले भारत और म्यांमार के बीच व्यापार बहाली की बात करें तो अरुणाचल प्रदेश के पांगसाउ दर्रे से सीमाई व्यापार छह वर्षों के लंबे अंतराल के बाद फिर शुरू होने जा रहा है। यह व्यापार वर्ष 2019 में दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव के कारण रोक दिया गया था। इसके बाद महामारी ने भी सीमाई आवाजाही और व्यापारिक गतिविधियों को पूरी तरह ठप कर दिया। अब दोनों देशों के बीच सहमति बनने के बाद व्यापार दोबारा शुरू करने का निर्णय लिया गया है। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार व्यापार जुलाई के अंत तक आरंभ होने की संभावना है।

इस व्यापार की सबसे बड़ी विशेषता मुक्त आवाजाही व्यवस्था है। इस व्यवस्था के अंतर्गत सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोग बिना औपचारिक अनुमति के दस किलोमीटर तक एक दूसरे के क्षेत्र में आ जा सकते हैं। इससे स्थानीय स्तर पर व्यापार, छोटे कारोबार, सांस्कृतिक संपर्क और सामाजिक संबंध मजबूत होंगे। सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को अपनी जरूरत का सामान आसानी से उपलब्ध होगा और स्थानीय उत्पादों के लिए नया बाजार भी मिलेगा।

साथ ही पांगसाउ मार्ग के फिर खुलने से सबसे अधिक लाभ अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग जिले और आसपास के इलाकों को मिलने की उम्मीद है। स्थानीय व्यापारिक संगठनों का कहना है कि पिछले छह वर्षों में व्यापार बंद रहने से छोटे व्यापारियों, परिवहन से जुड़े लोगों और स्थानीय बाजारों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। सीमाई व्यापार फिर शुरू होने से रोजगार के नए अवसर बनेंगे, बाजारों में चहल पहल लौटेगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार मिलेगा।

स्थानीय व्यापार संगठन के अध्यक्ष जोंगखाम मोरांग ने मीडिया से कहा कि व्यापार बहाल होने से क्षेत्र के हजारों छोटे व्यापारियों और आम लोगों को सीधा लाभ मिलेगा। उन्होंने कहा कि महामारी और व्यापार बंदी के दौरान जो आर्थिक गतिविधियां पूरी तरह ठहर गई थीं, अब उनके फिर से पटरी पर लौटने की उम्मीद है। सीमा चौकी प्रत्येक महीने की दस, बीस और तीस तारीख को संचालित होगी, जिससे नियमित व्यापारिक गतिविधियां सुनिश्चित की जा सकेंगी।

दूसरी ओर उत्तराखंड स्थित लिपुलेख दर्रे से भारत और चीन के बीच व्यापार सत्र औपचारिक रूप से शुरू तो हो गया है, लेकिन वास्तविक कारोबार अभी तक शुरू नहीं हो पाया है। इसका कारण यह है कि चीन की ओर से नया बाजार और गोदाम पूरी तरह तैयार नहीं हो सके हैं। तिब्बत के तकलाकोट क्षेत्र में नया व्यापारिक केंद्र बनने का कार्य अभी पूरा नहीं हुआ है, जिसके चलते चीनी अधिकारियों ने भारतीय व्यापारियों से कुछ समय और प्रतीक्षा करने को कहा है।

हम आपको याद दिला दें कि लिपुलेख मार्ग से व्यापार वर्ष 2020 में गलवान घाटी की घटना के बाद रोक दिया गया था। इसके बाद लगातार चार वर्षों तक यह मार्ग बंद रहा। इस वर्ष व्यापार फिर शुरू होने की घोषणा से व्यापारियों में उत्साह तो बढ़ा, लेकिन बाजार तैयार नहीं होने के कारण उनकी उम्मीदों को फिलहाल झटका लगा है। व्यापारियों का कहना है कि यदि बाजार समय पर तैयार हो जाता तो इस बार खच्चरों की जगह सीधे मालवाहक वाहनों से सामान पहुंचाया जा सकता था। इसका सबसे बड़ा कारण धारचूला से लिपुलेख तक सड़क निर्माण का पूरा हो जाना है।

हालांकि भारतीय पक्ष ने अपनी तैयारियां लगभग पूरी कर ली हैं। हम आपको बता दें कि व्यापार सत्र की औपचारिक शुरुआत जून में हो चुकी है और भारतीय व्यापारी जुलाई के शुरू में ही सीमा पार करने की तैयारी में थे। लेकिन इसी दौरान चीनी व्यापारिक साझेदारों की ओर से संदेश मिला कि नया बाजार और आवश्यक ढांचा अभी निर्माणाधीन है। इसलिए व्यापारियों को फिलहाल सीमा पार नहीं भेजा जाए। निर्माण कार्य पूरा होने के बाद नई तिथि की सूचना देने का आश्वासन भी दिया गया है।

बहरहाल, दोनों घटनाएं इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि सीमाई व्यापार केवल वस्तुओं के आदान प्रदान तक सीमित नहीं है। यह सीमावर्ती क्षेत्रों की आजीविका, स्थानीय अर्थव्यवस्था, आधारभूत ढांचे और दोनों देशों के राजनीतिक संबंधों से सीधे जुड़ा हुआ है। जहां म्यांमार सीमा पर व्यापार बहाली पूर्वोत्तर के लिए नई आर्थिक संभावनाओं का द्वार खोल रही है, वहीं लिपुलेख पर चीन की धीमी तैयारी यह दिखाती है कि सीमाई व्यापार की सफलता केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि समय पर आधारभूत सुविधाएं और पारस्परिक समन्वय सुनिश्चित होने पर ही संभव है।

-नीरज कुमार दुबे

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