By नीरज कुमार दुबे | Sep 11, 2026
भारत की राजधानी दिल्ली में सुहावने मौसम के बीच जब दो मित्र देश भारत और रूस के राष्ट्राध्यक्ष मिले तो द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने, व्यापार बढ़ाने, रक्षा सौदों आदि को लेकर तो व्यापक वार्ता हुई ही साथ ही यूक्रेन युद्ध का मुद्दा भी प्रधानमंत्री मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के समक्ष बड़ी प्रमुखता से उठाया। इसके अलावा, दोस्त भारत के लिए रूस ने जिस तरह एक से एक घातक रक्षा उपकरण और तकनीक देने के प्रस्ताव सामने रख दिये हैं उससे पूरी दुनिया में खलबली मच गयी है। साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जब भी साथ होते हैं, तो उनकी बातचीत ही नहीं, उनके हावभाव भी दुनिया को कई बड़े संदेश देते हैं, इस बार भी ऐसा ही हुआ। BRICS शिखर सम्मेलन से पहले मोदी और पुतिन की करीब 45 मिनट चली द्विपक्षीय बातचीत और उसके बाद दोनों नेताओं का एक ही कार में भारत मंडपम पहुंचना उस भरोसे का संकेत है जिसने दशकों पुराने भारत-रूस संबंधों को बदलती विश्व व्यवस्था में भी मजबूती से टिकाए रखा है।
साथ ही दिलचस्प और बेहद महत्वपूर्ण बात यह भी है कि रक्षा और रणनीतिक सहयोग के इतने बड़े एजेंडे के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज की बातचीत में भी यूक्रेन युद्ध का मुद्दा उठाया और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के सामने युद्ध खत्म करने तथा शांति की दिशा में आगे बढ़ने की भारत की स्पष्ट सोच रखी। हम आपको यह भी याद दिला दें कि करीब 11 दिन पहले यानि 31 अगस्त को भी किर्गिस्तान के बिश्केक में SCO शिखर सम्मेलन के दौरान मोदी ने पुतिन से सीधे कहा था कि अब दुनिया को “अनंत युद्ध” से निकलकर “युद्ध की समाप्ति” की ओर बढ़ना चाहिए और हर दिन जारी रहने वाला युद्ध मानवता को पीछे धकेलता है। यहां मोदी की कूटनीतिक ताकत का सबसे बड़ा प्रमाण दिखाई देता है। जिस समय पश्चिमी देश रूस पर दबाव, प्रतिबंध और अलगाव की नीति अपना रहे हैं, उसी समय भारत रूस के साथ अपनी रक्षा, ऊर्जा और आर्थिक साझेदारी को मजबूती से जारी रखते हुए उसके सर्वोच्च नेतृत्व के सामने युद्ध समाप्त करने की बात कहने की स्थिति में है। यह ताकत किसी दबाव की राजनीति से नहीं, बल्कि भरोसे की उस असाधारण पूंजी से पैदा हुई है जिसमें भारत रूस का मित्र और रणनीतिक साझेदार है, लेकिन रूस की हर नीति का आंख मूंदकर समर्थक नहीं है। मोदी पुतिन से असहमति व्यक्त कर सकते हैं, युद्ध खत्म करने की अपील कर सकते हैं और साथ ही भारत-रूस रक्षा साझेदारी को भी आगे बढ़ा सकते हैं, यही भारत की स्वतंत्र और बहुध्रुवीय विदेश नीति की असली ताकत है।
उधर, मोदी और पुतिन की आज की मुलाकात से जुड़ी सबसे बड़ी खबर यह है कि मॉस्को भारत के सामने केवल हथियार बेचने का प्रस्ताव नहीं रख रहा, बल्कि रक्षा तकनीक, संयुक्त उत्पादन और संभावित संयुक्त विकास का ऐसा पैकेज रख रहा है, जिसका सीधा असर एशिया से लेकर वैश्विक सामरिक समीकरणों तक दिखाई दे सकता है। रूस ने भारत में Su-57 पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के संयुक्त उत्पादन, इंजन तकनीक साझा करने, अतिरिक्त S-400 प्रणालियों, Pantsir-S1M, आधुनिक रडार और रणनीतिक पनडुब्बियों से जुड़े प्रस्ताव सामने रखे हैं।
हम आपको बता दें कि सबसे बड़ा दांव Su-57 पर है। रूस भारत को दो स्क्वाड्रन विमान सीधे देने के साथ भारत में तीन से पांच अतिरिक्त स्क्वाड्रनों के संयुक्त उत्पादन का प्रस्ताव दे रहा है। इससे भी आगे बढ़कर मॉस्को Su-57 के इंजन से जुड़ी तकनीक भारत के साथ साझा करने को तैयार है, ताकि उसके महत्वपूर्ण हिस्सों का निर्माण भारत में हो सके। हालांकि यह तकनीकी सहयोग Su-57 की खरीद से जुड़ा हुआ है। यह प्रस्ताव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत अपनी स्वदेशी AMCA परियोजना के आने तक पांचवीं पीढ़ी की लड़ाकू क्षमता में संभावित अंतर को भरने के विकल्प तलाश रहा है।
लेकिन भारत आंख बंद करके कोई फैसला करने के मूड में नहीं है। भारतीय वायुसेना की प्राथमिकता फिलहाल 114 Rafale, AMCA और यूरोपीय FCAS में भागीदारी पर बनी हुई है। Su-57 को लेकर भारतीय चिंताएं नई नहीं हैं। 2018 में भारत FGFA कार्यक्रम से बाहर निकल चुका है। उस समय बढ़ती लागत, इंजन की क्षमता, सीमित stealth, तकनीक हस्तांतरण और रूस की परियोजना के प्रति प्रतिबद्धता जैसे सवाल उठे थे। भारत ने प्रारंभिक डिजाइन चरण में 1,483 करोड़ रुपये लगाए थे और आगे 127 विमानों के लिए लगभग 35 अरब डॉलर की लागत का अनुमान सामने आया था। इसलिए इस बार रूस की पेशकश को भारत की जरूरतों और तकनीकी शर्तों की कसौटी पर ही परखा जाएगा।
दूसरी बड़ी परियोजना करीब 260 Su-30MKI लड़ाकू विमानों को ‘Super Sukhoi’ में बदलने की है। 11 अरब डॉलर से अधिक की इस परियोजना में AESA radar, आधुनिक avionics, electronic warfare capabilities और नए engines शामिल किए जा सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात हथियार क्षमता है। अपग्रेडेड Su-30MKI को 300 किलोमीटर से अधिक दूरी तक लक्ष्य भेदने वाली R-37M missile से लैस किया जायेगा। ऐसे में भारत की सबसे बड़ी fighter fleet की मारक क्षमता में भारी उछाल आ सकता है।
इसके साथ पांच और S-400 regiments का प्रस्ताव भी आगे बढ़ चुका है। रक्षा मंत्रालय परियोजना को मंजूरी दे चुका है और रूस ने करीब 5 अरब डॉलर की वित्तीय बोली पेश की है। इस सौदे में Make in India component नहीं है, लेकिन भारत में MRO facility स्थापित करने का प्रस्ताव दिया गया है। वहीं रूस ने भारत को S-500 देने की पेशकश भी की है लेकिन भारत फिलहाल उसके पूरी तरह ऑपरेशनल होने और वास्तविक battlefield performance का आकलन करने के बाद ही निर्णय लेना चाहता है।
Pantsir-S1M भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। यह mobile point-defence system aircraft, cruise missiles, drones और precision-guided weapons से महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों, air bases और command posts की रक्षा कर सकता है। लगभग 30 किलोमीटर की reported engagement range वाला यह सिस्टम S-400 जैसी long-range air defence के साथ एक अतिरिक्त सुरक्षा परत बना सकता है। इसके अलावा long-range radars और strategic submarines पर भी रूस की तरह से प्रस्ताव दिये गये हैं।
लेकिन भारत-रूस रिश्ता अब केवल मिसाइलों और लड़ाकू विमानों तक सीमित नहीं है। BRICS Summit से पहले विमानन क्षेत्र में भी दोनों देश buyer-seller मॉडल से joint manufacturing की दिशा में बढ़ रहे हैं। IL-114-300 और Sukhoi Superjet 100 के भारत में निर्माण पर बातचीत तेज हुई है, जबकि 105 regional turboprop aircraft की संभावित डिलीवरी और व्यवस्थाओं पर भी चर्चा है। Russia ने SJ-100, MC-21 और IL-114-300 को दिल्ली के Innoprom India में प्रदर्शित किया है। HAL और Russian United Aircraft Corporation के बीच पहले से मौजूद सहयोग इस औद्योगिक साझेदारी को नया आयाम दे सकता है।
यही नहीं, दोनों देशों की साझेदारी helicopters, remote-area connectivity और helicopter emergency medical services तक फैल रही है। BRICS के भीतर forest fires और अन्य आपदाओं से निपटने के लिए disaster-relief mechanism के रूसी प्रस्ताव का भी भारत ने समर्थन किया है। रूस सांस्कृतिक आदान-प्रदान बढ़ाने पर भी जोर दे रहा है।
देखा जाये तो सामरिक तस्वीर बिल्कुल स्पष्ट है। भारत-रूस संबंध अब पुराने हथियार सौदों की कहानी नहीं, बल्कि defence technology, aerospace manufacturing, air defence, strategic platforms और industrial cooperation के एक नए मॉडल की ओर बढ़ रहे हैं। भारत के लिए इसका अर्थ है एक साथ रणनीतिक स्वायत्तता, सैन्य क्षमता और घरेलू विनिर्माण को मजबूत करना। वहीं दुनिया के लिए संदेश इससे भी बड़ा है। पश्चिमी दबाव, प्रतिबंधों और बदलते geopolitical equations के बीच भारत और रूस की साझेदारी अगर नई तकनीक और संयुक्त उत्पादन के स्तर तक पहुंचती है, तो यह भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और multi-alignment की ताकत का प्रदर्शन होगा।
बहरहाल, BRICS की मेजबानी कर रहा भारत एक तरफ ग्लोबल साउथ की आवाज बुलंद कर रहा है, तो दूसरी तरफ मॉस्को के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों को भी नई धार दे रहा है। मोदी-पुतिन की मुलाकात ने यही संकेत दिया है कि नई विश्व व्यवस्था में भारत किसी खेमे का पिछलग्गू नहीं, बल्कि अपने हितों के हिसाब से साझेदार चुनने वाली निर्णायक शक्ति है।
-नीरज कुमार दुबे