By अभिनय आकाश | Sep 07, 2026
संयुक्त राष्ट्र संघ यानी कि यूनाइटेड नेशंस की जनरल असेंबली में दुनिया का पारंपरिक नक्शा बदलने का प्रस्ताव पारित हो गया है। नक्शे को बदलने के लिए अफ्रीकी देश टोगो की ओर से करेक्ट द मैप मुहिम चलाई गई थी। इसे अफ्रीकन यूनियन यानी कि एयू का समर्थन मिला था। प्रस्ताव में खासतौर पर अफ्रीका का आकार और हिस्सों को ज्यादा सही ढंग से दिखाने की बात कही गई थी। यूएन में इस प्रस्ताव को भारत, फ्रांस और इंग्लैंड समेत 164 देशों का समर्थन मिला है। जबकि एकमात्र अमेरिका ने इसके खिलाफ वोट किया है। इसके अलावा छह देशों स्टोनिया, जॉर्जिया, लिदवानिया, मुलदोवा, सर्बिया और यूक्रेन ने वोटिंग से दूरी बनाकर रखी। यूएन में हुए इस मतदान से दुनिया भर के संस्थानों में इस्तेमाल होने वाले नक्शों में बदलाव आएगा। यह खबर कई सवालों को जन्म देती है। जैसे कि क्या अब दुनिया का नक्शा बदल जाएगा? मरकेटर मैप इक्वल अर्थ मैप में क्या अंतर है? आखिर 450 साल पुराने नक्शे ने दुनिया को इतना अलग क्यों दिखाया और नए नक्शे में अफ्रीका अचानक इतना बड़ा नजर क्यों आया? संयुक्त राष्ट्र महासभा यूएन ने एक नए विश्व मानचित्र को मंजूरी दी है जिसमें महाद्वीपों का आकार एक दूसरे के मुकाबले ज्यादा सही दिखाया गया है।
मान लीजिए आपके हाथ में एक सेब है। सेब एकदम गोल। ठीक हमारी पृथ्वी की तरह। अब अगर आप उस सेब का छिलका उतारकर मेज पर बिल्कुल सपाट रख दें यानी समतल रख दें और फैलाने की कोशिश करेंगे तो वह किनारे से फटेगा या फिर आपको उसे जबरदस्ती खींचना पड़ेगा। यह भी हो सकता है। कुछ ऐसा उदाहरण आप संतरे को भी लेकर देख सकते हैं। जब आप संतरे को छीलते हैं और नीज पर रखते हैं तो शायद वो फैल भी सकता है या टूट भी सकता है। गोल धरती को चौकोर पन्ने पर उतारते वक्त भी बिल्कुल यही परेशानी आती है। करीब 450 साल पहले 1569 में गेराड्स मॉकेटर ने यही नक्शा तैयार किया था। उस दौर में हवाई जहाज नहीं थे। लोग समंदर में जहाजों से महीनों सफर करते। नाविक पानी में भटक ना जाए इसलिए मार्केटर ने नक्शे में रास्तों और दिशाओं को एकदम सीधी रेखाओं में रखा ताकि जहाजों को सही दिशा मिले। दिशाएं सीधी रखने के चक्कर में एक बड़ी भूल हुई। मार्केटर नक्शा समंदर में जहाजों को सही रास्ता दिखाने के लिए तो शानदार था लेकिन उसने दुनिया के देशों का असली आकार खराब कर दिया था।
यह प्रस्ताव गैर-बाध्यकारी है। मतलब, दुनियाभर में इस्तेमाल होने वाले सभी नक्शों को तत्काल मर्केटर से बदलना अनिवार्य नहीं है। मुख्य उद्देश्य अधिक सटीक और समानुपातिक कार्टोग्राफिक मेथेडोलॉजी को प्रोत्साहित करना है। वोट से पहले UN ने टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डूसी के हवाले से कहा, 'मैप दुनिया के बारे में हमारी समझ को आकार देते हैं। वे शिक्षा को गाइड करते है, कल्पना को बढ़ावा देते है और सामूहिक सोच पर असर डालते हैं।
धरती पर इंसानी सफर की बुनियाद अफ्रीका की सरजमीं से ही पड़ी, जिसे इतिहास में ‘द ग्रेट माइग्रेशन’ का नाम मिला। वैज्ञानिकों का भी यही मानना है कि इसी महाद्वीप से निकलकर इंसान दुनिया के कोने-कोने में बसे और सभ्यताओं का विस्तार हुआ। मगर वक्त का अजीब फेर देखिए—जिस भूभाग ने पूरी मानव जाति को पहचान दी, वही सदियों तक दुनिया के कागजों पर अपनी सही भौगोलिक पहचान और वास्तविक आकार के लिए संघर्ष करता रहा। अब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक अहम प्रस्ताव को हरी झंडी दी है, जो दुनिया के सामने देशों और महाद्वीपों का बिल्कुल सटीक और यथार्थवादी खाका पेश करेगा। दरअसल, गोल घूमती धरती को किसी सपाट कागज पर हूबहू उतार पाना कभी आसान नहीं रहा। 16वीं सदी में जब तकनीक बेहद सीमित थी, तब 1569 में भूगोलवेत्ता गेरार्डस मर्केटर ने समुद्री जहाजों के रास्ते आसान करने के लिए एक नक्शा तैयार किया। उस दौर के व्यापार और नौवहन के लिए तो वह पैमाना कारगर रहा, लेकिन उसने भूगोल की सच्चाई को हमेशा के लिए उलझा दिया। ध्रुवों के पास वाले इलाके विशाल दिखने लगे और भूमध्य रेखा के करीब मौजूद अफ्रीका जैसे विशाल महाद्वीप नक्शे पर सिमट कर रह गए। कारोबार की सहूलियत के लिए बना वही खाका धीरे-धीरे देशों के आत्मसम्मान और उनकी अस्मिता की लड़ाई बन गया। अफ्रीकी मुल्क टोगो ने इस गैर-बराबरी को वैश्विक मंच पर मुखरता से उठाया, क्योंकि किसी भी समाज के लिए नक्शा सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि उसकी पहचान का आईना होता है। किसी भी अनजान मुल्क में पैर रखने से पहले इंसान नक्शे की नजर से ही उससे नाता जोड़ता है, और सही पहचान के साथ इस सफर को महसूस करने का अपना एक अलग गौरव है।
भारत ने इस प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया है। लेकिन भारत ने साथ ही साफ किया है कि इसका मतलब किसी एक खास वर्ल्ड मैप को मंजूरी देना नहीं है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि इस प्रस्ताव का देशों की सीमाओं, विवादित इलाकों या जगहों के नाम से कोई लेना देना नहीं है। भारत ने यह भी साफ़ किया है कि भारत का क्षेत्र जिसमें जम्मू कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश भी शामिल है, उसे भारत के आधिकारिक नक्शे के मुताबिक ही दिखाया जाना चाहिए। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत की सीमा या क्षेत्र को गलत या भ्रामक तरीके से दिखाना भारत को मंज़ूर नहीं है। और भारत ने साफ़ कहा है कि अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को लेकर उसका रुख बिल्कुल स्पष्ट है। इस मुद्दे पर भारत ना तो अपना रुख बदलेगा और ना ही कोई समझौता करेगा। तो बेसिकली भारत ने यूएन के इस प्रस्ताव का समर्थन तो किया है लेकिन अपनी सीमा औरसंप्रभुता को लेकर अपना रुख बिल्कुल साफ और गैर समझौतावादी रखा है।