किसान आंदोलन के नाम पर हुए बवाल का जो सच सामने आया है उससे देश को सतर्क हो जाना चाहिए

By नीरज कुमार दुबे | Oct 14, 2024

देश ने हाल के कुछ वर्षों में कई आंदोलन देखे। सबसे पहले जन लोकपाल के लिए आंदोलन हुआ। इस आंदोलन को मिले समर्थन के बलबूते अरविंद केजरीवाल सत्ता की सीढ़ियां चढ़ कर अपनी मंजिल पर पहुँच गये लेकिन दिल्ली में जन लोकपाल नहीं बनाया। देश ने दिल्ली में हरियाणा के कुछ पहलवानों का आंदोलन भी देखा। यह पहलवान राजनीति के अखाड़े में कूदने के लिए उसी खेल को नुकसान पहुँचाते रहे जिसकी बदौलत उन्होंने दौलत और शोहरत कमाई। देश ने किसान आंदोलन भी देखा। किसानों के कल्याण और उनके बेहतर भविष्य के लिए मोदी सरकार जो तीन कानून लेकर आई उसके बारे में भ्रम फैला कर देशभर में किसानों का आंदोलन खड़ा कर दिया गया जिसके चलते सरकार को तीनों कृषि कानून वापस लेने पड़े। खुद को किसान कहने वाले आंदोलनकारियों ने कानून व्यवस्था का भी खूब मजाक बनाया और सरकार को झुकाने का अभियान सफलतापूर्वक चलाकर दिखाया। मगर अब इस किसान आंदोलन का सच एक प्रमुख आंदोलनकारी ने ही देश के सामने रख दिया है। 

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आम किसानों का कैसे अपने राजनीतिक हितों के लिए इन तथाकथित किसान नेताओं ने दुरुपयोग किया यह हमने लोकसभा चुनावों के दौरान भी देखा था। तीनों कृषि कानून काफी पहले ही यानि साल 2022 के अंत में ही वापस लिये जा चुके थे लेकिन उसके बावजूद 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान पंजाब में भाजपा के सभी उम्मीदवारों के घर के बाहर बड़ी संख्या में किसानों को धरने पर बैठा दिया गया था। पंजाब में चुनाव प्रचार की कवरेज के दौरान जब मैंने संगरूर, लुधियाना, अमृतसर, पटियाला आदि क्षेत्रों में धरने पर बैठे लोगों से पूछा कि आपकी मांगें क्या हैं तो सबका जवाब एक ही था कि सारी समस्याओं के हल तक हम यहां से नहीं हटेंगे। जब मैंने पूछा कि समस्याएं क्या हैं तो हर जगह से यही जवाब मिला कि स्कूल अच्छे बनने चाहिए, अस्पतालों में सारी सुविधाएं होनी चाहिए, सड़कें अच्छी बननी चाहिए। स्पष्ट था कि यह धरना प्रदर्शन भी एक टूलकिट का हिस्सा था। लोकसभा चुनावों के लिए मतदान होते ही यह प्रदर्शनकारी भाजपा उम्मीदवारों के घर के बाहर से हट गये। ऐसा लगा कि उनकी सारी समस्याओं का या तो समाधान हो गया है या टूलकिट के तहत दिया गया टास्क पूरा हो गया है।

वैसे जहां तक चढ़ूनी की बात है तो आपको बता दें कि उन्होंने हरियाणा में कुरुक्षेत्र की पेहोवा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था। यहां जनता ने मात्र 1170 वोट देकर उनकी जमानत तक जब्त करा दी। हम आपको यह भी याद दिला दें कि इन तथाकथित किसान नेताओं ने 2022 के पंजाब विधानसभा चुनावों में भी किस्मत आजमाई थी। पंजाब की 31 में से 22 किसान यूनियनों ने संयुक्त समाज मोर्चा नामक पार्टी बनाकर चुनाव लड़ा था और किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल को अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार भी घोषित किया था। लेकिन एक को छोड़कर इनके बाकी उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा पाये थे। अब हरियाणा में भी इस पार्टी का जो हश्र हुआ है उससे साफ है कि आम जनता और आम किसानों का समर्थन इन लोगों के पास कभी भी नहीं था। विदेशी इशारे पर और विदेशी पैसे के बलबूते भारत की छवि को खराब करने और सरकार के खिलाफ माहौल बनाने का जो षड्यंत्र रचा गया था उसका सच सामने आ चुका है। यह समय है कि देश सतर्क हो जाये और गैर-राजनीतिक आंदोलनों की असली मंशा को पहचाने।

बहरहाल, चढ़ूनी के बयान पर हमलावर होते हुए भाजपा ने कहा है कि जिस किसान आंदोलन को सहज और स्वाभाविक बताया गया था, वह दरअसल कांग्रेस की ओर से ‘प्रायोजित और पोषित’ था। भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा है कि चढ़ूनीजी का जो वक्तव्य आया है, उसने एक बार फिर उजागर कर दिया है कि कांग्रेस की जमीन के अंदर क्या छुपा हुआ है। उन्होंने कहा है कि इससे एक बात बहुत साफ हो गई है कि जिस आंदोलन को सहज और स्वाभाविक आंदोलन कहा जा रहा था, वह कांग्रेस के द्वारा प्रायोजित और पोषित आंदोलन था।

-नीरज कुमार दुबे

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