अरबों और यहूदियों के बीच छिड़ी लड़ाई को समाप्त करवाने के प्रयास करे भारत

By डॉ. वेदप्रताप वैदिक | May 17, 2021

ईद के मौके पर अफगान सरकार और तालिबान ने तीन दिन का युद्ध विराम घोषित कर रखा है लेकिन देखिए कि यहूदियों, ईसाइयों और मुसलमानों के खास तीर्थ-स्थल में क्या हो रहा है। यरुशलम, गाजा और आस-पास के इलाकों में सैंकड़ों लोग हताहत हो रहे हैं। फलीस्तीनी संगठन हमास ने यहूदी बस्तियों पर सैंकड़ों मिसाइल बरसा दिए हैं और जवाब में इजराइल ने अरब बस्तियों पर इतने जबर्दस्त हमले बोल दिए हैं कि जो लोग मरने से बच गए, वे उन इलाकों को खाली करके दूर-दूर भाग रहे हैं।

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संयुक्त राष्ट्र संघ ने दो राज्यों— इजराइल और फलस्तीन— का प्रस्ताव भी पारित किया है लेकिन उस पर अमल होना तो बहुत दूर की बात है, जिन इलाकों पर इजराइल ने 1967 के युद्ध में कब्जा कर लिया था, उन पर वह न केवल यहूदियों की बस्तियां बढ़ाता जा रहा है बल्कि वह अरबों को वहां से खदेड़ता जा रहा है। आजकल जो युद्ध का माहौल बना है, उसका भी तात्कालिक कारण यही है। अल-अक्सा मस्जिद के निकटवर्ती शेख जर्रा इलाके से अरबों को खदड़ने के कारण ही यह दंगा भड़का है। हमास और इजराइली फौजों ने मिसाइल तो बाद में दागे हैं, चार-पांच दिन पहले फलस्तीनियों और इजराइलियों के बीच सीधे झगड़े हुए हैं। उन दंगों और मारपीट ने ही अब युद्ध का रूप धारण कर लिया है। इस सांप्रदायिक दंगे को युद्ध का रूप देने का एक कारण यह भी हो सकता है कि इजराइल में आजकल भयंकर अस्थिरता चल रही है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता आजकल डांवाडोल है। उनके लिए राष्ट्रीय महानायक बनने का यही मौका है। उन्होंने अत्यंत उत्तेजक भाषण भी दिया है। ऐसा भाषण कि उनके विरोधी भी उन्हें अपना नेता मानने के लिए मजबूर हो जाएं। इस सारे मामले में भारत की भूमिका बिल्कुल तटस्थ है, जो ठीक है लेकिन वह मूकदर्शक बना रहे, यह उचित नहीं है। इजराइल से भारत के संबंध नरसिंहराव के जमाने से काफी घनिष्ठ हो गए हैं और फलिस्तीनी नेता यासिर अराफात तो भारत के प्रिय मित्र रहे ही हैं। भारत चाहे तो अब भी काफी सार्थक भूमिका निभा सकता है।

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

(लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)

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