By नीरज कुमार दुबे | Sep 17, 2026
कहने को तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप नरेंद्र मोदी को अपना अच्छा दोस्त कहते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि शायद वह मोदी को अब तक अच्छे से जान ही नहीं पाए हैं। देखा जाये तो जो लोग नरेंद्र मोदी को जानते नहीं, वह अक्सर धमकियों, प्रतिबंधों और आर्थिक दबाव के सहारे उन्हें झुकाने का सपना देखते हैं। लेकिन मोदी का संकल्प साफ है कि भारत के हितों से समझौता नहीं होगा और देश को किसी विदेशी दबाव के आगे झुकने नहीं देना है। उनके हर फैसले में यही दृढ़ता दिखाई देती है। दूसरी ओर, ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही भारत पर दबाव बनाने के लिए शुल्क, व्यापारिक दबाव और रूस से तेल खरीद बंद कराने जैसी तमाम कोशिशें कीं, लेकिन नई दिल्ली ने हर बार अपने राष्ट्रीय हित को सर्वोच्च रखा। अब अमेरिका एक बार फिर टैरिफ रूपी आर्थिक हथियार लेकर मैदान में उतरा है, लेकिन मोदी सरकार ने भी बिना देर किए वाशिंगटन को साफ संदेश दे दिया है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हित किसी विदेशी दबाव की कीमत पर तय नहीं होंगे।
लेकिन भारत ने भी अमेरिका को उसी क्षण जवाब दे दिया। भारतीय विदेश मंत्रालय ने दो टूक कहा कि भारत अपने 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत बदलती बाजार परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग स्रोतों से ऊर्जा खरीदता रहेगा। इतना ही नहीं, नई दिल्ली ने अमेरिका को याद दिलाया कि इस कदम के भारत-अमेरिका संबंधों के साथ-साथ पूरे अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों के बारे में अमेरिकी पक्ष को पहले ही उच्च स्तर पर स्पष्ट रूप से बताया जा चुका है। इसके साथ ही विदेश मंत्रालय ने महत्वपूर्ण संदेश देते हुए कहा कि भारत अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगा। यानी अमेरिका शुल्क की धमकी दे सकता है, लेकिन भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा की कीमत पर किसी विदेशी दबाव के आगे झुकने के लिए तैयार नहीं है।
दरअसल, जिस विधेयक को अब ‘लिंडसे ओ. ग्राहम रूस और ईरान प्रतिबंध अधिनियम 2026’ कहा जा रहा है, उसकी कहानी डेढ़ साल पुरानी है। अप्रैल 2025 में लिंडसे ग्राहम और रिचर्ड ब्लूमेंथल ने रूस के खिलाफ कड़े प्राथमिक और द्वितीयक प्रतिबंधों की पहल की थी। इसके बाद लंबे समय तक इसे कांग्रेस और प्रशासन के बीच समर्थन जुटाने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। जुलाई 2026 में व्हाइट हाउस से सहमति बनने के बाद इसकी राह खुली। अगस्त में सीनेट ने इसे 86 के मुकाबले 11 मतों से पारित किया और 16 सितंबर को प्रतिनिधि सभा ने 262 के मुकाबले 159 मतों से इसे मंजूरी दे दी।
यह विधेयक अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस के तेल और गैस के सबसे बड़े खरीदारों पर सौ प्रतिशत तक शुल्क लगाने का अधिकार देता है। भारत और चीन इसके निशाने पर हैं। इसके पीछे अमेरिकी रणनीति रूस की ऊर्जा आय को चोट पहुंचाने की है, ताकि यूक्रेन युद्ध के लिए मास्को को मिलने वाले आर्थिक संसाधनों पर दबाव बनाया जा सके। विधेयक में रूस के ऊर्जा और रक्षा क्षेत्रों के साथ-साथ प्रतिबंधों से बचने वाले उसके जहाजी बेड़े पर भी शिकंजा कसने का प्रावधान है। लेकिन अमेरिका शायद यह भूल रहा है कि भारत रूस से तेल किसी राजनीतिक एहसान के लिए नहीं खरीद रहा।
भारत की जरूरत है सस्ती, विश्वसनीय और लगातार उपलब्ध ऊर्जा। 2022 में रूस भारत के लिए कोई बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता नहीं था। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप द्वारा रूसी तेल पर प्रतिबंध लगाए जाने से रूस का कच्चा तेल भारी छूट पर उपलब्ध हुआ और भारत ने अपने आर्थिक हित में इसे खरीदना शुरू किया। इसके बाद रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया। वित्त वर्ष 2026 में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूसी हिस्सेदारी 30.3 प्रतिशत रही और करीब 134.7 अरब डॉलर के कुल आयात में रूस से आने वाले तेल की कीमत 40.8 अरब डॉलर रही। जुलाई 2026 में तो भारत के आयातित तेल में रूसी हिस्सेदारी आधे से भी ज्यादा पहुंच गई।
इसके अलावा, आज वैश्विक परिस्थितियों को देखें तो वह भी सामान्य नहीं हैं। पश्चिम एशिया में युद्ध और आपूर्ति संकट ने तेल बाजार को बुरी तरह प्रभावित किया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधाएं हैं और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत भी दबाव में हैं। भारत 40 से अधिक देशों से कच्चा तेल खरीदता है, लेकिन रूस और पश्चिम एशिया उसकी ऊर्जा सुरक्षा के मुख्य आधार बने हुए हैं। ऐसे समय में अचानक रूसी तेल बंद करना केवल रूस के खिलाफ फैसला नहीं होगा, बल्कि भारत की अपनी ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर डाल सकता है।
यही कारण है कि पिछले साल अमेरिकी दंडात्मक शुल्क भी भारत को रूसी तेल से पूरी तरह दूर नहीं कर सके। भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी तेल की खरीद में बड़ी कटौती तब की जब रूस की प्रमुख तेल कंपनियों पर सीधे प्रतिबंध लगाए गए और व्यापार करना कठिन हो गया। लेकिन जैसे ही पश्चिम एशिया में आपूर्ति संकट गहराया, भारत ने फिर रूसी तेल की खरीद बढ़ा दी। जुलाई में रूसी तेल की खरीद अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। इससे एक बात साफ होती है कि भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा कोई सौदेबाजी का विषय नहीं है।
यहां इस पूरे घटनाक्रम का सामरिक महत्व सामने आता है। अमेरिका रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना चाहता है। जबकि रूस भारत की ऊर्जा सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार बना हुआ है। चीन भी रूसी ऊर्जा का बड़ा खरीदार है। साथ ही भारत एक साथ अमेरिका, रूस, चीन, ईरान तथा पश्चिम एशिया के देशों के साथ अपने हितों का संतुलन साध रहा है। ऐसे में नई दिल्ली के सामने चुनौती किसी एक खेमे में जाने की नहीं, बल्कि अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बचाए रखने की है।
इसके अलावा, ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी की पुतिन और जिनपिंग के साथ बढ़ती कूटनीतिक निकटता ने जिस बदलती विश्व व्यवस्था की तस्वीर अमेरिका के सामने रखी, उसके कुछ ही दिनों बाद अमेरिकी कांग्रेस का रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर शिकंजा कसने वाला कदम कई सवाल खड़े करता है। सवाल उठता है कि क्या वाशिंगटन को यह स्वीकार करना मुश्किल हो रहा है कि दुनिया अब उसकी शर्तों पर नहीं चलती? देखा जाये तो भारत, रूस और चीन का एक मंच पर आना और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था तथा संप्रभु समानता की वकालत करना उस अमेरिकी वर्चस्ववादी सोच के लिए सीधी चुनौती है, जिसमें लंबे समय से आर्थिक ताकत को कूटनीतिक दबाव के हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा है। लेकिन बदलती दुनिया का संदेश साफ है। भारत सहित उभरती शक्तियां अब अपने राष्ट्रीय हितों का फैसला किसी बाहरी राजधानी के इशारे पर नहीं करेंगी।
खैर...अब गेंद ट्रंप के पाले में है। अमेरिकी कांग्रेस ने उन्हें सौ प्रतिशत तक शुल्क लगाने की शक्ति दे दी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सौ प्रतिशत शुल्क स्वतः लागू हो गया। अंतिम निर्णय ट्रंप को करना है। शुल्क कितना होगा, किन वस्तुओं पर लागू होगा और कब लागू होगा, इन सबका असर भारत-अमेरिका व्यापार पर पड़ेगा। भारत का रुख स्पष्ट है कि ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं होगा, विकल्पों का विस्तार जारी रहेगा, अमेरिका से बातचीत जारी रहेगी और राष्ट्रीय हितों पर कोई एकतरफा समझौता नहीं होगा। अमेरिकी शुल्क चाहे जितना बड़ा हो, भारत के लिए असली सवाल किसी एक देश को खुश करना नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के लिए ऊर्जा, अर्थव्यवस्था और रणनीतिक स्वायत्तता सुरक्षित रखना है। विदेश मंत्रालय पहले ही अपना रुख स्पष्ट कर चुका है। भारत अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगा।
-नीरज कुमार दुबे