Surgical Strike की उस रात भारत ने दुश्मनों को कर दिया था स्पष्ट, छत पर छिपो या पाताल में, भारतीय सुरक्षा बल हर हाल में ढूँढ़ कर मार गिराएंगे

By नीरज कुमार दुबे | Sep 29, 2026

दस साल पहले 28-29 सितंबर की रात भारत ने नियंत्रण रेखा पार कर आतंकवाद के उन ठिकानों पर प्रहार किया था, जिन्हें लंबे समय से सीमा पार आतंक की मशीनरी का हिस्सा माना जाता रहा था। यह केवल कुछ आतंकी ठिकानों पर की गई सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि भारत की सुरक्षा नीति में एक निर्णायक मोड़ था। उरी हमले में 19 भारतीय सैनिकों की शहादत के बाद हुई 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक ने यह संकेत दिया था कि सीमा पार से आतंकवाद को केवल कूटनीतिक या सीमित सैन्य प्रतिक्रिया तक सीमित रखने का पुराना ढांचा बदल रहा है।

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देखा जाये तो असल बदलाव समझने के लिए 2016 से पहले की तस्वीर देखनी होगी। संसद हमले और 2008 के मुंबई हमले जैसे बड़े आतंकवादी हमलों के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी रणनीतिक दुविधा यही थी कि पाकिस्तान की धरती से संचालित आतंकवाद का सैन्य जवाब देने पर कहीं दो परमाणु-संपन्न देशों के बीच व्यापक युद्ध न छिड़ जाए। इसी आशंका ने लंबे समय तक भारत की नीति को संयम की सीमा में रखा। लेकिन उरी ने इस गणित को बदल दिया।

28-29 सितंबर 2016 को भारतीय विशेष बलों ने नियंत्रण रेखा पार कर पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में आतंकी घुसपैठ के लिए इस्तेमाल किए जा रहे ठिकानों को निशाना बनाया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि सरकार ने इस कार्रवाई को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया। संदेश बिल्कुल स्पष्ट था कि आतंकवाद और उसके बुनियादी ढांचे के बीच दूरी बनाकर भारत को रोकने की रणनीति अब पहले जैसी प्रभावी नहीं मानी जाएगी।

यहीं से भारत की प्रतिरोधक रणनीति का नया अध्याय शुरू हुआ। 2019 में पुलवामा हमले के बाद बालाकोट में हवाई कार्रवाई ने जवाब की भौगोलिक सीमा को नियंत्रण रेखा से आगे बढ़ाया। यानी 2016 में जहाँ जमीनी कार्रवाई नियंत्रण रेखा के पार आतंकी ठिकानों तक पहुँची थी, वहीं बालाकोट एअर स्ट्राइक ने यह दिखाया कि भारत आवश्यकता पड़ने पर पाकिस्तान के भीतर भी आतंकवादी बुनियादी ढांचे को निशाना बना सकता है।

फिर 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर ने इस रणनीति को एक और स्तर पर पहुँचा दिया। 7 मई 2025 को पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में नौ आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया। मोदी सरकार ने इसे केंद्रित और नियंत्रित कार्रवाई बताया तथा कहा कि पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना नहीं बनाया गया। यानी उरी, बालाकोट और ऑपरेशन सिंदूर, यह तीनों एक जैसी सैन्य कार्रवाइयाँ नहीं थीं। इनके तरीके, हथियार, लक्ष्य और भौगोलिक दायरे अलग थे। लेकिन इनके पीछे दिखाई देने वाला रणनीतिक संदेश एक ही था कि भारत आतंकवादी हमले और उसके पीछे मौजूद बुनियादी ढांचे को पूरी तरह अलग-अलग घटनाएँ मानकर नहीं चलेगा।

इस तरह 2016 का अभियान भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा सोच में निर्णायक बदलाव था। भारत ने तथाकथित ‘रणनीतिक संयम’ से आगे बढ़कर ऐसी प्रतिरोधात्मक कार्रवाई की दिशा पकड़ी जिसमें पूर्ण युद्ध की सीमा पार किए बिना अपनी क्षमता दिखाई गई। यही इस बदलाव का सबसे बड़ा रणनीतिक अर्थ है। इसका निशाना केवल आतंकवादी संगठन नहीं, बल्कि प्रॉक्सी युद्ध का पूरा गणित है। हालांकि भारत की कार्रवाइयों के बावजूद प्रॉक्सी युद्ध समाप्त नहीं हुआ है। खतरे ने अपना रूप बदला है। ड्रोन के जरिए हथियार और मादक पदार्थ भेजना, छोटे प्रशिक्षित घुसपैठ दल और कम दृश्यता वाली आतंकवादी कार्रवाइयाँ इसी बदलती रणनीति का हिस्सा मानी जा रही हैं। जम्मू क्षेत्र और पीर पंजाल के दक्षिण में बढ़ा सुरक्षा फोकस भी इसी बदलाव को दर्शाता है।

बहरहाल, दस साल पहले सवाल था कि आतंकी हमले के बाद भारत जवाब देगा या नहीं? उरी के बाद वह सवाल बदल गया। अब सवाल यह है कि जवाब किस स्तर पर होगा, उसकी सीमा क्या होगी और आतंकवाद के पीछे मौजूद ढांचे पर उसकी कीमत कितनी भारी पड़ेगी। 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक ने इस बदलाव को दृश्यमान किया; बालाकोट ने उसे आगे बढ़ाया और ऑपरेशन सिंदूर ने उसकी अगली तस्वीर सामने रख दी। यही बीते दशक का सबसे बड़ा सामरिक संदेश है।

-नीरज कुमार दुबे

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