By अभिनय आकाश | Oct 06, 2026
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने रूस-यूक्रेन युद्ध और वैश्विक शांति प्रयासों पर भारत का रुख एक बार फिर स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि युद्ध के समाधान के लिए दोनों पक्षों का एक साथ बातचीत की मेज पर आना बेहद जरूरी है। रूस की गैरमौजूदगी में आयोजित होने वाले तथाकथित शांति सम्मेलनों पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि जिस बैठक में रूस ही शामिल न हो, वैसी बैठकों का कोई वास्तविक मतलब नहीं रह जाता। विदेश मंत्री ने कहा कि संघर्ष से जुड़े कई पक्ष अब एक-दूसरे से सीधे तौर पर बात नहीं कर रहे हैं और उनके बीच का संपर्क पूरी तरह टूट चुका है। जब दोनों पक्षों के बीच संवाद का अभाव होता है, तो वे एक-दूसरे के इरादों और कदमों को लेकर सिर्फ कयास लगाते रहते हैं, जिससे कभी विश्वास का माहौल नहीं बन सकता। जयशंकर ने कहा कि भारत लगातार यह मानता रहा है कि दोनों देशों को सीधे बातचीत करनी चाहिए। उन्होंने आगे बताया कि हाल के महीनों में स्थिति तब और संवेदनशील हो गई जब जुलाई में रूस और यूक्रेन, दोनों की ओर से नागरिक जहाजों को निशाना बनाया गया। भारत ने इन हमलों और काला सागर में नागरिक जहाजों की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है।
अभी भी इस बारे में बातचीत चल रही है। प्रधानमंत्री ने बिश्केक में राष्ट्रपति पुतिन से मुलाकात की थी। और उसके बाद उन्होंने मुझे कीव जाने के लिए कहा। मैं कीव गया और राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की और अपने समकक्ष विदेश मंत्री आंद्रे सबिहा से मिला। फिर मैं वापस आया और प्रधानमंत्री को जानकारी दी। राष्ट्रपति पुतिन ब्रिक्स सम्मेलन के लिए दिल्ली आए थे और उनकी आगे भी बातचीत हुई थी; हम अभी भी दोनों पक्षों के संपर्क में हैं। तो मुझे लगता है कि यह ऐसी चीज़ है जिस पर हमें नज़र रखनी होगी। ज़ाहिर है, यह कोई आसान स्थिति नहीं है। और यह ऐसी चीज़ नहीं है जिसके बारे में कोई पूरे भरोसे के साथ कह सके कि कोई नतीजा निकलेगा ही। लेकिन यह निश्चित रूप से कोशिश करने लायक है क्योंकि, जैसा कि मैंने कहा, हम ग्लोबल साउथ की चिंताओं को समझते हैं। अगर ब्लैक सी से अनाज का निर्यात रुकता है, तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय अनाज बाज़ार पर पड़ेगा। अगर एनर्जी का निर्यात रुकता है, तो इसका ग्लोबल साउथ पर बहुत ज़्यादा असर पड़ेगा। अगर फर्टिलाइज़र का निर्यात रुकता है, तो भी वही होगा। तो बेशक हमारे अपने हित हैं, लेकिन हमारे हितों से ज़्यादा ग्लोबल साउथ के व्यापक हित भी हैं और सच कहूँ तो उन पक्षों के हित भी हैं... कि अगर वे किसी सीमित दायरे में भी किसी बात पर सहमत हो सकें, तो हमें लगता है कि मौजूदा हालात में यह एक बड़ी सकारात्मक बात होगी।