By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Sep 29, 2026
इस्पात सचिव संदीप पौंड्रिक ने मंगलवार को कहा कि सरकार उद्योग की प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ाने और आयात संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए नयी राष्ट्रीय इस्पात नीति पर काम कर रही है। इस नीति का मसौदा करीब एक सप्ताह में सार्वजनिक किया जाएगा और हितधारकों से इस पर सुझाव मांगे जाएंगे। उन्होंने कहा कि नयी नीति में भारतीय इस्पात उद्योग के लिए 2047 तक का खाका तय किया जाएगा। इस्पात मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी ने साथ ही बताया कि इससे जुड़ी एक योजना तैयार की जा रही है, जिसके तहत इस्पात क्षेत्र में उत्सर्जन कम करने को प्रोत्साहित करने के लिए 5,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।
इसके साथ ही भारतीय इस्पात उद्योग, खासकर छोटे इस्पात उत्पादकों को प्रौद्योगिकी और कीमत के मामले में प्रतिस्पर्धी बनाने पर भी जोर दिया जाएगा। सरकार ने 2017 में राष्ट्रीय इस्पात नीति पेश की थी, जिसका लक्ष्य अन्य पहलुओं के साथ-साथ 2030 तक भारत की इस्पात विनिर्माण क्षमता बढ़ाकर 30 करोड़ टन करना, खपत बढ़ाना और कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करना था। अधिकारी ने हालांकि बताया कि मौजूदा चुनौतियों और जरूरतों को देखते हुए 2017 की नीति की ‘‘फिर से समीक्षा किए जाने की जरूरत थी।’’
इस्पात सचिव ने कहा कि 2017 के बाद कृत्रिम मेधा (एआई), मशीन लर्निंग (एमएल) और तकनीकी उन्नयन जैसी उभरती प्राथमिकताओं पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। इसके अलावा, बढ़ती खपत और क्षमता के साथ वैश्विक इस्पात क्षेत्र में भारत की स्थिति भी मजबूत हुई है। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया का एकमात्र प्रमुख देश है, जहां इस्पात उत्पादन क्षमता और खपत इतनी तेजी से बढ़ रही है। इसके साथ ही कार्बन उत्सर्जन में कमी और टिकाऊपन जैसी चुनौतियां भी हैं।
पौंड्रिक ने कहा, ‘‘इसीलिए हम नयी नीति ला रहे हैं ताकि 2047 तक अगले दो दशकों के लिए एक खाका तैयार हो।’’ कार्यक्रम में अधिकारी द्वारा दिए गए प्रस्तुतीकरण के अनुसार, नयी नीति में सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) के लिए विभिन्न उपायों का प्रस्ताव है। उन्होंने कहा, ‘‘हम ‘विकसित भारत इस्पात’ नाम से एक योजना प्रस्तावित कर रहे हैं, जो केवल छोटे इस्पात उत्पादकों के लिए होगी।
इसमें उन्हें उनके उत्पादन के आधार पर प्रोत्साहन दिया जाएगा, जो कार्बन उत्सर्जन में कमी पर निर्भर करेगा। कार्बन उत्सर्जन में कमी बेहतर प्रौद्योगिकी, बेहतर कच्चे माल और नवीकरणीय ऊर्जा के अधिक इस्तेमाल से ही की जा सकती है।’’ उन्होंने कहा कि 5,000 करोड़ रुपये के परिव्यय वाली इस योजना को निकट भविष्य में अधिकृत अधिकारी से मंजूरी मिलने की संभावना है।