By नीरज कुमार दुबे | Sep 21, 2026
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 21वें सत्र की शुरुआत के साथ ही भारत की कूटनीतिक सक्रियता तेज हो गई है। इस बार भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जगह विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। जयशंकर 26 सितंबर को महासभा को संबोधित करेंगे और इस दौरान कई देशों के नेताओं तथा विदेश मंत्रियों के साथ महत्वपूर्ण द्विपक्षीय और बहुपक्षीय बैठकें भी करेंगे। ऐसे समय में जब दुनिया युद्ध, ऊर्जा संकट, व्यापारिक टकराव और बदलते शक्ति संतुलन से जूझ रही है तब इस सत्र से काफी उम्मीदें की जा रही हैं।
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देखा जाये तो जयशंकर की यात्रा का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि भारत-अमेरिका संबंध इस समय कई कठिन सवालों से गुजर रहे हैं। रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका द्वारा भारी शुल्क लगाने की व्यवस्था ने नई दिल्ली की ऊर्जा सुरक्षा और वाशिंगटन के साथ व्यापारिक संबंधों के बीच तनाव पैदा किया है। हम आपको बता दें कि अमेरिकी कानून राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखने वाले देशों पर सौ प्रतिशत तक शुल्क लगाने की शक्ति देता है। लेकिन भारत ने स्पष्ट किया है कि उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता अपने लगभग एक अरब चालीस करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा है और वह अलग-अलग स्रोतों से ऊर्जा की आपूर्ति जारी रखेगा।
यहीं से जयशंकर की न्यूयॉर्क यात्रा का असली सामरिक महत्व सामने आता है। भारत को एक साथ रूस के साथ अपने ऊर्जा और सामरिक संबंधों, अमेरिका के साथ व्यापार और सुरक्षा साझेदारी तथा ग्लोबल साउथ की चिंताओं को साधना है। संयुक्त राष्ट्र महासभा इस संतुलन को साधने के लिए सबसे बड़ा कूटनीतिक मंच उपलब्ध कराती है। जयशंकर की दर्जनों मुलाकातों में ऊर्जा, सुरक्षा, व्यापार, विकास और ग्लोबल साउथ के मुद्दे स्वाभाविक रूप से प्रमुख रहेंगे।
इसके अलावा, भारत के लिए इस महासभा का एक अहम उद्देश्य 2028 से शुरू होने वाले दो वर्षीय कार्यकाल के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्यता हासिल करने के समर्थन में विभिन्न देशों को साथ लाना भी है। इसके लिए जयशंकर अलग-अलग देशों के प्रतिनिधियों के सामने भारत का छह सूत्रीय घोषणापत्र रखेंगे और सुरक्षा परिषद में भारत की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करेंगे। साथ ही, ग्लोबल साउथ के देशों के विकास में भारत की भूमिका, आर्थिक एवं मानवीय सहायता तथा संयुक्त राष्ट्र और अन्य बहुपक्षीय संस्थाओं के माध्यम से चलाए जा रहे कार्यक्रमों पर भी चर्चा होगी। पिछले वर्ष महासभा के दौरान जयशंकर ने 47 द्विपक्षीय और 10 बहुपक्षीय बैठकें की थीं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस बार भी भारत की कूटनीतिक गतिविधियां कितनी व्यापक रहने वाली हैं।
उधर, कूटनीतिक हलकों में संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गैरमौजूदगी को लेकर सवाल उठ रहा है। उल्लेखनीय है कि 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक सत्र को चार बार यानि 2014, 2019, 2020 और 2021 में संबोधित किया। 2020 में महामारी के कारण उनका संबोधन पहले से रिकॉर्ड वीडियो के माध्यम से हुआ था। प्रधानमंत्री मोदी के तीसरे कार्यकाल को देखें तो स्थिति और भी स्पष्ट है। 2024 में मोदी न्यूयॉर्क गए और भविष्य के शिखर सम्मेलन को संबोधित किया, लेकिन महासभा की सामान्य बहस में भारत का राष्ट्रीय वक्तव्य विदेश मंत्री जयशंकर ने दिया। 2025 में भी सामान्य बहस में भारत का प्रतिनिधित्व जयशंकर ने किया और अब 2026 में भी भारत की कमान विदेश मंत्री के हाथ में है। इस तरह तीसरे कार्यकाल में अब तक मोदी ने महासभा की सामान्य उच्चस्तरीय बहस को अब तक संबोधित नहीं किया है।
सवाल उठ रहा है कि क्या मोदी अमेरिका इसलिए नहीं जा रहे ताकि ट्रंप से मुलाकात से बच सकें? देखा जाये तो भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव जरूर है और रूसी तेल तथा अमेरिकी शुल्क का विवाद गंभीर है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी और ट्रंप की जून 2026 में फ्रांस में हुई मुलाकात में दोनों नेताओं ने व्यापार, ऊर्जा, रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई थी। इसलिए केवल संयुक्त राष्ट्र महासभा में मोदी की गैरमौजूदगी को ट्रंप से मुलाकात से बचने की रणनीति के रूप में देखा जाना गलत होगा।
बहरहाल, न्यूयॉर्क में जयशंकर का संबोधन केवल संयुक्त राष्ट्र में भारत का भाषण नहीं होगा। यह संदेश देने का अवसर होगा कि भारत दबावों के बीच अपनी ऊर्जा सुरक्षा, सामरिक स्वायत्तता, ग्लोबल साउथ की आवाज और सुरक्षा परिषद में बड़ी भूमिका, इन चारों लक्ष्यों को एक साथ आगे बढ़ाना चाहता है। महासभा के मंच से भारत की कूटनीति की धार इसी संतुलन और दृढ़ता से दिखाई देगी।
-नीरज कुमार दुबे