संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार निकाय दोहरे मापदंड और राजनीतिकरण से बचें: UNGA में भारत

By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Oct 14, 2026

(योषिता सिंह) संयुक्त राष्ट्र, 14 अक्टूबर भारत ने संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार निकायों से ‘‘राजनीतिकरण’’ से बचने तथा सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक संदर्भों का सम्मान करने का आग्रह करते हुए कहा है कि देश कोई भेदभाव किए बिना और दोहरा मापदंड अपनाए बिना सभी के मानवाधिकारों को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन में प्रथम सचिव अनुज स्वरूप ने सोमवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति के 81वें सत्र में ‘मानवाधिकार परिषद की रिपोर्ट’ विषय पर भारत का पक्ष रखा। स्वरूप ने कहा कि भारत संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त और उनके कार्यालय के साथ विश्वास एवं साझेदारी की भावना से काम करना जारी रखेगा।

उन्होंने बताया कि पिछले एक दशक में भारत में 25 करोड़ से अधिक लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर निकले हैं और देश की सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ 100 करोड़ से अधिक लोगों तक पहुंच रहा है। उन्होंने कहा कि देश में 80 करोड़ लोगों को मुफ्त खाद्यान्न और 60 करोड़ लोगों को मुफ्त स्वास्थ्य बीमा सुविधा दी जा रही है। उन्होंने कहा कि इसके अलावा महिलाओं के 32 करोड़ बैंक खाते खोले गए हैं और ये उपलब्धियां भारत के जन-केंद्रित विकास मॉडल को दर्शाती हैं।

स्वरूप ने कहा, ‘‘भारत सभी के मानवाधिकारों को बढ़ावा देने और उनकी रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है। वह सभी सदस्य देशों के साथ मिलकर मानवाधिकार परिषद को एक प्रभावी, निष्पक्ष और विश्वसनीय निकाय बनाने के लिए काम कर रहा है।’’ संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मंगलवार को ब्राजील, बुरुंडी, डोमिनिकन गणराज्य, जर्मनी, घाना, आयरलैंड, जापान, जॉर्डन, कुवैत, नेपाल, नाइजीरिया, मोल्दोवा गणराज्य, यूक्रेन, उरुग्वे और जाम्बिया को 2027 से 2029 के कार्यकाल के लिए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (एचआरसी) का सदस्य चुना। भारत ने मूल निवासियों के अधिकारों से संबंधित संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में उसके बारे में किए गए उल्लेख पर भी कड़ी आपत्ति जताई।

यह रिपोर्ट मूल निवासियों की भूमि, क्षेत्रों और संसाधनों के सीमांकन, पंजीकरण और मालिकाना हक देने से संबंधित है। मूल निवासियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदक अल्बर्ट बारूमे की रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘भारत में वन अधिकार अधिनियम के तहत लाखों दावे दाखिल किए गए हैं, लेकिन इनमें से बड़ी संख्या में दावे अब भी लंबित हैं, विशेष रूप से सामुदायिक अधिकारों से संबंधित दावे लंबित हैं।’’ स्वरूप ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति के 81वें सत्र में ‘मूल निवासियों के अधिकार’ विषय पर भारत का पक्ष रखते हुए विशेष प्रतिवेदक की रिपोर्ट में किए गए इस उल्लेख को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, ‘‘रिपोर्ट में यह स्वीकार किया गया है कि वन अधिकार अधिनियम व्यक्तिगत और सामूहिक अधिकारों को मान्यता देता है, लेकिन हमारा प्रतिनिधिमंडल रिपोर्ट के अनुच्छेद 42 में भारत के बारे में बिना किसी ठोस आधार के किए गए उल्लेख पर कड़ी आपत्ति जताता है।’’ स्वरूप ने कहा, ‘‘वन अधिकार अधिनियम के तहत बड़ी संख्या में दावों के अब भी लंबित होने की बात केवल एक व्यक्ति द्वारा दी गई जानकारी पर आधारित है।

इसके समर्थन में कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है। बिना सत्यापन के मिली ऐसी जानकारी पर चुनिंदा रूप से भरोसा किए जाने से रिपोर्ट में तथ्यों की गहन जांच और निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।’’ स्वरूप ने आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि वन अधिकार अधिनियम के तहत 54 लाख से अधिक दावे दाखिल किए गए हैं, जिनमें से 80 प्रतिशत से अधिक का निपटारा किया जा चुका है और 25 लाख से अधिक पट्टे वितरित किए गए हैं। भारत ने विशेष प्रतिवेदक को अद्यतन आंकड़े उपलब्ध कराने की पेशकश की, ताकि ‘‘बिना सत्यापन के दी गई जानकारी के आधार पर रिपोर्ट में आई ऐसी गलतियों को सुधारा जा सके।’’ स्वरूप ने कहा कि भारत ऐसे सतत और समग्र विकास के लिए प्रतिबद्ध है, जिसमें कोई भी समुदाय पीछे न छूटे।

उन्होंने कहा कि भारत ने मूल निवासियों के अधिकारों को बढ़ावा देने और उनकी रक्षा करने का लगातार समर्थन किया है।

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