By नीरज कुमार दुबे | Oct 07, 2026
भारतीय वायुसेना को जल्द ही नया नेतृत्व मिलने जा रहा है। एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित 31 अक्टूबर 2026 को भारतीय वायुसेना के 29वें प्रमुख के रूप में कमान संभालेंगे। करीब चार दशक के लंबे सैन्य अनुभव, हजारों घंटे की उड़ान और लड़ाकू विमानों से लेकर रणनीतिक कमान तक के अनुभव के साथ दीक्षित ऐसे समय में वायुसेना की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, जब भारत की हवाई ताकत को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की बड़ी चुनौती सामने है।
उनकी सेवा यात्रा का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है मैदान से लेकर रणनीतिक स्तर तक उनका अनुभव। उन्होंने पश्चिमी क्षेत्र में अग्रिम लड़ाकू अड्डे की कमान संभाली, दक्षिणी क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रशिक्षण अड्डे का नेतृत्व किया, दक्षिणी वायु कमान में वायु रक्षा की जिम्मेदारी निभाई और बाद में केंद्रीय वायु कमान के वायु अधिकारी कमांडिंग-इन-चीफ रहे। वह एकीकृत रक्षा स्टाफ के प्रमुख के रूप में भी काम कर चुके हैं। सरकार के अनुसार इस भूमिका में उन्होंने तीनों सेनाओं के बीच संयुक्तता और एकीकरण को आगे बढ़ाने पर जोर दिया।
यही अनुभव उनके नेतृत्व की दिशा का संकेत देता है। आने वाला युद्ध केवल लड़ाकू विमानों की संख्या से नहीं जीता जाएगा। रडार, उपग्रह, मानवरहित विमान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, लंबी दूरी के हथियार, हवाई चेतावनी प्रणाली और जमीन आधारित वायु रक्षा, इन सबको एक ही युद्धक तंत्र में जोड़ना होगा। आशुतोष दीक्षित का परीक्षण पायलट का अनुभव और एकीकृत रक्षा व्यवस्था में काम करने का अनुभव इस चुनौती के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
लेकिन उनके सामने सबसे कठिन सवाल वायुसेना की लड़ाकू क्षमता का है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार भारतीय वायुसेना के लड़ाकू स्क्वाड्रनों की संख्या स्वीकृत संख्या से काफी नीचे है और तेजस के नए संस्करण की आपूर्ति में देरी ने इस कमी को और गंभीर बनाया है। प्रस्तावित बहु-भूमिका लड़ाकू विमान सौदे और भविष्य के स्वदेशी लड़ाकू विमानों की योजनाएं भी इसी बड़े अंतर को भरने की कोशिश हैं।
यहीं से नये वायुसेना प्रमुख की असली परीक्षा शुरू होगी। उन्हें एक तरफ तत्काल युद्धक क्षमता बनाए रखनी होगी और दूसरी तरफ भविष्य की वायुसेना तैयार करनी होगी। तेजस, भविष्य का उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान, लंबी दूरी के हथियार, आधुनिक रडार, हवाई चेतावनी प्रणाली और मानवरहित प्रणालियों को एक साथ गति देना आसान काम नहीं है।
फिर भी तस्वीर का दूसरा पहलू बेहद महत्वपूर्ण है। वर्ष 2026 में भारतीय वायुसेना लगातार ऐसे अभ्यास कर रही है जिनसे स्पष्ट है कि युद्ध की तैयारी केवल कागज पर नहीं हो रही। ‘तरंग शक्ति’ में भारत के साथ अमेरिका, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, संयुक्त अरब अमीरात, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे देशों की वायु सेनाएं शामिल हैं। इस अभ्यास में विभिन्न प्रकार के लड़ाकू विमान, परिवहन विमान और हवा में ईंधन भरने वाले विमान शामिल हैं। उद्देश्य केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में संयुक्त अभियान की क्षमता बढ़ाना है। इसके अलावा, जापान के साथ ‘वीर गार्जियन’ में तेजस, सुखोई-30 एमकेआई और राफेल ने जापानी एफ-2 विमानों के साथ उन्नत हवाई अभियानों का अभ्यास किया। इससे भारतीय वायुयोद्धाओं को अलग-अलग युद्धक सिद्धांतों और परिस्थितियों में काम करने का अनुभव मिलता है।
इससे भी आगे की तैयारी पोखरण में आयोजित ‘ड्रोनाथॉन’ में दिखाई देती है। यहां निगरानी, स्वायत्त संचालन, झुंड तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और ड्रोन-रोधी प्रणालियों का परीक्षण किया गया। वायुसेना ने मानवरहित प्रणालियों के लिए अपनी भविष्य की जरूरतों का खाका भी जारी किया। संदेश साफ है कि भविष्य के युद्ध में केवल पायलट वाला विमान नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में बुद्धिमान मानवरहित प्रणालियां भी निर्णायक भूमिका निभाएंगी।
हम आपको यह भी बता दें कि ‘वायु शक्ति-26’ ने भी भारतीय वायुसेना की तस्वीर स्पष्ट की। दिन और रात दोनों समय बड़े पैमाने पर अभियान, हवाई हमले, वायु रक्षा, विशेष बलों की कार्रवाई और परिवहन अभियानों को एक साथ संचालित किया गया। राफेल, सुखोई-30 एमकेआई, मिराज-2000, मिग-29 और जगुआर जैसे लड़ाकू विमानों के साथ आकाश और स्पाइडर जैसी वायु रक्षा प्रणालियों का समन्वय दिखाया गया।
इसमें कोई दो राय नहीं कि भविष्य की सबसे बड़ी ताकत केवल विमानों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी आंख और दिमाग होंगे। स्वदेशी ‘नेत्र’ हवाई चेतावनी एवं नियंत्रण प्रणाली को अंतिम परिचालन मंजूरी मिलना इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इसके जरिए हवा में मौजूद खतरों की निगरानी, परिस्थितिजन्य जानकारी और युद्धक्षेत्र का नियंत्रण मजबूत होता है। इसके अगले संस्करण की दिशा में भी काम चल रहा है।
देखा जाये तो आशुतोष दीक्षित के सामने सबसे बड़ी चुनौती भारतीय वायुसेना को ऐसी ताकत बनाने की होगी, जो सिर्फ सीमा की रक्षा तक सीमित न रहे, बल्कि जरूरत पड़ने पर दुश्मन की हवाई रणनीति, संचार व्यवस्था, निगरानी तंत्र और सैन्य ठिकानों पर भी जबरदस्त दबाव बना कर उसे कुछ घंटों में ही घुटने टेकने पर मजबूर कर दे।
आने वाले वर्षों में अगर लड़ाकू विमानों की कमी दूर होती है, स्वदेशी हथियार और तकनीक समय पर वायुसेना तक पहुंचती है और लड़ाकू विमानों के साथ ड्रोन, हवाई चेतावनी प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और लंबी दूरी के हथियारों का बेहतर तालमेल बनाया जाता है, तो भारतीय वायुसेना की ताकत कई गुना बढ़ सकती है। देखा जाये तो असली ताकत सिर्फ ज्यादा विमान रखने में नहीं, बल्कि दुश्मन से पहले खतरे को पहचानने और उससे कहीं तेजी से जवाब देने में होगी।
बहरहाल, आधुनिक हवाई युद्ध का नियम बिल्कुल साफ है। जिसके पास बेहतर जानकारी, ज्यादा सटीक हथियार और तेज फैसला लेने की क्षमता होगी, उसे बढ़त मिलेगी। अब आशुतोष दीक्षित के सामने यही चुनौती है कि भारतीय वायुसेना को इस नई युद्ध तकनीक और रणनीति के मामले में और आगे कैसे ले जाया जाए।
-नीरज कुमार दुबे