चुनौती नहीं अवसर है ट्रंप की वीजा नीति, 'इंडियन ब्रेन' अब भारतीय कंपनियों में ऊर्जा लगाएँ और देश को आगे बढ़ाएँ

By नीरज कुमार दुबे | Sep 20, 2025

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एच-1बी वीज़ा को लेकर जो नया कदम उठाया है, वह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि वैश्विक प्रतिभा प्रवाह (Global Talent Flow) की दिशा बदलने वाला निर्णय सिद्ध हो सकता है। इस नीति के अंतर्गत हर वर्ष एच-1बी वीज़ा के लिए कंपनियों को एक लाख डॉलर (लगभग 83 लाख रुपये) शुल्क देना होगा। यह राशि वर्तमान ढांचे की तुलना में कई गुना अधिक है और सीधे-सीधे उन कंपनियों पर बोझ डालेगी जो भारतीय और चीनी पेशेवरों पर निर्भर हैं।

हम आपको बता दें कि अमेरिका की अधिकांश टेक कंपनियां— जिनमें माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न, मेटा और जेपी मॉर्गन जैसी दिग्गज शामिल हैं, वह भारतीय प्रतिभाओं पर काफी हद तक निर्भर हैं। केवल 2025 की पहली छमाही में ही अमेज़न और उसकी क्लाउड इकाई AWS ने 12,000 से अधिक एच-1बी वीज़ा मंज़ूर करवाए। देखा जाये तो भारत अकेले लगभग 71% एच-1बी वीज़ा का लाभार्थी है। टेक कंपनियों का तर्क है कि अमेरिकी विश्वविद्यालय इतनी मात्रा में कुशल इंजीनियर और प्रोग्रामर तैयार नहीं कर पा रहे जो उनकी ज़रूरत पूरी कर सकें। इस स्थिति में भारतीय और अन्य एशियाई देशों के पेशेवर ही उनकी रीढ़ बने हुए हैं। अब ट्रंप के नये फैसले के बाद विशेषज्ञों का कहना है कि शुल्क बढ़ाने से अमेरिका अपनी नवाचार क्षमता खो सकता है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर और एडवांस टेक्नोलॉजी की होड़ में चीन से पिछड़ सकता है। 

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ट्रंप के फैसले का भारत पर क्या असर होगा यदि इसकी चर्चा करें तो आपको बता दें कि भारत इस नीति से सबसे अधिक प्रभावित होगा क्योंकि हर साल हजारों भारतीय इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक और वित्त विशेषज्ञ एच-1बी वीज़ा के जरिए अमेरिका जाते हैं। देखा जाये तो भारतीय युवाओं के लिए अमेरिकी नौकरी बाज़ार का दरवाज़ा सीमित हो जाएगा। इससे उनके सपनों पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा, इंफोसिस, विप्रो और टीसीएस जैसी कंपनियां अमेरिकी प्रोजेक्ट्स के लिए बड़ी संख्या में भारतीय कर्मचारियों को अमेरिका भेजती रही हैं। नई नीति से इनकी लागत बढ़ेगी और प्रोजेक्ट्स की गति धीमी पड़ सकती है। साथ ही ट्रंप के फैसले का सबसे बड़ा असर यह हो सकता है कि अब तक जो उच्च कुशल प्रतिभा अमेरिका चली जाती थी, वह भारत में ही रहकर यहां की कंपनियों के लिए काम करेगी।

देखा जाये तो ट्रंप के फैसले को केवल नकारात्मक रूप से नहीं देखा जाना चाहिए। भारत के लिए यह एक अवसर भी है। अब तक देखा गया है कि भारतीय मूल के कई दिग्गज अमेरिकी कंपनियों में शीर्ष पदों पर पहुंचे हैं। जैसे सत्य नडेला (Microsoft), सुंदर पिचाई (Google), अजय बंगा (World Bank) आदि। यदि यही प्रतिभा भारत में रहकर देश की कंपनियों को आगे बढ़ाती तो भारत की वैश्विक स्थिति कहीं और होती। देखा जाये तो जब वैश्विक दरवाज़े सीमित होंगे तो भारत में स्टार्टअप कल्चर और मज़बूत हो सकता है। भारत सरकार के पास यह मौका है कि वह उच्च कुशल पेशेवरों को आकर्षित करने के लिए टैक्स लाभ, बेहतर रिसर्च सुविधाएँ और आसान कारोबारी वातावरण उपलब्ध कराए।

यदि भारत सरकार मजबूत R&D ढांचा विकसित करे तो भारतीय युवाओं को अमेरिका जाने की आवश्यकता कम होगी। इसके अलावा, अमेरिका में काम करने वाली भारतीय प्रतिभा यदि भारत लौटती है तो सरकार को ऐसी नीतियाँ बनानी होंगी जिससे ये लोग यहां की कंपनियों को आगे बढ़ाएं। साथ ही, उच्च कौशल वाले पेशेवरों को टैक्स में छूट, आसान फंडिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर मुहैया कराकर भारतीय उद्योग को प्रतिस्पर्धी बनाया जा सकता है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि ट्रंप का यह निर्णय अमेरिका के लिए शायद तत्कालिक राजनीतिक लाभ ला सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यह कदम उसे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में कमजोर कर सकता है। दूसरी ओर, भारत को इसे अवसर के रूप में देखना चाहिए। अब तक कुशल भारतीय पेशेवरों का मस्तिष्क और मेहनत अमेरिकी कंपनियों के लिए संपत्ति बनता रहा है। यदि यही प्रतिभा भारत में रहकर भारतीय कंपनियों के लिए काम करे तो न केवल भारतीय उद्योग जगत बल्कि पूरे राष्ट्र की प्रगति तेज़ हो सकती है।

आज भी गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी, आईबीएम और वर्ल्ड बैंक जैसे वैश्विक संस्थानों के शीर्ष पदों पर भारतीय बैठे हैं। अगर यही “इंडियन ब्रेन” भारत की कंपनियों में अपनी ऊर्जा लगाएँ, तो इसका लाभ सीधे भारत की अर्थव्यवस्था और समाज को मिलेगा। भारत सरकार को चाहिए कि इसे अवसर मानकर उच्च कौशल वाले पेशेवरों के लिए सुविधाजनक माहौल और प्रोत्साहन तैयार करे। बहरहाल, ट्रंप की यह नीति भारत के लिए मस्तिष्क पलायन को रोकने और प्रतिभा को देश में ही बनाए रखने का सुनहरा अवसर साबित हो सकती है।

-नीरज कुमार दुबे

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