भारतीय संविधान ने हमें न्याय और समानता के महान मूल्यों को साझा करने का अवसर दियाः राज्यपाल

By विजयेन्दर शर्मा | Nov 26, 2021

शिमला । राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने कहा कि भारत के संविधान में सामाजिक और भारतीय संस्कृति की अवधारणा निहित है। संविधान की प्रस्तावना में इसकी आत्मा वास करती है। यह प्रत्येक भारतीय नागरिक का कत्र्तव्य है कि वे प्रस्तावना के आदर्शों को आत्मसात करने के लिए हर सम्भव प्रयास करें।

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राज्यपाल ने कहा कि सह-अस्तित्व, लोकतंत्र और क्रम व्यवस्था जैसे भाव हमारे स्वभाव में निहित है और ग्रामीण स्तर पर कई स्थानों में आज भी एक प्रमुख व्यक्ति पूरे समुदाय का मार्गदर्शन करने की क्षमता रखता है। उन्होंने कहा कि धर्म की सही परिभाषा यह है कि हम दूसरों के साथ किस प्रकार का व्यवहार करते हैं। यह हमारे अस्तित्व की भावना है, जिसे हमें बनाए रखना है। उन्होंने संविधान दिवस की बधाई देते हुए कहा कि संविधान ने हमें न्याय और समानता के महान मूल्यों को साझा करने का अवसर दिया।

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आईआईएएस के अध्यक्ष कपिल कपूर ने कहा कि भारतीय समाज और परंपरा स्वशासन के सिद्धांत पर आधारित रही है और यही कारण है कि कई राजनीतिक चुनौतियों के बावजूद हमारी संस्कृति और सभ्यता का अस्तित्व आज भी कायम है। उन्होंने कहा कि हमारी प्राचीन संस्कृति में ‘पंच’ को ‘परमेश्वर’ कहा जाता था। उन्होंने जिम्मेदार सरकार और स्वशासन के मध्य अंतर को विस्तारपूर्वक बताया। उन्होंने कहा कि हमारा समाज कत्र्तव्य परायण है और कत्र्तव्य सद्भावना पर आधारित अवधारणा है। हमारे समाज में त्याग करने वाले व्यक्ति का सम्मान किया जाता है।

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आईआईएएस के निदेशक प्रोफेसर चमन लाल गुप्ता ने कहा कि आज़ादी का अमृत महोत्सव समारोह हम सभी के लिए गर्व और प्रसन्नता की बात है लेकिन यह आकलन करने का भी समय है। उन्होंने कहा कि हमारी सांस्कृतिक भावना में बंधुत्व का भाव है और यह विरासत दुनिया को हमारे द्वारा मिली है। इससे पूर्व संस्थान के सचिव प्रेम चंद ने राज्यपाल का स्वागत किया और संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों की जानकारी दी।

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