By नीरज कुमार दुबे | Oct 14, 2026
भारत अब हिंद महासागर में अपनी ताकत के दम पर शक्ति संतुलन की नई इबारत लिखने की तैयारी में है। हम आपको बता दें कि समुद्र की लहरों पर अब केवल गश्त नहीं, बल्कि दुश्मन की हर चाल को समय रहते पहचानने, उसकी पनडुब्बियों का पीछा करने और जरूरत पड़ने पर उसे करारा जवाब देने की क्षमता का विस्तार हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने भारतीय नौसेना की मारक क्षमता, पनडुब्बी बेड़े और स्वदेशी युद्धपोत निर्माण को रणनीतिक प्राथमिकता देकर साफ संकेत दिया है कि भारत अपने समुद्री हितों की सुरक्षा के लिए किसी दूसरे देश की कृपा पर निर्भर नहीं रहना चाहता।
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हम आपको बता दें कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ा रही है। पाकिस्तान भी चीन से आधुनिक पनडुब्बियां हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे में भारत के सामने चुनौती सिर्फ समुद्री सीमाओं की निगरानी की नहीं, बल्कि हिंद महासागर में अपनी रणनीतिक बढ़त कायम रखने की है। मोदी सरकार स्वदेशी निर्माण, आधुनिक हथियारों और लंबी अवधि की सैन्य तैयारी के जरिए इसका जवाब देने की तैयारी कर रही है।
हम आपको बता दें कि भारतीय नौसेना ने 12 अक्टूबर को मुंबई स्थित नौसैनिक गोदी में आईएनएस मंगरोल (P82) को अपने बेड़े में शामिल किया। यह माहे श्रेणी का तीसरा एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट है। पश्चिमी नौसेना कमान के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ वाइस एडमिरल संजय वत्सायन की अध्यक्षता में आयोजित समारोह में रक्षा बलों के वरिष्ठ अधिकारियों, रक्षा मंत्रालय के प्रतिनिधियों, कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड और उद्योग जगत से जुड़े प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।
आईएनएस मंगरोल की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसे तटीय और उथले समुद्री इलाकों में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और उनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए तैयार किया गया है। हम आपको बता दें कि समुद्र के ऐसे हिस्से पनडुब्बी रोधी अभियानों के लिहाज से बेहद चुनौतीपूर्ण होते हैं, जहां कम गहराई, समुद्री भूगोल और पानी के भीतर बदलती परिस्थितियां निगरानी को कठिन बना देती हैं। उन्नत सेंसर, सोनार और हथियार प्रणालियों से लैस यह पोत पनडुब्बी रोधी युद्ध, पानी के भीतर निगरानी, कम तीव्रता वाले समुद्री अभियानों और बारूदी सुरंगों से जुड़े कार्यों में उपयोगी होगा। तीन डीजल इंजन संचालित वाटरजेट प्रणोदन इकाइयां इसे उथले और सीमित समुद्री क्षेत्रों में तेजी से दिशा बदलने तथा तत्काल प्रतिक्रिया देने की क्षमता प्रदान करती हैं।
इसका सीधा मतलब है कि भारत की तटीय सुरक्षा व्यवस्था में एक और ऐसी क्षमता जुड़ी है, जो समुद्र के भीतर छिपकर आने वाले खतरे को पहचानने में मदद करेगी। देखा जाये तो पाकिस्तान की समुद्री गतिविधियों से लेकर हिंद महासागर में बढ़ती चीनी मौजूदगी तक, भारत को अपने तटों और सामरिक समुद्री मार्गों पर लगातार सतर्क रहना होगा।
साथ ही आईएनएस मंगरोल की एक और खासियत इसका स्वदेशी निर्माण है। कोच्चि स्थित कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने इस युद्धपोत को डिजाइन और निर्मित किया है। इसमें 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। यह उपलब्धि भारतीय रक्षा उद्योग, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों तथा देश की तकनीकी क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में भी अहम है। हम आपको बता दें कि प्रधानमंत्री मोदी की सरकार के लिए आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया का असली सामरिक महत्व यही है कि युद्धपोतों, हथियार प्रणालियों और सैन्य तकनीक के लिए भारत की विदेशी निर्भरता धीरे-धीरे कम हो। युद्ध की स्थिति में आपूर्ति शृंखला पर बाहरी दबाव या प्रतिबंध देश की सैन्य तैयारियों को बाधित कर सकते हैं। स्वदेशी निर्माण इस जोखिम को कम करने के साथ देश में इंजीनियरिंग कौशल और रक्षा उत्पादन की क्षमता भी बढ़ाता है।
आईएनएस मंगरोल का नाम गुजरात के जूनागढ़ जिले के तटीय नगर मंगरोल और उसके प्रमुख मछली बंदरगाह से जुड़ा है। यह पोत पूर्ववर्ती आईएनएस मंगरोल (M85) की विरासत को भी आगे बढ़ाता है, जो अप्रैल 2004 तक भारतीय नौसेना में सेवा दे रहा था। नई पीढ़ी का यह पोत पुराने नाम को आधुनिक समुद्री युद्ध क्षमता के साथ जोड़ता है। देखा जाये तो भारत की समुद्री रणनीति का सबसे अहम मोर्चा अब पानी के भीतर की लड़ाई है।
इसके अलावा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) में फ्रांसीसी नेवल ग्रुप के सहयोग से तीन अतिरिक्त कलवरी श्रेणी की पनडुब्बियां बनाने के प्रस्ताव को प्राथमिकता दी है। इसकी अनुमानित लागत करीब 33,000 करोड़ रुपये बताई गई है और संशोधित प्रस्ताव को कैबिनेट की सुरक्षा संबंधी समिति (CCS) के समक्ष रखने की प्रक्रिया की खबर है।
हम आपको बता दें कि भारत पहले ही छह कलवरी श्रेणी की पनडुब्बियां अपने बेड़े में शामिल कर चुका है। लेकिन पुरानी शिशुमार और सिंधुघोष श्रेणी की पनडुब्बियों की उम्र बढ़ने के साथ उनकी परिचालन क्षमता बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। ऐसे में नई पनडुब्बियों का निर्माण महज सैन्य खरीद नहीं, बल्कि भारत की समुद्री प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने की जरूरत है। साथ ही प्रस्तावित उन्नत कलवरी पनडुब्बियों में नाटो मानक टॉरपीडो, डीआरडीओ के विकसित भारी टॉरपीडो और लगभग 800 किलोमीटर की मारक दूरी वाली SCALP पनडुब्बी-प्रक्षेपित मिसाइलों को शामिल करने की योजना बताई जा रही है।
इन पनडुब्बियों का निर्माण मझगांव डॉक की उत्पादन क्षमता को भी गति देगा। भारतीय इंजीनियरों, तकनीशियनों और श्रमिकों को उन्नत पनडुब्बी निर्माण का अनुभव मिलेगा। भविष्य में तकनीकी हस्तांतरण की शर्तों के तहत भारत की मित्र देशों को पनडुब्बियां उपलब्ध कराने की क्षमता विकसित होने की संभावना भी इस परियोजना को सामरिक और औद्योगिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है।
देखा जाये तो भारत के सामने चुनौती इसलिए गंभीर है, क्योंकि पाकिस्तान चीन के सहयोग से आठ हंगोर श्रेणी की पनडुब्बियां हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इनके 2028 से 2030 के बीच बेड़े में शामिल होने की आशंका भारतीय नौसेना के लिए दीर्घकालिक योजना को और जरूरी बनाती है।
इसी बीच, प्रोजेक्ट-75(I) के तहत छह आधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियां बनाने की योजना भी महत्वपूर्ण है। जर्मनी की थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) और मझगांव डॉक के सहयोग से प्रस्तावित इस परियोजना में एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) तकनीक पर जोर है, जिससे पनडुब्बियां लंबे समय तक पानी के भीतर रह सकती हैं। मई 2026 की रिपोर्टों के अनुसार, लगभग 70,000 करोड़ रुपये के कार्यक्रम को वित्त मंत्रालय की मंजूरी मिल चुकी थी, जबकि अंतिम सुरक्षा संबंधी मंजूरी की प्रक्रिया बाकी थी।
साथ ही भारत की परमाणु पनडुब्बी क्षमता का विस्तार भी व्यापक रणनीति का हिस्सा है। परमाणु ऊर्जा से चलने वाली हमलावर पनडुब्बियां (SSN) और परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां (SSBN) अलग-अलग भूमिकाएं निभाती हैं। यह दुश्मन की समुद्री गतिविधियों का पीछा करने और उसे चुनौती देने में उपयोगी है, साथ ही परमाणु प्रतिरोधक क्षमता का महत्वपूर्ण आधार हैं। हम आपको यह भी बता दें कि भारतीय नौसेना का आधुनिकीकरण केवल पनडुब्बियों तक सीमित नहीं है। रिपोर्टों के अनुसार, भारत 2035 तक अपने बेड़े को लगभग 200 युद्धपोतों तक पहुंचाने की महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रहा है। स्वदेशी युद्धपोतों, उन्नत सेंसरों, ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों और पनडुब्बी रोधी प्रणालियों का विस्तार इसी व्यापक तैयारी का हिस्सा है।
बहरहाल, संदेश साफ है। हिंद महासागर किसी एक देश की जागीर नहीं है। चीन की विस्तारवादी समुद्री महत्वाकांक्षाओं और पाकिस्तान की बढ़ती पनडुब्बी क्षमता के बीच भारत अपनी सुरक्षा, व्यापारिक समुद्री मार्गों और क्षेत्रीय हितों की रक्षा के लिए अपनी ताकत बढ़ा रहा है। आईएनएस मंगरोल जैसे पोत तटीय सुरक्षा को मजबूत करते हैं, जबकि आधुनिक पनडुब्बियां समुद्र की गहराइयों में रणनीतिक बढ़त का आधार बनती हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत अब समुद्र में ऐसी विश्वसनीय सैन्य क्षमता विकसित करना चाहता है जो किसी भी विरोधी को भारतीय समुद्री हितों के खिलाफ दुस्साहस करने से पहले कई बार सोचने पर मजबूर कर दे। यही हिंद महासागर में बदलते शक्ति संतुलन का सबसे बड़ा संकेत है।
-नीरज कुमार दुबे