By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Oct 21, 2026
(अदिति खन्ना) लंदन, 21 अक्टूबर भारत के अधिकतर छात्र इस बात को लेकर चिंतित हैं कि कृत्रिम मेधा (एआई) की मदद से उनका काम तो तेजी से हो रहा है, लेकिन वे विषयों को गहराई से नहीं सीख पा रहे हैं। ब्रिटेन में इस सप्ताह जारी एक नए वैश्विक सर्वेक्षण के निष्कर्षों में यह बात सामने आई है। ‘एचपी फ्यूचर्स 2026’ रिपोर्ट के लिए दुनिया भर में छह हजार से अधिक छात्रों के बीच किए गए सर्वेक्षण में भारत के 758 छात्र शामिल थे।
शिक्षा व्यवस्था को छात्रों में ऐसी क्षमताएं विकसित करने, उन्हें प्रदर्शित करने और लगातार मजबूत बनाने के लिए अधिक प्रयास करने चाहिए, जो तकनीक में बदलाव के बावजूद उपयोगी बनी रहेंगी। सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की प्रमुख कंपनी एचपी, ग्लोबल लर्निंग काउंसिल और एजुकेशन लीडर्स फोरम के नेतृत्व में तैयार इस रिपोर्ट में शिक्षा, नीति निर्माण और भविष्य के रोजगार क्षेत्र से जुड़े 58 विशेषज्ञों को भी शामिल किया गया। इसका उद्देश्य यह देखना था कि शिक्षा व्यवस्था युवाओं को भविष्य के रोजगार के लिए किस तरह तैयार कर सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार, सोचने-समझने की क्षमता में कमी आने की आशंकाओं के बावजूद भारतीय छात्र एआई आधारित दुनिया में अपने भविष्य को लेकर आशावादी हैं। सर्वेक्षण में शामिल 78 प्रतिशत छात्रों का मानना है कि एआई जितने रोजगार खत्म करेगा, उससे अधिक रोजगार के अवसर पैदा करेगा। सर्वेक्षण में 87 प्रतिशत छात्रों ने भरोसा जताया कि वे अपने करियर में एआई उपकरणों का प्रभावी और जिम्मेदारी से इस्तेमाल कर सकेंगे।
वहीं, 92 प्रतिशत छात्रों का मानना है कि उनकी शिक्षा उन्हें कामकाज के लिए तैयार कर रही है। एचपी में शिक्षा कारोबार एवं रणनीति के निदेशक और वैश्विक प्रमुख मयंक धींगरा ने कहा, “सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय छात्रों ने आगाह किया है कि उन्हें एआई के इस्तेमाल का भरोसा है और इससे काम तेजी से करने में मदद मिल रही है, लेकिन उन्हें चिंता है कि वे विषयों को गहराई से नहीं सीख पा रहे हैं।” उन्होंने कहा कि पाठ्यक्रम और मूल्यांकन प्रणाली के भविष्य को लेकर फैसले करते समय छात्रों की आवाज को प्रमुखता देना बेहद जरूरी है। रिपोर्ट में भारत सहित दुनिया भर के नीति निर्माताओं से भविष्य के कार्यस्थलों में जरूरी कौशल विकसित करने के लिए स्पष्ट योजनाएं तैयार करने की अपील की गई है।
इसमें कहा गया है कि रचनात्मकता और आलोचनात्मक सोच जैसे कौशल को पढ़ाई के अन्य विषयों की तुलना में कम महत्व नहीं दिया जाना चाहिए और न ही उन्हें पाठ्येतर गतिविधियों तक सीमित रखा जाना चाहिए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि शिक्षा में पढ़ने-लिखने, गणना करने और व्यक्तित्व निर्माण से जुड़ी शिक्षा को केंद्रीय स्थान पर रखा जाना चाहिए। साथ ही, बुनियादी ज्ञान और लंबे समय तक उपयोगी रहने वाले कौशल सिखाने के लिए रचनात्मक तथा व्यावहारिक तरीकों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।