दिसंबर में बढ़ी महंगाई दर, फिर भी रिज़र्व बैंक के लक्ष्य से नीचे, नीति दर कट पर नजर

By Ankit Jaiswal | Jan 12, 2026

दिसंबर में देश की खुदरा महंगाई दर बढ़कर 1.33 प्रतिशत पर पहुंच गई है, जो नवंबर में 0.7 प्रतिशत थी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार यह बीते तीन महीनों का उच्चतम स्तर है, हालांकि इसके बावजूद महंगाई लगातार चौथे महीने भारतीय रिज़र्व बैंक की निचली सहनशील सीमा 2 प्रतिशत से नीचे बनी हुई है।

दिसंबर का आंकड़ा एक और वजह से अहम माना जा रहा है। यह 2012 आधार वर्ष के तहत जारी होने वाला आखिरी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक है। फरवरी 12 को जनवरी का जो डेटा आएगा, वह नए 2024 आधार वर्ष पर आधारित होगा। नए आधार में उपभोग टोकरी को अपडेट किया गया है और गैर-खाद्य वस्तुओं का वज़न पहले से अधिक रखा गया है, जिससे महंगाई की तस्वीर में बदलाव दिख सकता है।

मौजूदा सीपीआई में खाद्य वस्तुओं का हिस्सा आधे से भी ज्यादा है, जिस वजह से सब्ज़ियों, अनाज या दालों की कीमतों में उतार-चढ़ाव सीधे हेडलाइन महंगाई को प्रभावित करता है। यही कारण है कि कई बार गैर-खाद्य कीमतें स्थिर रहने के बावजूद कुल महंगाई में तेज बदलाव नजर आता है।

दिसंबर में खाद्य महंगाई लगातार सातवें महीने नकारात्मक दायरे में रही है। हालांकि इसमें गिरावट की रफ्तार कुछ कम हुई है और फूड इंडेक्स -3.9 प्रतिशत से सुधरकर -2.71 प्रतिशत पर आ गया है। अनाज की बात करें तो 51 महीनों बाद इसमें पहली बार 0.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। वहीं सब्ज़ियां और दालें लगातार 11वें महीने भी सस्ती रहीं हैं।

तेल और फलों की कीमतें भी क्रमशः 15 और 16 महीने के निचले स्तर पर दर्ज की गई हैं। दूसरी ओर, कुछ क्षेत्रों में महंगाई अभी भी चिपचिपी बनी हुई है। खासतौर पर पर्सनल केयर और सेवाओं से जुड़े खर्चों में तेजी देखी गई है, जिनमें सोना और चांदी के आभूषण भी शामिल हैं।

आईसीआरए की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर के मुताबिक, खाद्य और ईंधन को हटाकर देखी जाने वाली कोर महंगाई दिसंबर में बढ़कर 4.8 प्रतिशत हो गई है, जो 28 महीनों का उच्च स्तर है। हालांकि यह उछाल मुख्य रूप से कीमती धातुओं की वजह से है और सोना-चांदी को अलग करने पर कोर महंगाई 2.4 प्रतिशत पर स्थिर बनी हुई है।

पर्सनल केयर महंगाई 28 प्रतिशत के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है, जबकि घरेलू सामान, स्वास्थ्य और परिवहन जैसे क्षेत्रों में महंगाई कई सालों के निचले स्तर पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि नए आधार वर्ष के तहत गैर-खाद्य वस्तुओं का ज्यादा वज़न होने से आगे चलकर महंगाई के आंकड़े मांग की वास्तविक स्थिति को बेहतर तरीके से दर्शाएंगे।

अब सवाल यह है कि इसका असर मौद्रिक नीति पर क्या होगा। महंगाई लक्ष्य से नीचे रहने और कोर दबाव सीमित होने के चलते फरवरी की बैठक में भारतीय रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति द्वारा 25 बेसिस प्वाइंट की एक और दर कटौती की संभावना मजबूत हुई है।

हालांकि सभी अर्थशास्त्री इस पर सहमत नहीं हैं। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि नए सीपीआई और जीडीपी सीरीज़ के आने के बाद ही आगे की दिशा साफ होगी। उनका मानना है कि बेस इफेक्ट खत्म होने के साथ आने वाले महीनों में महंगाई में हल्की बढ़त देखने को मिल सकती है और चौथी तिमाही में औसत महंगाई 2.6 प्रतिशत के आसपास रह सकती है।

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