ब्रजेश कानूनगो के व्यंग्य संग्रह पाषाणपुष्प का किस्सा (पुस्तक समीक्षा)

By दीपक गिरकर | Aug 04, 2022

“पाषाणपुष्प का किस्सा” सुपरिचित व्यंग्यकार ब्रजेश कानूनगो का चर्चित रोचक व्यंग्य संग्रह है। यह ब्रजेश कानूनगो का चौथा व्यंग्य संग्रह हैं। ब्रजेश जी के लेखन का सफ़र बहुत लंबा है। ब्रजेश जी की प्रमुख रचनाओं में “पुन: पधारें”, “सूत्रों के हवाले से”, “मेथी की भाजी और लोकतंत्र”, “पाषाणपुष्प का किस्सा” (व्यंग्य संग्रह), “धूल और धुएँ के पर्दे में”, “इस गणराज्य में”, “चिड़िया का सितार”, “कोहरे में सुबह” (कविता संग्रह), “रिंगटोन” (कहानी संग्रह), “फूल शुभकामनाओं के” (बाल कथाएं), “चांद की सेहत” (बाल गीत), “डेबिट-क्रेडिट” (उपन्यास), “साहित्यिक नोट्स– अनुगमन” (आलोचना), “रात नौ बजे का इंद्रधनुष”, “फ्लैशबैक” (यात्रा डायरी / संस्मरण) शामिल हैं। कई पुरस्कारों और सम्मानों से सम्मानित ब्रजेश जी की रचनाएँ प्रमुख साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। इनका व्यंग्य रचना लिखने का अंदाज बेहतरीन है। “पाषाणपुष्प का किस्सा” एक लम्बी फैंटेसी रोचक व्यंग्य कथा है, यह व्यंग्य कथा 11 अध्यायों में चित्रित है। यह फैंटेसी व्यंग्य कथा एक सशक्त रचना है जो व्यवस्था के चरित्र और उसके खोखलेपन को उजागर करती है। राज्य की व्यवस्था पर तीखा प्रहार किया गया है। इस कथा में चाटुकारिता पर करारा तंज किया गया है। राजकीय सेवा में अपने स्वतन्त्र विचारों, आदर्शों का कोई मतलब नहीं होता है। राज्य की व्यवस्था अपने ही लोगों को परमिट और ठेकेदारी देती है। राज्य के महाराजा राज्य को अपने तरीके से चलाने के लिए तथाकथित साधू-संत का आशीर्वाद लेते हैं। इतनी लम्बी व्यंग्य कथा में दृश्यात्मकता इस रचना की सबसे बड़ी ताकत है। इस कथा में प्रत्येक दृश्य अगले दृश्य की ओर ले जा रहा है इससे इसकी सम्प्रेषणीयता बरकरार बनी हुई है। एक राज्य के महाराजा और राजमहल के नवरत्नों, अधिकारियों, कर्मचारियों के माध्यम से राज्य और राजमहल के माहौल, वहाँ उच्च स्तर पर होने वाली चाटुकारिता, बेईमानी, धोखाधड़ी, घूसखोरी, धूर्तता और तथाकथित आदर्श की विकृतियों का विस्तृत खुलासा किया गया है। लेखक ने महाराजा सहित सभी नवरत्नों, अधिकारियों, कर्मचारियों, नगर सेठ, तथाकथित साधू बाबा की हर गतिविधि में दिखने वाली विसंगतियों पर रोचक तरीके से व्यंग्यात्मक प्रहार किये हैं। व्यंग्यकार ने इस फैंटेसी व्यंग्य कथा के माध्यम से भ्रष्टाचार, चाटुकारिता और अवसरवादिता का कच्चा चिट्ठा खोला है। भाई भतीजावाद, मिलीभगत, अनैतिक व्यावसायिक प्रथाएँ, सरकारी निधियों की हड़पनीति, उच्च अधिकारियों के कुचक्र ये सब इस फैंटेसी व्यंग्य कथा में हैं। व्यंग्यकार ने इस फैंटेसी व्यंग्य कथा में राज्य, राज्य के महाराजा और राज्य की व्यवस्था का जो चित्र खींचा है वह उनकी अद्भुत व्यंग्य शक्ति का परिचय देता है। इस फैंटेसी व्यंग्य कथा के अलावा इस संग्रह में 19 अन्य रोचक व्यंग्य रचनाएँ हैं। सभी व्यंग्य रचनाएँ छोटी हैं लेकिन सरस, संतुलित, सार्थक और प्रभावी हैं। इस व्यंग्य संग्रह को लेखक ने वरिष्ठ व्यंग्यकार डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी, डॉ. प्रेम जनमेजय और श्री विष्णु नागर को समर्पित किया है। व्यंग्यकार के समक्ष यह चुनौती होती है कि वह अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज की जीती जागती तस्वीर पेश करे। इस दृष्टि से श्री ब्रजेश कानूनगो यह व्यंग्य संग्रह “पाषाणपुष्प का किस्सा” समय से संवाद करता हुआ दिखाई देता है। 

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“भजन संध्या” प्रेम के पुजारी भजन बाबू और उनकी धर्म पत्नी संध्या देवी की रोचक व्यंग्य कथा है। पाठक इन व्यंग्य रचनाओं को पूरी पढ़कर ही रुकता है। कतिपय बानगी प्रस्तुत है- कहा जाता है ठाकुर साहब के सूमो से अनुराग के बड़े गहरे कारण थे। दरअसल सूमो के पूर्वज ठाकुर साहब के ससुराल पक्ष के थे। जब ठाकुर साहब का प्रेम विवाह हुआ था तब मैडम अपने साथ एक गर्भवती कुतिया भी लेती आई थी। कालान्तर में इधर बाबा का जन्म हुआ उधर सूमो धरती पर अवतरित हो गए। एक संयोग और घटित हुआ, सूमों के जन्म के तेरह दिन पहले मैडम के पिताजी हृदयघात से चल बसे। मैडम के मन में कुछ ऐसी बात जम गयी कि वे सूमो में अपने डैडी की छवि देखने लगीं। मैडम की ख़ुशी साहब की ख़ुशी। ठाकुर साहब अपने और कुतिया के पिल्ले से समान रूप स्नेह करने लगे। (कुत्ते की समाधि और बारिश में भीगती बकरी)

उन्होंने स्पष्टीकरण दिया- गद्य की किताब की बजाय, कविता की किताब का पन्ना स्वास्थ्य की दृष्टि से ठीक रहता है। “क्या मतलब?” मैं भौचक्क रह गया। “कबाड़ी से किताबों की रद्दी मंगू चाटवाला खरीदता है, समोसे पर कविता के कम शब्दों की स्याही चिपकती है, जिससे बीमारी की संभावना का प्रतिशत भी घट जाता है।” (साहित्य की तनी हुई मूँछ)

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उम्र के साथ साथ इस बालक के मन, प्राण में प्रेम रस की उत्पत्ति बड़े वेग से होती रही। किशोर होते होते उसके हृदय समुद्र में प्रेम लहरों के ज्वार भाटे आने लगे। युवावस्था में कदम रखते ही प्रेम की बाढ़ ने पहले मुहल्ला फिर पूरा नगर ही भिगो कर रख दिया। भजन बाबू के प्रेम से कस्बे की भूमि उर्वरा हो गई। तरुणियाँ प्रेमनगर में घर बसाने के गीत गाने लगीं। (भजन संध्या)

व्यंग्यकार ने विसंगतियों, मानवीय प्रवृतियों, विद्रूपताओं, विडम्बनाओं को अपनी व्यंग्य रचनाओं के माध्यम से उजागर किया है और साथ ही उन्होंने पाठकों को जगाने का भी प्रयास किया है। व्यंग्यकार ब्रजेश कानूनगो के लेखन में चुटीलापन है और साथ ही रचनाओं में ताजगी है। ब्रजेश जी ने संग्रह की सभी रचनाओं को बहुत रोचक शब्दों में लिखा है और गहरी बात सामर्थ्य के साथ व्यक्त करने का प्रयास किया है और वे अपने इस प्रयास में सफल हुए है। व्यंग्यकार ने शब्दों और भाषा के बेहतरीन मिश्रण से हर व्यंग्य को रोचक बना दिया है। व्यंग्य रचनाओं को लाजवाब तरीके से प्रस्तुत किया है। किताब शुरू से अंत तक पाठक को बांधकर रखती है। आशा है इस व्यंग्य संग्रह का साहित्य जगत में स्वागत होगा।

पुस्तक: पाषाणपुष्प का किस्सा (व्यंग्य संग्रह)  

लेखक: ब्रजेश कानूनगो

प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, सी - 46, सुदर्शनपुरा इंडस्ट्रियल एरिया एक्सटेंशन, नाला रोड, 22 गोदाम, जयपुर - 302006   

मूल्य: 120 रूपए

- दीपक गिरकर

समीक्षक

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