By नीरज कुमार दुबे | Mar 12, 2026
पश्चिम एशिया इस समय युद्ध की आग में झुलस रहा है। लेबनान, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और इजराइल के कई इलाकों में मिसाइल हमले और बमबारी जारी हैं। कई शहरों के ऊपर तेल और धुएं के काले गुबार उठते दिखाई दे रहे हैं। इसके बावजूद एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि इन युद्ध प्रभावित इलाकों की हवा भारत के कई प्रमुख शहरों से कहीं ज्यादा साफ है। वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी एक्यूआई के आंकड़े बताते हैं कि युद्ध क्षेत्र में भी हवा का स्तर दिल्ली और मुंबई जैसे भारतीय महानगरों से बेहतर बना हुआ है।
11 मार्च 2026 को भारतीय समयानुसार शाम चार बजे वायु गुणवत्ता मंच एक्यूआई डाट इन के आंकड़ों के अनुसार तेहरान का एक्यूआई लगभग 33 दर्ज किया गया, जबकि उसी समय दिल्ली का एक्यूआई 63 था। दिन के दौरान भी स्थिति इसी तरह रही। दोपहर बारह बजे तेहरान का अधिकतम एक्यूआई 47 रहा, जो अच्छे स्तर में आता है। इसके विपरीत दिल्ली में सुबह आठ बजे एक्यूआई 323 तक पहुंच गया, जो अत्यंत खराब श्रेणी में आता है।
यह स्थिति तब है जब तेहरान और आसपास के क्षेत्रों में तेल भंडार और ऊर्जा ढांचे पर हमलों के कारण धुएं और जहरीली गैसों की आशंका बनी हुई है। सोशल मीडिया पर आठ मार्च की रात तेहरान के ऊपर काले धुएं के घने बादल दिखने के दृश्य सामने आए थे। यहां तक कि कुछ इलाकों में काली वर्षा की भी खबरें आईं, जो तेल भंडार में लगी आग और रासायनिक धुएं का परिणाम मानी जा रही हैं। लोगों ने गले में जलन और आंखों में खुजली की शिकायत की, और प्रशासन ने नागरिकों को घर के भीतर रहने की सलाह दी।
इसके बावजूद वास्तविक समय के आंकड़े बताते हैं कि तेहरान में एक्यूआई अधिकतर समय शून्य से पचास के बीच यानी स्वस्थ श्रेणी में बना रहा। यह तथ्य भारतीय शहरों की वायु गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े करता है क्योंकि भारत के कई महानगरों में वायु प्रदूषण लगातार खराब, बहुत खराब या गंभीर श्रेणी में रहता है।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत में प्रदूषण की समस्या मुख्य रूप से स्थानीय कारणों से पैदा होती है। सबसे बड़ा कारण वाहनों से निकलने वाला धुआं है। तेजी से बढ़ती निजी गाड़ियों की संख्या नाइट्रोजन ऑक्साइड और सूक्ष्म कणों को बढ़ाती है। यही वजह है कि दिल्ली के साथ-साथ बेंगलुरु, हैदराबाद और लखनऊ जैसे शहर भी समय समय पर खराब हवा से जूझते रहते हैं।
इसके अलावा निर्माण कार्य से उठने वाली धूल, उद्योगों और बिजली संयंत्रों से निकलने वाले धुएं तथा ईंट भट्ठों से उत्सर्जित गैसें भी प्रदूषण को बढ़ाती हैं। डीजल जनरेटर से निकलने वाला धुआं और सड़कों की धूल इस समस्या को और गंभीर बनाते हैं। ग्रामीण इलाकों में खाना पकाने के लिए लकड़ी, गोबर और जैव ईंधन जलाने से भी हवा में प्रदूषण बढ़ता है।
उत्तर भारत में एक और महत्वपूर्ण कारण खेतों में पराली जलाना है। पड़ोसी राज्यों में पराली जलने से धुआं बड़ी मात्रा में दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र तक पहुंचता है और सर्दियों में प्रदूषण की स्थिति बेहद खराब कर देता है।
भौगोलिक स्थिति भी दिल्ली में प्रदूषण बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाती है। दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र एक तरह के निचले बेसिन में स्थित है। इसके उत्तर में हिमालय, दक्षिण पश्चिम में अरावली पर्वतमाला और दक्षिण में प्रायद्वीपीय पठार हैं। इस कारण प्रदूषक तत्व यहां फंस जाते हैं और आसानी से बाहर नहीं निकल पाते। साथ ही उत्तर पश्चिम से बलूचिस्तान और थार मरुस्थल की ओर से आने वाली धूल भी प्रदूषण को बढ़ाती है।
इसके विपरीत तेहरान, तेल अवीव, बेरूत और दुबई जैसे कई पश्चिम एशियाई शहर समुद्र के नजदीक स्थित हैं या ऐसे क्षेत्रों में हैं जहां हवाएं प्रदूषकों को तेजी से फैलाकर साफ कर देती हैं। समुद्र के किनारे होने के कारण हवा का प्रवाह बेहतर रहता है और प्रदूषण का जमाव कम होता है।
वहीं मुंबई समुद्र किनारे होने के बावजूद प्रदूषण से जूझता है। विशेषज्ञों के अनुसार इसका मुख्य कारण स्थानीय स्रोत हैं, खासकर वाहनों की अत्यधिक संख्या। मुंबई में वाहनों का घनत्व कई शहरों की तुलना में कई गुना ज्यादा है, इसलिए यहां प्रदूषण का स्तर भी ऊंचा बना रहता है।
इसके अलावा, युद्ध से होने वाला प्रदूषण भी एक अलग प्रकृति का होता है। बमबारी या आग लगने से भारी मात्रा में धुआं और जहरीली गैसें निकलती हैं, लेकिन यह प्रदूषण अक्सर अस्थायी होता है। जब आग बुझ जाती है या घटना समाप्त हो जाती है तो उस स्रोत से निकलने वाला प्रदूषण भी रुक जाता है। इसके विपरीत वाहनों, उद्योगों और निर्माण कार्य से निकलने वाला धुआं लगातार हवा में जाता रहता है, जिससे लंबे समय तक प्रदूषण बना रहता है।
हम आपको यह भी बता दें कि दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में हाल के दिनों में दिखाई दी गई स्मॉग को लेकर भी कई तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं कि यह ईरान में तेल रिफाइनरी पर हमलों से जुड़ी हो सकती है। हालांकि मौसम विशेषज्ञों ने इसे खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि यह स्मॉग दरअसल पश्चिमी हवाओं के साथ आई मरुस्थलीय धूल का परिणाम है।
हम आपको बता दें कि पांच से सात मार्च के बीच बलूचिस्तान और मध्य पाकिस्तान से चली तेज पश्चिमी हवाएं राजस्थान के थार मरुस्थल से होकर गुजरीं और बड़ी मात्रा में धूल को उत्तर पश्चिम भारत तक ले आईं। हवा में तैरते ये धूल कण आकाश को धूसर और भूरा बना देते हैं और दृश्यता कम कर देते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान में हुए विस्फोटों का प्रदूषण भारत तक पहुंचने की संभावना बहुत कम है, क्योंकि दोनों क्षेत्रों के बीच लगभग ढाई से तीन हजार किलोमीटर की दूरी है। इतनी लंबी दूरी तय करते समय प्रदूषक तत्व काफी कमजोर हो जाते हैं।
देखा जाये तो वायु प्रदूषण का स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है। लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, हृदय रोग और स्ट्रोक जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। बच्चों के फेफड़ों के विकास पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ता है और फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। एक हालिया वैश्विक अध्ययन के अनुसार वर्ष 2022 में भारत में लगभग सत्रह लाख अठारह हजार लोगों की मौत वायु प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों के कारण हुई।
युद्ध क्षेत्र में उठने वाला धुआं भले ही डरावना दिखाई दे, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार भारत के शहरों में फैला स्थायी प्रदूषण कहीं ज्यादा खतरनाक है। यह धीरे धीरे लोगों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है और एक तरह से अदृश्य हत्यारा बन जाता है।
बहरहाल, इस पूरी स्थिति से एक स्पष्ट संदेश मिलता है कि भारत में प्रदूषण से निपटने के लिए वाहनों के उत्सर्जन, उद्योगों के धुएं, निर्माण धूल और पराली जलाने जैसी समस्याओं पर सख्त नियंत्रण जरूरी है। जब तक इन स्रोतों को प्रभावी तरीके से नियंत्रित नहीं किया जाएगा, तब तक देश के शहरों में स्वच्छ हवा का सपना अधूरा ही रहेगा।
-नीरज कुमार दुबे