Iran का बड़ा दावा: Ayatollah Khamenei बनेंगे 'दूसरे Imam Hussain', याद रखी जाएगी शहादत

By Ankit Jaiswal | Jul 07, 2026

ईरान में सर्वोच्च नेता अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई के अंतिम संस्कार के दौरान पूरे देश में शोक और भावनाओं का माहौल देखने को मिला हैं। राजधानी तेहरान समेत कई शहरों में लाखों लोग अंतिम यात्रा में शामिल हुए और अमेरिका तथा इजरायल के खिलाफ नारे लगाए। इस बीच ईरान के विदेश मंत्रालय ने खामेनेई की शहादत को इस्लामी इतिहास की एक बड़ी घटना बताते हुए दावा किया कि आने वाले वर्षों में उन्हें दूसरे इमाम हुसैन के रूप में याद किया जाएगा हैं।

बता दें कि इमाम हुसैन, पैगंबर हजरत मुहम्मद के नवासे थे और उनकी शहादत कर्बला की लड़ाई में हुई थी। शिया मुसलमानों के लिए इमाम हुसैन त्याग, न्याय और अन्याय के खिलाफ संघर्ष के सबसे बड़े प्रतीक माने जाते हैं। यही कारण है कि ईरान में खामेनेई की मौत की तुलना कर्बला की घटना से की जा रही हैं।

गौरतलब है कि ईरान का आरोप है कि 28 फरवरी को हुए हमले में अमेरिका और इजरायल की भूमिका रही, जिसमें अयातुल्ला खामेनेई, उनके परिवार के चार सदस्य और कई वरिष्ठ अधिकारी मारे गए थे। हालांकि इस संबंध में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग दावे और प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। ऐसे मामलों में संबंधित पक्षों के दावों की स्वतंत्र पुष्टि करना संभव नहीं हुआ हैं।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने अमेरिका और इजरायल के खिलाफ उठ रही बदले की मांग को न्याय की मांग बताया। उन्होंने कहा कि यदि किसी अपराध के लिए न्याय की मांग की जाती है तो उसमें कोई गलत बात नहीं हैं। उनके बयान के दौरान अंतिम संस्कार में शामिल लोगों की ओर से अमेरिका और इजरायल के खिलाफ लगातार नारे लगाए जाते रहे हैं।

अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में लोग लाल रंग के झंडे लेकर पहुंचे। इन झंडों को शहादत और खून के बदले का प्रतीक माना जाता हैं। कई झंडों पर "या लथारात अल-खामेनेई" जैसे नारे भी लिखे थे, जिसका अर्थ खामेनेई के लिए न्याय और प्रतिशोध की मांग से जोड़ा जा रहा हैं। बता दें कि ऐसा नारा आमतौर पर मुहर्रम के जुलूसों में सुनाई देता है और इसे इमाम हुसैन की शहादत की याद से जोड़ा जाता हैं।

अंतिम संस्कार के दौरान सबसे भावुक दृश्य उस छोटे ताबूत का रहा, जिसमें हमले में जान गंवाने वाली खामेनेई की 14 महीने की पोती ज़हरा को अंतिम विदाई दी गई। इस तस्वीर ने पूरे ईरान में लोगों को भावुक कर दिया और शोक की भावना को और गहरा कर दिया हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान इस पूरे घटनाक्रम को केवल सैन्य संघर्ष के रूप में नहीं, बल्कि न्याय और अन्याय की वैचारिक लड़ाई के रूप में भी पेश कर रहा हैं। यही वजह है कि कर्बला और इमाम हुसैन की शहादत का लगातार उल्लेख किया जा रहा है, ताकि इस संघर्ष को धार्मिक और नैतिक प्रतीकों से जोड़ा जा सके हैं।

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