By अभिनय आकाश | Jun 03, 2026
2 मई का दिन जब हाथों में ऊनों के सारे वाइल्ड कार्ड को थामे ट्रंप ने अपने ट्रूथ सोशल पर तस्वीर पोस्ट की थी। इस पर लिखा था आई हैव ऑल द कार्डस। तब इसे ईरान जंग से जोड़कर देखा गया था। ट्रंप ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलने के लिए नया-नया एक प्लान बनाया था और उसी की खुशी सोशल मीडिया पर वो बांट रहे थे। अब वो प्रोजेक्ट भी ठंडे बस्ते में जा चुका है और शायद ट्रंप का यह दावा भी। तभी तो ईरान की एक धमकी पर डोनाल्ड ट्रंप अपने पक्के पक्के दोस्त बेंजामिन नेतन्याहू को भी नहीं बख्श रहे हैं। खबर है कि ट्रंप ने नेतन्याहू को फोन मिलाया, जमकर लताड़ लगाई, बात गाली गलौज तक पहुंच गई। लेकिन क्यों? ईरान से ऐसी क्या धमकी थी जिसकी वजह से ट्रंप ने यह कदम उठाया? क्या नेतन्याहू की वजह से ईरान डील अटक जाएगी? आज इन्हीं तमाम मुद्दों का एमआरआई स्कैन करेंगे।
1 जून को हुई इस फोन कॉल से एक दिन पहले ही ईरान ने यह वार्निंग दे दी थी कि अगर इजराइल लेबनान में अपने ऑपरेशंस जारी रखता है तो वो अमेरिका के साथ चल रही बातचीत छोड़ सकता है और इसीलिए ट्रंप चाहते हैं कि इजराइल बेरूत पर हमले ना करें। कॉल के बाद ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत तेजी से जारी है। अपने ट्रूप सोशल पर भी उन्होंने यह पोस्ट किया और रिपोर्ट यह दावा कर रही है कि इस बातचीत में ट्रंप ने पूरी तरह दबाव बना लिया। आखिर में नेतन्याहू को बात माननी ही पड़ी और दूसरी तरफ अमेरिका और ईरान के बीच जो समझौता तैयार हो रहा है उसमें लेबनान में लड़ाई खत्म करने की बात भी शामिल है। हालांकि ट्रंप को यह भी पता था कि हिजबुल्ला इजराइल पर लगातार हमले कर रहा है और इजराइल को अपनी रक्षा का भी हक है। लेकिन ट्रंप को लगा कि नेतन्याहू जरूरत से ज्यादा अपने मिलिट्री ऑपरेशंस को एस्केलेट कर रहे हैं। ट्रुथ सोशल पर डोनल्ड ट्रंप ने लिखा कि मेरी इजराइली प्रधानमंत्री बेंजमिन नेतन्याहू से बहुत बढ़िया बात हुई। अब बेरूत की सड़कों पर इजराइली सैनिक नजर नहीं आएंगे। जो पहले ही जा चुके हैं वह अब लौट रहे हैं। इसी तरह मेरे प्रतिनिधियों ने हिजबुल्ला से भी बातचीत की। वह हमलों को रोकने के लिए तैयार हो गए हैं। इसके बाद बेंजामिन नेतन्याहू ने भी पोस्ट किया और लिखा कि मेरी राष्ट्रपति ट्रंप से बात हुई। भी मैंने उन्हें कह दिया है कि अगर हिजबुल्लाह हमारे शहरों हमारे लोगों पर हमले नहीं रोकेगा तो हम दोबारा बेरूत को निशाना बनाएंगे। हमारी सेना आईडीएफ दक्षिणी लेबनान ने अपना ऑपरेशन प्लान के मुताबिक जारी रखेगी। यानी नेतन्याहू बेरूत में हमला रोकने के लिए तो मान गए लेकिन साउथ लेबनान में इजराइल हमले करता रहेगा। इस पूरे वाक्य से यह तो साफ हो गया है कि ट्रंप के लिए ईरान के साथ डील करना कितना ज्यादा जरूरी है। वो नहीं चाहते कि किसी भी थर्ड फैक्टर की वजह से यह डील अटक जाए। ट्रंप की इच्छा वाजिब भी है। अमेरिका के हालात इस वक्त ट्रंप की राजनीति के लिए सही नहीं है। गैस की कीमतें जंग से पहले 2 से $.5 प्रति गैलन होती हैं जो अब $4.5 को भी पार कर चुकी हैं। मिड टर्म इलेक्शन भी सर पर है और जंग की वजह से ट्रंप अपनी पार्टी के अंदर भी अनपॉपुलर लगातार होते जा रहे हैं। ऐसे में ट्रंप इस वक्त ऐसा कुछ भी नहीं होने देना चाहते जिससे ईरान डील से पीछे हट जाए।
ट्रम्प प्रशासन ईरान से शांति समझौते के लिए वार्ता कर रहा है। नेतन्याहू द्वारा बेरूत पर हमले जारी रखने से ट्रम्प की पूरी कूटनीति दांव पर लग गई, जिससे अमेरिकी राष्ट्रपति भड़क गए। नेतन्याहू की सैन्य कार्रवाइयों और नागरिकों की मौतों के कारण दुनिया भर में इजराइल और अमेरिका के खिलाफ नफरत बढ़ रही है। अमेरिकी जनता मिडिल ईस्ट के युद्धों से थक चुकी है। ट्रम्प भी अब अपनी बड़ी प्राथमिकताओं (जैसे चीन नीति और घरेलू अर्थव्यवस्था) पर ध्यान देना चाहते हैं। इस जंग से निकलना चाहते हैं। अगर नेतन्याहू के कारण ईरान और लेबनान में युद्ध और भड़कता है, तो वैश्विक तेल की कीमतें बढ़ेगी और अमेरिका एक अंतहीन जंग में फंस जाएगा, जो ट्रम्प को अपनी घरेलू राजनीति के लिए मंजूर नहीं है।
गाजा युद्ध, ईरान रणनीति और युद्धविराम को लेकर ट्रम्प और नेतन्याहू के बीच दरार बढ़ती गई। 2020 में नेतन्याहू ने अमेरिकी चुनाव के तुरंत बाद जो बाइडेन को बधाई दी थी। इससे नाराज ट्रम्प ने नेतन्याहू के लिए अपशब्द तक कहा था। ट्रम्प ने आरोप लगाया था कि कासिम सुलेमानी पर अमेरिकी हमले के समय नेतन्याहू आखिरी वक्त में पीछे हट गए थे। कहा मैं यह कभी नहीं भूलूंगा। 2023 में हमास हमले के बाद ट्रम्प ने सहानुभूति जताने के बजाय ट्रम्प ने सार्वजनिक रैली में नेतन्याहू की खुफिया विफलता की कड़ी आलोचना की और हिजबुल्लाह को 'स्मार्ट' कह दिया। 2024 में ट्रम्प लगातार दबाव बनाते रहे कि इजरायल गाजा में जंग जल्द खत्म करे, पर नेतन्याहू अपनी घरेलू राजनीति के लिए युद्ध को लंबा खींचते रहे।
विश्व युद्ध के बाद सबसे ज्यादा महंगाई: ईरान में मई 2026 में महंगाई दर 77.2% पर पहुंच गई, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। दवाइयों, टैक्सी किराये और संचार जैसी रोजमर्रा की जरूरतों की कीमते एक साल में 113.8% बढ़ गई। ईरानी मुद्रा रियाल की कीमत भी बुरी तरह गिरी है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती महंगाई और आर्थिक संकट के कारण फिर बड़े विरोध-प्रदर्शन भड़क सकते हैं।
ईरान में मई 2026 में महंगाई दर 77.2% पर पहुंच गई, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। दवाइयों, टैक्सी किराये और संचार जैसी रोजमर्रा की जरूरतों की कीमते एक साल में 113.8% बढ़ गई। ईरानी मुद्रा रियाल की कीमत भी बुरी तरह गिरी है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती महंगाई और आर्थिक संकट के कारण फिर बड़े विरोध-प्रदर्शन भड़क सकते हैं।
इजराइल और लेबनान के बीच में पहला सीज फायर 17 अप्रैल को हुआ था। 15 मई को इसे 45 दिनों के लिए बढ़ा दिया गया। लेकिन सीजफायर के बावजूद इजराइल लगातार लेबनान पर हमले कर रहा है। उसका तर्क है कि यह हमले हिजबुल्लाह के खिलाफ सेल्फ डिफेंस है। इसलिए यह सीजफायर का उल्लंघन नहीं है। लेबनान की पब्लिक हेल्थ मिनिस्ट्री के मुताबिक 25 मई से 1 जून तक इजराइल के हमलों में करीब 250 लोग मारे गए। तो फिर ईरान ने अब बातचीत बंद करने की धमकी क्यों दी? वजह है इजराइल का 31 मई को लेबनान में इजराइली सेना का ऑपरेशन। इसमें इजराइल ने दक्षिणी लेबनान में ऐतिहासिक ब्यूफोर्ट कासल पर कब्जा कर लिया है। कासल यानी किला समझिए। इजराइली सेना ने एक वीडियो इस बारे में जारी किया जिसमें इस किले पर इजराइयली झंडा लहराता नजर आया। यह किला रणनीतिक तौर पर बहुत अहम है। यह दक्षिणी लेबनान में लितानी नदी की घाटी के ठीक ऊपर एक ऊंची पहाड़ी पर बना है और इजराइल की सरहद से 14.5 कि.मी. दूर है। यहां से पूरे इलाके पर आसानी से नजर रखी जा सकती है। इस किले का इतिहास करीब 900 साल पुराना है। इसे क्रुसेडर्स यानी धर्म युद्ध लड़ने वाले ईसाइयों ने बनवाया था। 44 साल पहले 1982 में इजराइल ने इसी किले पर पहली बार कब्जा जमाया था। तब फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन यानी पीएलओ के लड़ाके इस किले पर काबिज थे। इजराइल ने पूरे 18 साल यानी 1982 से लेकर 2000 तक इस किले में अपनी मिलिट्री पोस्ट बनाए रखी। अब 18 बरसों में हिजबुल्ला और दूसरे चरमपंथी इस किले पर लगातार गोरिल्ला हमले करते रहे। इजराइयली सैनिकों के लिए वहां ड्यूटी करना कभी भी आसान नहीं था। इस किले के नाम पर व्यूफोर्ट नाम की एक मशहूर फिल्म भी बनी थी जिसे ऑस्कर नॉमिनेशन भी मिला था। साल 2000 में जब इजराइल ने लेबनान से अपनी सेना वापस बुलाई तो यह किला भी खाली कर दिया। 26 साल बाद इजराइली झंडा एक बार फिर इस किले पर लहराया गया। इस बात ने हिजबुल्ला और ईरान दोनों को बेचैन कर दिया।