Wedding Season शुरू हो गया, Iran-US War खत्म हो गयी, क्या अब Gold Jewellery को खरीदना सही रहेगा?

By नीरज कुमार दुबे | Jun 18, 2026

पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से एक साल तक सोना नहीं खरीदने और सादगी अपनाने की अपील की थी। उनका तर्क था कि भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना आयातक देशों में शामिल है और जब कच्चे तेल की कीमतें तथा वैश्विक तनाव दोनों बढ़ते हैं, तब सोने का आयात देश के विदेशी मुद्रा भंडार और चालू खाते के घाटे पर भारी दबाव डालता है। इसी चिंता को देखते हुए सरकार ने सोना और चांदी पर सीमा शुल्क छह प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया था। इस फैसले के बाद देश में सोने का आयात करीब 70 प्रतिशत घटकर 75 से 100 टन प्रति माह के स्तर से गिरकर केवल 25 से 30 टन रह गया।

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दरअसल, भारत में सोने के प्रति मोह सबसे ज्यादा देखने को मिलता है। यहां सोने का महत्व केवल निवेश तक सीमित नहीं है। भारत में सोना सामाजिक प्रतिष्ठा, सुरक्षा और पारिवारिक परंपरा का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि हर वर्ष सैकड़ों टन सोना आयात किया जाता है। आर्थिक रिपोर्टों के अनुसार भारत ने पिछले वर्ष 800 टन से अधिक सोना आयात किया, जबकि घरेलू उत्पादन बेहद कम रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी भारी निर्भरता भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ाती है।

अब सवाल यह है कि यदि ईरान अमेरिका संघर्ष समाप्ति की ओर बढ़ रहा है, तो क्या लोगों को फिर से सोना खरीदना शुरू कर देना चाहिए? इस प्रश्न का उत्तर सीधा नहीं है, क्योंकि सोने की कीमतें केवल युद्ध से तय नहीं होतीं। उनमें डॉलर की मजबूती, अमेरिकी ब्याज दरें, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी, महंगाई और निवेशकों की मनोवृत्ति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

हाल के सप्ताहों में देखने को मिला कि जैसे ही अमेरिका और ईरान के बीच अस्थायी समझौते तथा युद्धविराम की खबरें सामने आयीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में नरमी आई। तेल कीमतों में गिरावट और डॉलर की मजबूती के कारण सोना दबाव में रहा। अमेरिकी फेडरल रिजर्व की सख्त ब्याज दर नीति ने भी सोने की चमक कम की।

हालांकि दूसरी ओर कई वैश्विक निवेश बैंक अब भी लंबे समय के लिए सोने को मजबूत निवेश मान रहे हैं। जेपी मोर्गन का अनुमान है कि 2026 और 2027 में सोने की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं, क्योंकि दुनिया भर के केंद्रीय बैंक लगातार अपने भंडार में सोना जोड़ रहे हैं। कई विश्लेषकों का कहना है कि युद्ध समाप्त होने के बाद सोने में तात्कालिक गिरावट संभव है, लेकिन लंबी अवधि में इसकी मांग बनी रह सकती है। मार्केटवाच की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल युद्ध के आधार पर सोना खरीदना हमेशा लाभकारी रणनीति नहीं होती, क्योंकि कई बार युद्ध के दौरान भी सोना गिरा है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि सोने को भावनात्मक निर्णय की बजाय संतुलित निवेश के रूप में देखना चाहिए।

उधर, भारत में इस समय शादी विवाह का मौसम शुरू हो चुका है। पारंपरिक रूप से यह वह समय होता है जब परिवार आभूषण खरीदने के लिए बाजार का रुख करते हैं। लेकिन इस बार स्थिति अलग है। एक ओर कीमतों में भारी उतार चढ़ाव है, दूसरी ओर वैश्विक हालात को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। यही कारण है कि आम उपभोक्ता दुविधा में है कि अभी खरीदारी करे या कुछ समय प्रतीक्षा करे।

ज्वेलरी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि जिन परिवारों को अगले कुछ महीनों में विवाह के लिए आभूषण की आवश्यकता है, उन्हें पूरी खरीदारी एक साथ करने की बजाय चरणबद्ध तरीके से करनी चाहिए। यदि कीमतों में गिरावट आती है तो औसत लागत कम हो सकती है। निवेश के नजरिये से भी विशेषज्ञ सलाह दे रहे हैं कि केवल भौतिक सोना खरीदने के बजाय डिजिटल गोल्ड, गोल्ड ईटीएफ या सावरिन गोल्ड बांड जैसे विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है।

इसके अलावा, ज्वैलरी बाजार में ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए कई बड़े-छोटे ज्वैलर्स पुराने सोने के आभूषणों के बदले नये आभूषण देने की विशेष योजनाएं भी चला रहे हैं। बाजार में अनिश्चितता और ऊंची कीमतों के कारण ग्राहक सीधे नयी खरीदारी से बच रहे हैं, इसलिए ज्वैलर्स एक्सचेंज आफर, कम मेकिंग चार्ज और अतिरिक्त छूट जैसी योजनाएं लेकर आए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जिन परिवारों के पास पुराना सोना रखा हुआ है, वे इन योजनाओं का लाभ उठाकर अपेक्षाकृत कम खर्च में नये डिजाइन के आभूषण खरीद सकते हैं। कई कंपनियां पुराने गहनों के मूल्यांकन पर अतिरिक्त बोनस भी दे रही हैं, जिससे ग्राहकों को बाजार की ऊंची कीमतों के बावजूद राहत मिल रही है। शादी विवाह के मौजूदा मौसम में यह विकल्प खास तौर पर मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए उपयोगी माना जा रहा है, क्योंकि इससे एकमुश्त भारी नकद खर्च का दबाव कम हो सकता है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत में महंगाई और कच्चे तेल की कीमतों का सीधा असर सोने पर पड़ता है। हाल की रिपोर्टों में बताया गया है कि ईरान संघर्ष के कारण थोक महंगाई में तेजी आई थी। यदि युद्ध वास्तव में समाप्त होता है और तेल कीमतें स्थिर रहती हैं, तो भारतीय बाजार में सोने की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।

बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी की अपील तत्काल आर्थिक दबाव को कम करने की कोशिश थी। लेकिन भारतीय समाज में सोने का सांस्कृतिक महत्व इतना गहरा है कि इसकी मांग पूरी तरह रुकना संभव नहीं है। ईरान अमेरिका तनाव कम होने से अल्पकाल में कीमतों में नरमी आ सकती है, इसलिए जिन परिवारों को वास्तविक आवश्यकता है, वे योजनाबद्ध और सीमित खरीदारी कर सकते हैं। वहीं निवेशकों को जल्दबाजी से बचते हुए लंबी अवधि की रणनीति अपनानी चाहिए, क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

-नीरज कुमार दुबे

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