अतीत में हुए भेदभाव पर सवर्णों के वर्तमान-भविष्य को कानूनी शिकंजे में कसना न्यायसंगतता का तकाजा नहीं?

By कमलेश पांडे | Feb 01, 2026

अतीत के भेदभाव को आधार बनाकर सवर्ण समाज के वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों को दंडित करने या आरक्षण जैसी नीतियों से बांधना न्यायसंगतता के सिद्धांतों के विरुद्ध प्रतीत होता है, क्योंकि यह व्यक्तिगत योग्यता को नजरअंदाज कर सामूहिक दोषारोपण करता है। इसलिए यक्ष प्रश्न है कि अतीत में हुए भेदभाव पर सवर्णों के वर्तमान-भविष्य को कानूनी शिकंजे में कसना दलित-ओबीसी नेतृत्व की न्यायसंगतता का तकाजा नहीं है!

लिहाजा, उन्मुक्त हृदय से उनके मौजूदा प्रगतिशील नेताओं को गहराई पूर्वक विचार करना चाहिए और अपने पूर्वजों के प्रतिगामी नजरिए को बदलकर स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व के राष्ट्रव्यापी लोकतांत्रिक भाव को मजबूत करना चाहिए। अन्यथा सामाजिक विघटन को परमाण्विक प्रक्रिया तेज होगी और इससे पैदा हुए जनविद्वेष की आग में देर-सबेर हरेक शांतिप्रिय लोगों के भी झुलसने का आसन्न खतरा बना रहेगा। ऐसा इसलिए कि यह नीतिगत, वैधानिक और रणनीतिक सवाल है जिसे कूटनीतिक स्वार्थवश विदेशों से हवा दी गई, इसे संवैधानिक स्वरूप प्रदान किया गया, जिससे जातिविहीन हिंदुत्व के राष्ट्रवादी विचार को गहरा धक्का लगा है। 

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जहां तक इस कुत्सित सोच की वैधानिक न्यायसंगतता के आधार का सवाल है तो भारतीय संविधान समानता (अनुच्छेद 14-16) और सामाजिक न्याय पर जोर देता है, लेकिन अतीत के अपराधों के लिए वर्तमान निर्दोषों को "सजा" देना प्रतिशोधात्मक लगता है, जो अबतलक बदस्तूर जारी है। इसलिए कहीं न कहीं यह सामाजिक एकता को कमजोर करता प्रतीत होता है। वहीं, जहां तक इस आशय की हुई क्षतिपूर्ति की अवधारणा की बात है तो यह अतीत-वर्तमान के अंतर्संबंध पर आधारित है, परंतु यह तब न्यायपूर्ण होती है जब यह पीड़ितों को शक्ति प्रदान करे, न कि नए भेदभाव को जन्म दे। 

खासकर भारतीय संदर्भ में जातिगत भेदभाव के विरुद्ध अनुसूचित जाति, जनजाति और अत्यंत पिछड़ा वर्ग  (SC/ST/OBC) आरक्षण ऐतिहासिक अन्याय सुधारने का ब्रितानी और भारत सरकार का विषैला सियासी प्रयास है, किंतु यूजीसी बिल (2026) जैसे नए प्रतिगामी नियमों व

कदमों के दुरुपयोग की आशंका पैदा करते हैं, जहां झूठे आरोप सामाजिक कड़वाहट बढ़ा सकते हैं। यह ठीक है कि रोहित वेमुला या पायल तडवी जैसे मामले दर्दनाक हैं, लेकिन नीतियां ऐसी हों जो योग्यता और समावेश को प्राथमिकता दें। 

ऐसा इसलिए कि एक तो छात्र राजनीति से पढ़ाई-लिखाई पर आंच आई, विश्वविद्यालय कैम्प्स की गरिमा गिरी है और अब उन्हें जातीय नजरिए से बांटना आग से खेलने जैसा मूर्खता भरा सियासी कदम है। इससे सांप्रदायिक राष्ट्रवाद की तरह ही जातिवादी राष्ट्रवाद की भावना को बल मिलेगा।

इसलिए बेहतर होगा कि हमारा सत्ता प्रतिष्ठान वैकल्पिक दृष्टिकोण विकसित करे। मेरे विचार से शिक्षा, जागरूकता और आर्थिक उत्थान से भेदभाव दूर करना अधिक न्यायसंगत है, क्योंकि संस्थागत भेदभाव को समाप्त करने से भविष्य स्वाभाविक रूप से समान बनेगा।

कहना न होगा कि अतीत को याद रखना जरूरी है, किंतु वर्तमान को उसके बोझ से मुक्त रखना ही सामाजिक प्रगति का आधार है। हमें यह सोचना पड़ेगा कि जिन्नावादी  सांप्रदायिक सोच से निरंतर झुलस रहे भारतीय उपमहाद्वीप को ब्रितानी और अंबेडकरवादी/लोहियावादी जातिवादी सोच से विखंडित करने का जो मूर्खतापूर्ण सरकारी प्रयास जारी है, उससे जब सत्तर साल बाद भी मुट्ठीभर दलित-आदिवासी-ओबीसी की ही भलाई हो पाई है और उनमें भी नवसामंती भावना प्रबल हुई है, जिससे विखंडित जनादेश आने से अवसरवाद बढ़ा है। यह भारत के समावेशी विकास में भी अब बाधक बनता प्रतीत होता है।

यह ठीक है कि भारत में जातिगत भेदभाव के लिए क्षतिपूर्ति मुख्यतः सकारात्मक कार्रवाई (affirmative action) के रूप में लागू होती है, जो ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने का प्रयास करती है। क्योंकि यह आरक्षण, कल्याणकारी योजनाओं और विधायी सुरक्षा के माध्यम से कार्य करती है। इस हेतु संवैधानिक प्रावधान भी नियत हैं।भारतीय संविधान अनुच्छेद 15, 16, 46 और 335 के तहत SC/ST/OBC को शिक्षा, नौकरियों और विधायी सुरक्षा प्रदान करता है, जो भेदभाव रोकने और उत्थान सुनिश्चित करने के लिए हैं। वहीं, अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को समाप्त करता है। जबकि SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 अपराधों पर दंड और पीड़ितों को राहत देता है।

आरक्षण सम्बन्धी प्रमुख नीतियां भी स्पष्ट हैं। सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण SC को 15%, ST को 7.5%, OBC को 27% कोटा नियत है। इसी आधार पर उन्हें छात्रवृत्तियां भी दी जाती हैं। उन्हें पोस्ट-मैट्रिक, प्री-मैट्रिक और अन्य योजनाएं वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं। वहीं, कल्याणकारी योजनाएं जैसे प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना, स्वरोजगार ऋण, कौशल विकास और आवास योजनाएं (जैसे अंबेडकर आवास योजना) से भी उन्हें लाभान्वित किया जाता है। वहीं, आर्थिक रूप से कमजोर यानी गरीब सवर्णों को भी नौकरी में 10 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है, लेकिन अन्य सहूलियत उन्हें मिलना अभी बाकी है।

हालांकि, भारत की जातिवादी आरक्षण वाली सोच के समक्ष कुछ मजबूत चुनौतियां भी हैं। अगड़े भारतवासी इन्हें जाति की बजाए आर्थिक करने की मांग निरंतर करते आये हैं। वैश्विक नजरिए से भी ये नीतियां दक्षिण अफ्रीका या अमेरिका जैसे देशों की क्षतिपूर्ति (reparations) से भिन्न हैं, जहां प्रत्यक्ष आर्थिक मुआवजा दिया जाता है; जबकि भारत में फोकस सशक्तिकरण पर है, लेकिन इसके दुरुपयोग और सामाजिक तनाव की अकसर आलोचना होती है।

सवाल है कि आखिर ऐतिहासिक भेदभाव या उत्पीड़न क्या है? तो जवाब होगा कि ऐसे ऐतिहासिक भेदभाव या उत्पीड़न से तात्पर्य उन सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक प्रक्रियाओं से है जो लंबे समय से चली आ रही हैं और जिनके कारण कुछ समूहों को व्यवस्थित रूप से हाशिए पर धकेल दिया गया। यह अक्सर जाति, नस्ल, लिंग या धर्म जैसे आधारों पर आधारित होता है, जिसकी जड़ें सदियों पुरानी सामाजिक संरचनाओं में निहित हैं। वहीं, उत्पीड़न इसके हिंसक या शोषणकारी रूप को दर्शाता है, जैसे बहिष्कार या हिंसा। 

इसप्रकार ऐतिहासिक भेदभाव किसी विशिष्ट विशेषता (जैसे जाति या नस्ल) के आधार पर समूहों के साथ जानबूझकर भिन्न व्यवहार है, जो पीढ़ियों तक चलता रहता है। भारत में यह जाति व्यवस्था से जुड़ा है, जहां दलितों को मंदिर, पानी या शिक्षा से वंचित रखा गया था। भारत में इसके लिये अकसर सवर्ण समाज खासकर ब्राह्मणों को आरोपित किया जाता है, जबकि सनातनी ब्राह्मणों ने तो उन्हें धार्मिक रूप से भी हिंदुत्व की माला में पिरोया है और उन्हें श्रेष्ठता प्रदान की है। जबकि मुस्लिम काल और अंग्रेजी काल में उनके हुए उत्पीड़न व शोषण से इनकार नहीं किया जा सकता है। चूंकि भारत सरकार में भी इस्लामिक व ब्रिटिश सत्तागत सोच वाली बुराइयों को निरंतरता प्रदान की गई है, जो बहस का विषय है।

 उदाहरणस्वरूप, जातीय उत्पीड़न को ही लेते हैं। आपको पता होना चाहिए कि दलितों पर शारीरिक हिंसा, यौन शोषण या सामाजिक बहिष्कार, जो औपनिवेशिक काल से चला आ रहा, निंदनीय है। वहीं, नस्लीय भेदभाव का भी यही आलम है। जैसे दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद नीति या अमेरिका में रेडलाइनिंग, जहां नस्ल के आधार पर ऋण अस्वीकार किए गए। कुछ वैसा ही घटनाक्रम भारत में भी चला ब्रिटिश प्रभाव वश। वहीं, उपनिवेशिक प्रभाववश मुगलिया और ब्रिटिश राज में भारतीय अभिजात वर्ग को भी भेदभाव का शिकार बनाया गया, जो सामाजिक विषमता को गहरा करने वाला था। यह भेदभाव आज भी असमानता को बनाए रखता है, जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा या रोजगार में अवसरों की कमी। कानूनी उपाय जैसे भारत का संविधान (अनुच्छेद 15, 17) इसे समाप्त करने का प्रयास करते हैं। 

भारत में भेदभाव रोकने के लिए संविधान और विभिन्न कानून प्रमुख भूमिका निभाते हैं, खासकर जाति, नस्ल या लिंग आधारित ऐतिहासिक भेदभाव के खिलाफ। ये प्रावधान समानता सुनिश्चित करते हैं और दंडनीय अपराध बनाते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 समानता का अधिकार देते हैं। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता, अनुच्छेद 15 धर्म-जाति-लिंग आदि पर भेदभाव निषेध, अनुच्छेद 16 सरकारी नौकरियों में समान अवसर, अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता उन्मूलन, और अनुच्छेद 18 उपाधियों का अंत सुनिश्चित करते हैं। 

वहीं, कुछ प्रमुख कानून भी बनाए गए हैं। जैसे  नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955: अस्पृश्यता या छुआछूत को दंडनीय बनाता है। SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989: अनुसूचित जाति/जनजाति पर अत्याचार रोकने के लिए सख्त प्रावधान। इसी सिलसिले की अगली कड़ी UGC विनियम, 2026 है, जिससे उच्च शिक्षा में जाति-आधारित भेदभाव रोकने के नए नियम बनाये गए हैं। जहां तक इनके कार्यान्वयन की बात है तो ये कानून अदालतों द्वारा लागू होते हैं, जैसे इंद्रा साहनी मामले में आरक्षण को मान्यता। शिकायत के लिए समर्पित सेल और पोर्टल उपलब्ध हैं। यूजीसी बिल पर भी सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश विचारणीय है।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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