By रेनू तिवारी | Feb 04, 2026
वह जब पहली बार खाकी वर्दी वालों के बीच आया था, तो महज तीन महीने का एक मासूम पिल्ला था। उसे न सरहदों का इल्म था और न ही जंग के मैदान का। लेकिन आज वही 'रेमो' (परिवर्तित नाम) भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) का वह जांबाज योद्धा है, जिसके सामने नक्सली आईईडी (IED) और बारूद भी बेअसर साबित होते हैं। रेमो की कहानी उन सैकड़ों 'कॉम्बैट डॉग्स' की हिम्मत की दास्तां है, जिन्हें खेल-खेल में मौत को मात देना सिखाया जाता है।
Note -यह खबर पीटीआई भाषा द्वारा प्रकाशित की गयी है लेखक ने मात्र कुछ मामूली व्याकरण संबंधी सुधार किए हैं।
रेमो की कहानी सेना के उन सैकड़ों कॉम्बैट डॉग्स की एक झलक है, जिन्हें खेल-खेल में मौत को मात देने का हुनर सिखाया जाता है। रेमो के हैंडलर (आईटीबीपी में तैनात जवान) ने पीटीआई- को बताया कि रेमो की पहली तैनाती छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्र में की गयी थी।
यह वह क्षेत्र है जहां जमीन के नीचे नक्सलियों द्वारा दबाए गए आईईडी जवानों के लिए सबसे बड़ा खतरा होते हैं। जवान के मुताबिक, रेमो ने वहां अपनी सूंघने की क्षमता से कई बार सुरक्षा बलों का रास्ता साफ किया। रेमो को एक कुशल विस्फोटक खोजी कुत्ता बनाने में पूरे नौ महीने का समय लगा। जवान ने उसकी प्रशिक्षण प्रक्रिया को याद करते हुए बताया, वह (रेमो) महज तीन महीने का था जब उसे ट्रेनिंग सेंटर में लाया गया और मुझे उसके प्रशिक्षण काजिम्मा दिया गया।
वह बहुत चंचल और शरारती था। कभी-कभी जब वह बात नहीं मानता था, तो गुस्सा भी आता था लेकिन इन्हें प्यार और लालच (पसंदीदा खाना, खिलौना) देकर ही सिखाना पड़ता है। हमने प्रशिक्षण के दौरान कभी-कभी 24 घंटे भी साथ बिताए और फिर वह दिन आया जब वह मेरा सबसे वफादार साथी बन गया।” तीन महीने से बड़े किसी भी कुत्ते को सेना में शामिल नहीं किया जाता है।
रेमो के हैंडलर बताते हैं कि किसी भी कुत्ते को सेना या अर्धसैनिक बल में शामिल करने के लिए उसकी उम्र 3 महीने से अधिक नहीं होनी चाहिए। इसके बाद शुरू होता है 9 से 18 महीनों का कठोर प्रशिक्षण, जो तीन चरणों में पूरा होता है:
बेसिक कमांड (तालमेल): पहले चरण में कुत्ते और उसके 'हैंडलर' के बीच रिश्ता बनाया जाता है। बैठना, उठना और निर्देशों का पालन करना सिखाया जाता है।
बिहेवियर टेस्ट: कुत्ते की क्षमता के आधार पर तय किया जाता है कि वह विस्फोटक खोजेगा, नशीले पदार्थ पकड़ेगा या अपराधियों को ट्रैक करेगा।
स्पेशलाइजेशन (विशेष प्रशिक्षण): यहाँ उन्हें जमीन सूंघने और विशिष्ट गंध (जैसे बारूद) पहचानने पर 'इनाम' (पसंदीदा खाना या खिलौना) दिया जाता है।
कुत्तों को न्यूनतम नौ महीने से लेकर 18 महीनों का प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रशिक्षण प्रक्रिया तीन चरणों में पूरी होती है। जवान के अनुसार, शुरुआती चरण में कुत्तों को ‘बेसिक कमांड’ सिखाए जाते हैं, जिसमें बैठना, उठना, चलना और हैंडलर के निर्देशों का पालन करना शामिल होता है। इसी दौरान कुत्ता और हैंडलर के बीच तालमेल बनता है। हर कुत्ते का एक हैंडलर तय होता है, जो उसे प्रशिक्षण देने से लेकर ड्यूटी पूरी करवाने तक उसके (कुत्ते के) साथ काम करता है।
जवान ने बताया कि कुत्ता और हैंडलर के बीच तालमेल बेहद अहम होता है। अगर हैंडलर बदला जाए, तो कुत्ते को नए व्यक्ति के साथ सामंजस्य बिठाने में समय लगता है, जिससे उसका काम प्रभावित होता है। बेसिक ट्रेनिंग के बाद कुत्ते का ‘बिहेवियर टेस्ट’ और क्षमता परीक्षण किया जाता है। इसी के आधार पर तय किया जाता है कि किस कुत्ते को विस्फोटक की पहचान, नशीले पदार्थो की पहचान, ट्रैकिंग (अपराधियों का पता लगाना) या गार्ड ड्यूटी के लिए तैयार किया जाएगा।
एक कुत्ते को केवल एक ही तरह का विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। जवान के मुताबिक, इसके बाद तीसरे चरण में उन्हें विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है जिसमें उन्हें सबसे पहले जमीन पर नाक लगाकर सूंघने की आदत डलवाई जाती है और सही गंध पहचानने पर उन्हें इनाम दिया जाता है। धीरे-धीरे इसी अभ्यास में बारूद और अन्य विस्फोटक पदार्थों की गंध शामिल की जाती है जिसके बाद कुत्ता बारूद की पहचान करने में माहिर हो जाता है।
प्रशिक्षण के दौरान कुत्तों को शारीरिक रूप से भी तैयार किया जाता है। उन्हें अलग-अलग सतहों पर चलने, संतुलन बनाए रखने और बाधाओं को पार करने का अभ्यास कराया जाता है, ताकि वे मुश्किल और जोखिम भरी परिस्थितियों में भी काम कर सकें। रेमो की ट्रेनिंग का सबसे कठिन हिस्सा उसे साइलेंट इंडिकेशन सिखाना था। जवान ने बताया, अगर कुत्ता विस्फोटक देखकर भौंकने लगे, तो आवाज की तरंगों से कुछ संवेदनशील बम फट सकते हैं।
इसलिए कुत्तों को सिखाया जाता है कि गंध मिलते ही वह चुपचाप वहां बैठ जाएं। उन्हें यह सिखाया जाता है कि वे बम से निर्धारित दूरी पर बैठें। उनके बैठने से हैंडलर को संकेत मिल जाता है कि वहां बम हो सकता है। जवान ने कहा, “कुत्ता इस दुनिया का सबसे वफादार प्राणी है। एक बार यदि उसके मालिक ने आदेश दे दिया कि तो वह अपना टॉस्क पूरा करके ही मानेगा। यही कारण है कि कुत्ते लगभग 99 प्रतिशत मामलों में सफल होते है।”
उन्होंने कहा, “कुत्ता यह नहीं जानता कि वह बारूद या विस्फोटक सामग्री की पहचान कर रहा है। उसके लिए यह महज एक खेल है। आदेश मिलने पर वह उसी गंध को खोजता है, जिसकी ट्रेनिंग उसे दी गई होती है।“ आईटीबीपी में विस्फोटक की पहचान के लिए बेल्जियम मेलिनोइस नस्ल के कुत्तों को प्राथमिकता दी जाती है। जवान ने बताया, “यह नस्ल बेहद फुर्तीली होती है और जल्दी थकती नहीं है, इसलिए कठिन परिस्थितियों और लंबे ऑपरेशन के लिए इन्हें उपयुक्त माना जाता है। पहले लैब्राडोर नस्ल के कुत्तों का भी इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन फील्ड ड्यूटी में बेल्जियम मेलिनोइस ज्यादा प्रभावी साबित हुए हैं।“
हालांकि, अब देशी नस्ल के कुत्तों को भी सेना में शामिल किया जा रहा है। जवान ने यह भी बताया कि अगर कोई कुत्ता उम्र या स्वास्थ्य संबंधी कारणों से ड्यूटी करने में असमर्थ नजर आता है तो चिकित्सीय परीक्षण के बाद उसे सेवानिवृत्त कर, कुत्तों के लिए समर्पित स्थान पर रखा जाता है जहां आईटीबीपी द्वारा इनकी देखभाल की जाती है। आईटीबीपी के इन प्रशिक्षित कुत्तों ने नक्सल रोधी अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भीड़-भाड़ वाले आयोजनों, कार्यक्रमों और अन्य सुरक्षा ड्यूटी में भी इन कुत्तों की तैनाती की जाती है।
News Source- Press Trust OF India- यह खबर पीटीआई भाषा द्वारा प्रकाशित की गयी है लेखक ने मात्र कुछ मामूली व्याकरण संबंधी सुधार किए हैं।