UNSC की सीट के लिए 57 देशों से भिड़ा भारत, जयशंकर तोड़ेंगे तजाकिस्तान और ओआईसी का चक्रव्यूह!

By अभिनय आकाश | Jul 08, 2026

एक तरफ भारत की बढ़ती वैश्विक धमक है तो दूसरी तरफ 57 इस्लामिक देशों का वो ताकतवर ब्लॉक जिसे ओआईसी कहा जाता है। न्यूयॉर्क के संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में एक ऐसी जंग की बिसात बीच चुकी है जो आने वाले दशकों के लिए वैश्विक राजनीति की दिशा तय करेगी। विदेश मंत्री एस जयशंकर 10 जुलाई को न्यूयॉर्क पहुंच रहे हैं। लेकिन उनके बैग में सिर्फ फाइलें नहीं बल्कि भारत की 2028-29 के लिए यूएससी की अस्थाई सदस्यता का वो मास्टर प्लान है जिसे दुनिया के कई देश बचा नहीं पा रहे हैं। दरअसल भारत अपनी दावेदारी उस वक्त पेश कर रहा है जब दुनिया एक ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठी है। यूक्रेन युद्ध थमा नहीं था कि मिडिल ईस्ट में आग लग गई। ईरान पर इजराइल और अमेरिका के दबाव ने पूरे ग्लोबल साउथ को हिलाकर रख दिया। आज विकासशील देश खाद्य और ईंधन के संकट से करा रहे हैं। भारत यहां एक मसीहा के रूप में उभर रहा है और डॉक्टर एस जयशंकर का तर्क सीधा है कि अगर संयुक्त राष्ट्र में बड़े पैमाने पर सुधार नहीं हुआ तो यह संस्था अपनी प्रासंगिकता खो देगी। लेकिन सुधारों की इस मांग के बीच असली खेला शुरू हुआ है एशिया पेसिफिक की उस एक सीट के लिए जिस पर भारत और तजाकिस्तान दोनों की नजरें हैं। अब बात करते हैं उस अड़ंगे की जिसने भारत की चिंता बढ़ा दी है। दरअसल इस अड़ंगे का नाम है तजाकिस्तान और ओआईसी का चक्रव्यूह। 

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डॉ. एस जयशंकर का मिशन ओआईसी ब्लॉक में सेंध लगाना है। वे अच्छे से जानते हैं कि अगर सऊदी अरब या यूएई जैसे देशों को भारत के पक्ष में या कम से कम न्यूट्रल कर लिया गया तो तजाकिस्तान की बढ़त कम हो जाएगी। लेकिन चुनौतियां और भी है। मई में होने वाले इंडिया अफ्रीका फोरम समिट को इबोला संकट की वजह से टालना पड़ा। अफ्रीका के 54 वोट किसी भी जीत के लिए निर्णायक होते हैं और उस समिट का टलना भारत के लिए एक बड़ा सेट पैक था जिसकी भरपाई अब डॉ. जयशंकर न्यूयॉर्क में सीधी बातचीत से करेंगे। बता दें दुनिया बदल रही है। इसका सबूत जून 2026 की वोटिंग में दिखा। जब छोटे से देश किरगिस्तान ने फिलीपींस को भारी अंतर से हरा दिया। किरगिस्तान को 142 वोट मिले जबकि फिलीपींस को सिर्फ 49 यह हार संकेत थी कि अब सिर्फ पश्चिमी देशों का समर्थन काफी नहीं है। भारत इस पैटर्न को समझ चुका है। इसलिए भारत ने अब उन छोटे द्वीपीय देशों जैसे फिजी और यूरोपी सहयोगियों जैसे कि ऑस्ट्रिया का समर्थन जुटाना शुरू कर दिया है। अमेरिका का समर्थन भारत के साथ है। लेकिन यूएससी की गुप्त वोटिंग में अक्सर समीकरण आखिरी वक्त पर बदल जाते हैं। खैर कुल मिलाकर साल 2028-29 की यह सीट सिर्फ 2 साल का कार्यकाल नहीं है बल्कि यह भारत के विश्व मित्र बनने की परीक्षा है। डॉक्टर जयशंकर की कूटनीति के सामने एक तरफ चीन का परोख दबाव है तो दूसरी तरफ इस्लामिक ब्लॉक की गोलबंदी लेकिन भारत के पास ग्लोबल साउथ की वो बुलंद आवाज है जिसे आज की दुनिया इग्नोर नहीं कर सकती है। 

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