By नीरज कुमार दुबे | Oct 24, 2026
दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में छात्रसंघ चुनाव बहाली की मांग को लेकर चल रहा आंदोलन अब ऐसे विवादों के घेरे में आ गया है, जिनका जवाब विश्वविद्यालय प्रशासन ही नहीं, प्रदर्शनकारियों और उनके राजनीतिक समर्थकों को भी देना होगा। देखा जाये तो विश्वविद्यालय परिसर की दीवारों पर ‘फ्री कश्मीर’ और ‘फ्री शरजील इमाम’ जैसे नारे लिखे मिलने के बाद सवाल उठना लाजिमी है कि छात्रसंघ चुनाव की मांग करने वाले आंदोलन में आखिर कश्मीर और शरजील इमाम की रिहाई जैसे मुद्दे किस उद्देश्य से जोड़े जा रहे हैं? क्या यह केवल छात्र अधिकारों की लड़ाई है या इसके भीतर राजनीतिक लामबंदी का कोई दूसरा एजेंडा भी सक्रिय है?
देखा जाये तो छात्रसंघ चुनाव की बहाली अपने आप में एक अलग मुद्दा है, लेकिन उसके नाम पर परिसर में ऐसे नारे सामने आना, जो देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय अखंडता से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करते हैं, उन्हें किसी भी सूरत में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगर आंदोलन का उद्देश्य चुनाव कराना है, तो ‘फ्री कश्मीर’ का नारा किस मांग का प्रतिनिधित्व करता है? क्या प्रदर्शनकारी इस नारे की जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं? और यदि नहीं, तो विश्वविद्यालय की दीवारों पर इसे लिखने वालों की पहचान सार्वजनिक करने की मांग वे स्वयं क्यों नहीं करते?
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हम आपको याद दिला दें कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रसंघ 2006 में परिसर में हिंसा और उससे पढ़ाई में आए व्यवधान के बाद भंग कर दिया गया था। अब प्रदर्शनकारी 2026-27 के शैक्षणिक सत्र के लिए चुनाव कार्यक्रम घोषित करने की मांग कर रहे हैं। 12 अक्टूबर से भूख हड़ताल और धरना जारी है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस मामले पर विचार करने के लिए समिति भी गठित की है। लेकिन इस आंदोलन के बीच आरएसएस, एबीवीपी और कुलपति को निशाना बनाते नारे भी सामने आए हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इन नारों की निंदा करते हुए जिम्मेदार लोगों की पहचान करने और सख्त कार्रवाई करने की बात कही है। एबीवीपी ने भी कार्रवाई की मांग की है। पुलिस की तैनाती और परिसर की सुरक्षा बढ़ाए जाने से मामला और गंभीर हो गया है।
सबसे अहम सवाल यही है कि क्या छात्रसंघ बहाली की मांग को कुछ लोग अपने राजनीतिक विरोधियों पर हमला करने और विवादित नारेबाजी का मंच बना रहे हैं? यदि ऐसा है, तो आंदोलन के आयोजकों को स्पष्ट करना चाहिए कि उनकी प्राथमिकता चुनाव है या परिसर में वैचारिक टकराव को बढ़ावा देना।
इसके अलावा, विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार मोहम्मद महताब आलम रिजवी ने आरोप लगाया है कि कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी और इमरान मसूद ने एक दिन पहले दीवार फांदकर परिसर में प्रवेश किया और वहां का माहौल बिगाड़ा। प्रशासन के मुताबिक, उनके दौरे के बाद तनाव बढ़ा और इस संबंध में दिल्ली पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई गई है। यहां सवाल उठता है कि क्या छात्र आंदोलन राजनीतिक दलों के लिए अपनी जमीन मजबूत करने का अवसर बनता जा रहा है? देखा जाये तो छात्रों को राजनीतिक मोहरों की तरह इस्तेमाल किए जाने से सभी को बचना चाहिए। लेकिन कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का कहना है कि वह छात्र हित में ही वहां गये थे।
इस बीच, 24 अक्टूबर को विश्वविद्यालय प्रशासन ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए अगले आदेश तक सभी पाठ्यक्रमों की कक्षाएं ऑनलाइन करने का फैसला किया है। इससे पहले गुलिस्तान-ए-गालिब गार्डन में प्रदर्शनकारियों के टेंट हटाने की कोशिश के दौरान सुरक्षाकर्मियों और छात्रों के बीच टकराव हुआ। छात्रों ने भूख हड़ताल कर रहे साथियों पर कार्रवाई और उन्हें जबरन हटाने का आरोप लगाया, जबकि प्रशासन ने बिना उकसावे के कार्रवाई किए जाने के आरोपों को खारिज किया है। प्रशासन का कहना है कि यह कदम परिसर में विद्यार्थियों की सुरक्षा के लिए उठाया गया। लेकिन सवाल यह भी है कि आंदोलन के कारण पढ़ाई बाधित होने की नौबत क्यों आई और बातचीत के रास्ते तनाव कम करने में अब तक सफलता क्यों नहीं मिली?
बहरहाल, अब जामिया में सबसे पहले यह साफ होना चाहिए कि ‘फ्री कश्मीर’ जैसे विवादित नारे किसने लिखे, क्यों लिखे और छात्रसंघ चुनाव की मांग के बीच इन्हें लाने का मकसद क्या था? छात्रसंघ चुनाव की आड़ में देश की अखंडता को चुनौती देने वाले नारों को आखिर बर्दाश्त क्यों किया जाए? ऐसे नारे लिखने वालों की पहचान होनी चाहिए और जांच के बाद उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। चुनाव की मांग को दबाने के लिए प्रशासन मनमानी नहीं कर सकता, लेकिन छात्रसंघ के नाम पर किसी को भी देशविरोधी नारेबाजी की छूट नहीं मिल सकती। अब सवालों से बचने का नहीं, बल्कि जिम्मेदार लोगों की पहचान कर उन्हें जवाबदेह ठहराने का वक्त है।