Omar Abdullah सरकार को बिना बताए दो अफसरों ने सीधे Speaker को लिख दी चिट्ठी, J&K Assembly में मचा घमासान

By नीरज कुमार दुबे | Oct 01, 2026

जम्मू-कश्मीर विधानसभा में राज्य का दर्जा बहाल करने के प्रस्ताव को लेकर शुरू हुआ विवाद अब केवल राजनीतिक मतभेद नहीं रह गया है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के प्रस्ताव पर चर्चा से पहले मुख्य सचिव अटल डुल्लू और विधि सचिव अचल सेठी द्वारा विधानसभा अध्यक्ष को भेजी गई चिट्ठियों ने प्रशासन और निर्वाचित विधायिका के अधिकार-क्षेत्र को लेकर तीखी बहस छेड़ दी है। हम आपको बता दें कि दोनों अधिकारियों ने प्रस्ताव को न्यायालय में विचाराधीन विषय बताते हुए सदन में आगे बढ़ाने पर आपत्ति जताई थी।

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कांग्रेस विधायक निजामुद्दीन भट ने शून्यकाल में इसे गंभीर संवैधानिक और संस्थागत प्रश्न बताया। उनका कहना था कि जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश बनने के बाद सरकार की शक्तियों में बदलाव आया हो सकता है, लेकिन विधानसभा की भूमिका समाप्त नहीं हुई। उन्होंने सवाल उठाया कि निर्वाचित सरकार, मंत्रिपरिषद और विधानसभा के रहते कोई अधिकारी स्वतंत्र रूप से सदन के कामकाज को प्रभावित करने की पहल कैसे कर सकता है? उन्होंने पत्रों को सदन के रिकॉर्ड में शामिल कर विस्तृत चर्चा की मांग की।

वहीं नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायक तनवीर सादिक ने इसे ही जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग के पीछे मौजूद बड़े संस्थागत प्रश्न के रूप में पेश किया। पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष सज्जाद लोन ने भी सवाल उठाया कि विधानसभा जनता की सामूहिक इच्छा का प्रतिनिधित्व करती है, इसलिए उसके अधिकारों और विशेषाधिकारों की सीमा पर बहस जरूरी है। इसी क्रम में पीडीपी विधायक वहीद पारा ने दोनों अधिकारियों के खिलाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव भी पेश किया।

हालांकि इस मामले में भारतीय जनता पार्टी का रुख बिल्कुल अलग है। विधानसभा में विपक्ष के नेता सुनील शर्मा ने अधिकारियों की कार्रवाई में कुछ भी असामान्य नहीं माना और उलटे अध्यक्ष तथा मुख्यमंत्री पर सवाल उठाए। उनका तर्क है कि जिस प्रस्ताव में पूर्व की स्वायत्तता से जुड़े संदर्भ शामिल किए गए थे, उसकी संवैधानिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। भाजपा ने प्रस्ताव का विरोध किया और सदन से बहिर्गमन भी किया।

ऐसे में मुख्य सचिव और विधि सचिव की चिट्ठियां जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक असाधारण संवैधानिक बहस का दस्तावेज बन गई हैं। अधिकारियों ने अपने प्रशासनिक और कानूनी दृष्टिकोण से सदन की कार्यवाही पर सवाल उठाने की पहल की और इसी कारण उनके पत्रों ने यह मूल प्रश्न खड़ा कर दिया कि निर्वाचित विधानसभा और प्रशासनिक तंत्र के बीच अधिकारों की अंतिम रेखा आखिर कहां है। उधर, विधानसभा अध्यक्ष ने भी इस तरह के हस्तक्षेप को अभूतपूर्व बताया है।

इस बीच, जम्मू कश्मीर विधानसभा की कार्यवाही 10 दिवसीय सत्र के बाद अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई। विधानसभा अध्यक्ष अब्दुल रहीम राठेर ने कहा कि विधानसभा की सात बैठकों में 25 घंटे से अधिक समय तक कामकाज हुआ। उन्होंने कहा, ‘‘पीठासीन अधिकारी के रूप में मेरा काम है कि मैं आपको अवसर दूं, ताकि आप लोगों के मुद्दे उठा सकें। मैंने पहले दिन ही कहा था कि मेरा प्रयास रहेगा कि किसी भी सदस्य को यह महसूस न हो कि उसके साथ भेदभाव किया गया है। जिस दिन मेरा निर्वाचन हुआ था, मैंने कहा था कि अब मेरा किसी भी दल से संबंध नहीं है और मैं बिना किसी पक्षपात के अपने कर्तव्य का निर्वहन करूंगा। मैंने अपनी क्षमताओं के अनुसार निष्पक्ष रहने का पूरा प्रयास किया है।’’

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