By नीरज कुमार दुबे | May 14, 2026
तमिलनाडु की राजनीति में इस बार का विधानसभा चुनाव एक बड़े राजनीतिक भूचाल के रूप में सामने आया है। चुनाव परिणामों के बाद अन्नाद्रमुक के भीतर तेज होती बगावत ने पार्टी को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां उसका अस्तित्व ही संकट में दिखाई दे रहा है। कभी तमिलनाडु की सबसे प्रभावशाली ताकतों में गिनी जाने वाली अन्नाद्रमुक अब अंदरूनी कलह, नेतृत्व संकट और टूट की आशंका से जूझ रही है।
हालांकि पलानीस्वामी पांच विधायकों को वापस अपने पक्ष में लाने में सफल रहे, फिर भी स्थिति उनके लिए अनुकूल नहीं रही। कुल पच्चीस विधायकों ने विजय के पक्ष में मतदान किया जबकि केवल 22 विधायक टीवीके सरकार के खिलाफ रहे। इससे यह साफ हो गया कि विधायक दल पर पलानीस्वामी की पकड़ कमजोर हो चुकी है और पार्टी के भीतर उनका बहुमत समाप्त होता दिखाई दे रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बगावत केवल विधायक दल तक सीमित नहीं रहेगी। पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच लगातार हार को लेकर गहरा असंतोष है। वर्ष 2019 के बाद यह अन्नाद्रमुक की चौथी बड़ी चुनावी हार मानी जा रही है। पार्टी के भीतर यह भावना मजबूत हो रही है कि पलानीस्वामी के नेतृत्व में अन्नाद्रमुक लगातार कमजोर हुई है और अब नए नेतृत्व की आवश्यकता है।
पलानीस्वामी पर सबसे बड़ा आरोप यह लग रहा है कि उन्होंने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को पार्टी की विचारधारा से ऊपर रखा। चुनाव परिणामों के बाद उन्होंने द्रमुक के बाहरी समर्थन से मुख्यमंत्री बनने की कोशिश की थी। बागी नेताओं का कहना है कि यह कदम अन्नाद्रमुक की मूल विचारधारा के खिलाफ था क्योंकि पार्टी संस्थापक एमजी रामचंद्रन और जे. जयललिता ने हमेशा द्रमुक को अपना प्रमुख राजनीतिक विरोधी माना था। कार्यकर्ताओं के बीच भी यह संदेश गया कि तीसरे स्थान पर रही पार्टी सत्ता पाने के लिए दूसरे स्थान की पार्टी से हाथ मिलाने को तैयार हो गई।
पलानीस्वामी की आलोचना इसलिए भी हो रही है क्योंकि उन्होंने पहले ओ पन्नीरसेल्वम पर द्रमुक का साथ देने का आरोप लगाया था। पन्नीरसेल्वम को पार्टी में वापसी की अनुमति नहीं मिली थी, जिसके बाद उन्होंने द्रमुक का रुख किया। उस समय पलानीस्वामी ने उन्हें द्रमुक की बी टीम तक कहा था। लेकिन अब वही पलानीस्वामी सत्ता के लिए द्रमुक के समर्थन को स्वीकार करने को तैयार दिखे, जिससे उन पर दोहरे मापदंड अपनाने के आरोप लगे हैं।
इस बीच बागी गुट ने एक नई राजनीतिक रणनीति अपनाई है। उनका कहना है कि जनता का जनादेश टीवीके के लिए नहीं बल्कि मुख्यमंत्री विजय के लिए है। इस बयान के पीछे यह संकेत छिपा है कि विजय सरकार में अन्नाद्रमुक के बागी विधायकों को भी भागीदारी मिलनी चाहिए। हालांकि विजय फिलहाल इस तरह के समझौते से दूरी बनाए हुए दिखाई दे रहे हैं। माना जा रहा है कि यदि वह बागी नेताओं को सरकार में शामिल करते हैं तो उनकी भ्रष्टाचार विरोधी छवि कमजोर पड़ सकती है।
दरअसल बागी गुट के कई नेता पहले से भ्रष्टाचार के मामलों में जांच का सामना कर रहे हैं। एसपी वेलुमणि पर लगभग 98 करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार का मामला चल रहा है, जबकि पूर्व स्वास्थ्य मंत्री सी विजयभास्कर गुटखा घोटाले में जांच के दायरे में हैं। ऐसे में विजय के लिए इन नेताओं को साथ लेना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा माना जा रहा है।
एक और बड़ा सवाल यह है कि अन्नाद्रमुक अब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा है या नहीं? बागी नेता दावा कर रहे हैं कि पार्टी अब इस गठबंधन से बाहर आ चुकी है, लेकिन पलानीस्वामी खेमे की ओर से इस पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है। चुनाव प्रचार के दौरान कई बागी नेता भाजपा नेतृत्व के करीब दिखाई दिए थे। ऐसे में विजय, जिन्होंने भाजपा को वैचारिक विरोधी बताया है, उनके साथ सहज होंगे या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
इसके अलावा दल बदल विरोधी कानून का खतरा भी बागी विधायकों पर मंडरा रहा है। बागी गुट अभी आवश्यक संख्या तक नहीं पहुंच पाया है, इसलिए उनकी सदस्यता पर कानूनी संकट खड़ा हो सकता है। यदि उपचुनाव की स्थिति बनती है तो यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि टीवीके उनका समर्थन करती है या नहीं।
देखा जाये तो तमिलनाडु की राजनीति में लंबे समय तक सत्ता का केंद्र रही अन्नाद्रमुक अब तेजी से ढलान की ओर जाती दिखाई दे रही है। महिलाओं का पारंपरिक मतदाता आधार विजय की ओर खिसक चुका है और पलानीस्वामी खुद को एमके स्टालिन के विकल्प के रूप में स्थापित करने में असफल रहे हैं। विधानसभा में जहां विजय और स्टालिन अपेक्षाकृत युवा नेतृत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं, वहीं 72 वर्ष के पलानीस्वामी के नेतृत्व को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि पलानीस्वामी अपने पद से हटने को तैयार नहीं होते तो अन्नाद्रमुक में विभाजन लगभग तय है। एमजी रामचंद्रन की मृत्यु के बाद वर्ष 1987 से 1989 के बीच पार्टी में बड़ा विभाजन हुआ था और अब वैसी ही स्थिति दोबारा बनती दिखाई दे रही है। पार्टी के चुनाव चिन्ह दो पत्तियों को लेकर कानूनी लड़ाई भी दोबारा अदालत पहुंच सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक लाभ विजय को मिलता दिखाई दे रहा है। एक ओर अन्नाद्रमुक टूट के कगार पर है तो दूसरी ओर द्रमुक भी पलानीस्वामी के साथ सत्ता बनाने की कोशिश के कारण नैतिक रूप से घिरी हुई दिखाई दे रही है। विजय ने चुनाव प्रचार के दौरान मुकाबले को केवल टीवीके और द्रमुक के बीच बताया था तथा अन्नाद्रमुक को लगभग नजरअंदाज कर दिया था। अब चुनाव के बाद की परिस्थितियां यह संकेत दे रही हैं कि तमिलनाडु की राजनीति में अन्नाद्रमुक का भविष्य पहले से कहीं अधिक अनिश्चित हो गया है।