Jharkhand में दिन में Job करने के लिए बाहर जा सकेंगे कैदी, शाम को वापस लौटना होगा जेल

By नीरज कुमार दुबे | Sep 01, 2026

झारखंड की जेल व्यवस्था अब केवल सजा और बंदीकरण तक सीमित नहीं रहेगी। राज्य सरकार एक ऐसी नई व्यवस्था लागू करने जा रही है, जिसमें चुनिंदा कैदियों को दिन के समय जेल से बाहर जाकर काम करने और शाम को वापस लौटने की अनुमति होगी। ओपन और सेमी-ओपन बैरक प्रणाली के रूप में शुरू की जा रही यह पहल कैदियों के पुनर्वास, आर्थिक आत्मनिर्भरता और समाज में उनकी पुनर्वापसी की दिशा में एक महत्वपूर्ण सुधार मानी जा रही है।

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शुरुआती चरण में यह व्यवस्था राज्य की चार केंद्रीय जेलों में लागू की जाएगी। इनमें रांची की बिरसा मुंडा केंद्रीय जेल, हजारीबाग की जयप्रकाश नारायण केंद्रीय जेल, पूर्वी सिंहभूम की घाघीडीह केंद्रीय जेल और दुमका केंद्रीय जेल शामिल हैं। इन जेलों में पहले ही ऐसे बैरक और सेल चिह्नित किए जा चुके हैं, जिन्हें ओपन या सेमी-ओपन सुविधाओं में बदला जा सकता है।

राज्य सरकार का मानना है कि इन चार जेलों के शहरी क्षेत्रों में स्थित होने से योजना को व्यावहारिक सफलता मिल सकती है। शहरों में रोजगार और आजीविका के अवसर अपेक्षाकृत अधिक होते हैं। ऐसे में पात्र कैदियों को काम खोजने और मेहनत के जरिए आय अर्जित करने का बेहतर मौका मिल सकेगा।

हालांकि, यह सुविधा हर कैदी के लिए नहीं होगी। राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि योजना में शामिल होने के लिए कैदियों को तय पात्रता मानकों पर खरा उतरना होगा। जेल प्रशासन इसके लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया यानी एसओपी तैयार करेगा। कैदी का अच्छा व्यवहार, जेल के नियमों का पालन और अनुशासन योजना में चयन के महत्वपूर्ण आधार होंगे।

हम आपको बता दें कि इस व्यवस्था का मूल विचार उन कैदियों को अवसर देना है, जिन्होंने अपने व्यवहार से जिम्मेदारी और सुधार की क्षमता दिखाई है। ऐसे कैदियों को एक नियंत्रित माहौल में बाहर काम करने का मौका मिलेगा, ताकि वे धीरे-धीरे सामान्य सामाजिक जीवन से फिर जुड़ सकें। साथ ही, वे अपनी सजा भी पूरी करते रहेंगे।

झारखंड के जेल महानिरीक्षक सुदर्शन मंडल के अनुसार, पात्र कैदी सुबह करीब 6 या 7 बजे जेल से बाहर जा सकेंगे और लगभग 12 घंटे बाद वापस लौटेंगे। उन्होंने कहा कि चूंकि जिन जेलों को इस योजना के लिए चुना गया है, वे शहरी केंद्रों में स्थित हैं, इसलिए कैदियों के पास आजीविका कमाने के उचित अवसर उपलब्ध हो सकते हैं। इस पहल को हाल ही में राज्य मंत्रिमंडल ने एक सरकारी प्रस्ताव के जरिए मंजूरी दी है। योजना को झारखंड प्रिजन एंड करेक्शनल सर्विस एक्ट, 2025 के प्रावधानों से भी आधार मिलता है, जिसमें ओपन करेक्शनल संस्थानों की व्यवस्था की गई है।

हम आपको यह भी बता दें कि यह फैसला केवल राज्य सरकार की अपनी पहल का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे सर्वोच्च न्यायालय का भी महत्वपूर्ण निर्देश है। ‘सुहास चकमा बनाम भारत संघ’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उन राज्यों से विचार करने को कहा था, जहां कार्यशील ओपन करेक्शनल संस्थान मौजूद नहीं हैं। अदालत ने राज्यों से यह जांचने को कहा था कि क्या ऐसे संस्थान स्थापित किए जा सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि जहां अलग से ओपन जेल या करेक्शनल संस्थान बनाना व्यावहारिक नहीं है, वहां मौजूदा जेल परिसरों के भीतर ही ओपन या सेमी-ओपन बैरक विकसित किए जा सकते हैं। झारखंड ने इसी व्यावहारिक रास्ते को अपनाया है। राज्य नई जेलों के निर्माण का इंतजार करने के बजाय मौजूदा जेल ढांचे में ही बदलाव कर इस व्यवस्था को लागू करने जा रहा है।

दरअसल, इस सुधार का उद्देश्य कैदियों को कुछ घंटों की आजादी देना भर नहीं है। सरकार इसे पुनर्वास और सामाजिक पुनर्समावेशन की व्यापक नीति के रूप में देख रही है। बाहर काम करने से कैदी आर्थिक रूप से सक्रिय हो सकेंगे, आय अर्जित कर सकेंगे और अपने परिवारों की आर्थिक मदद भी कर पाएंगे। इससे परिवारों पर पड़ने वाला आर्थिक दबाव कम हो सकता है।

इसके साथ ही कैदियों को काम का अनुभव मिलेगा, जो जेल से पूरी तरह रिहा होने के बाद उनके लिए उपयोगी साबित हो सकता है। लंबे समय तक जेल की चारदीवारी में रहने के बाद अचानक समाज में लौटने की चुनौती कम करने में भी यह व्यवस्था मददगार हो सकती है। दिन में काम, जिम्मेदारी और सामाजिक संपर्क तथा शाम को जेल वापसी, यह एक ऐसा मॉडल है, जो कैदियों को धीरे-धीरे सामान्य जीवन की ओर बढ़ने का अवसर देगा।

झारखंड सरकार शुरुआती चार केंद्रीय जेलों के अनुभवों का आकलन करने के बाद इस तरह की अन्य सुधारात्मक पहलों का विस्तार करने की योजना भी बना रही है। यदि यह प्रयोग सफल रहा तो राज्य की जेल व्यवस्था में सुधार की एक नई दिशा खुल सकती है।

इस पूरी कवायद का संदेश यह है कि केवल सजा की जगह नहीं, सुधार और नई शुरुआत का माध्यम भी बन सकती है। झारखंड की यह पहल उसी सोच को जमीन पर उतारने की कोशिश है, जिसमें अच्छे आचरण वाले कैदियों को जिम्मेदारी, रोजगार और सम्मानजनक पुनर्वास का अवसर देकर समाज की मुख्यधारा में लौटने के लिए तैयार किया जाएगा।

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