जंतर-मंतर पर Students के लिए आवाज, झारखंड में छात्रों पर हुए लाठीचार्ज पर चुप्पी, वाह क्या दोगलापन है!

By नीरज कुमार दुबे | Aug 10, 2026

परीक्षा में अनियमितताओं के खिलाफ रांची में हजारों प्रतियोगी अभ्यर्थियों का आंदोलन आज 17वें दिन भी जारी रहा। झारखंड विधानसभा की ओर मार्च कर रहे प्रदर्शनकारियों ने एक के बाद एक कई पुलिस बैरिकेड तोड़े, जिसके बाद जगन्नाथपुर मंदिर के पास पुलिस ने पानी की बौछारें कीं और लाठीचार्ज किया। इस दौरान कुछ प्रदर्शनकारी घायल हो गये। सवाल यह है कि छात्रों के इस आंदोलन और पुलिस कार्रवाई पर वह विपक्ष आखिर चुप क्यों है, जो दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन के दौरान सरकार और पुलिस की कार्रवाई पर लगातार सवाल उठाता रहा है?

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हम आपको बता दें कि झारखंड में प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थी जेएसएससी-सीजीएल समेत विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच, कुछ परीक्षाओं को रद्द करने और जेपीएससी-जेएसएससी में व्यापक सुधार की मांग कर रहे हैं। प्रदर्शनकारी सीबीआई जांच या राज्य से बाहर के उच्च न्यायालयों के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की समिति से जांच कराने की मांग पर अड़े हैं।

सरकार का दावा है कि उसने प्रदर्शनकारियों की 98 प्रतिशत मांगें स्वीकार कर ली हैं। वहीं आंदोलनकारी कहते हैं कि जिन 13 परीक्षाओं को रद्द करने की मांग की गई थी, उनमें से केवल तीन पर सरकार सहमत हुई है। यही मूल विवाद है और बातचीत के कई दौर के बावजूद गतिरोध समाप्त नहीं हो पाया है।

हम आपको बता दें कि छात्रों के आंदोलन ने आज उस समय और ध्यान खींचा जब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का 51वां जन्मदिन भी था। करीब साढ़े 10 बजे शुरू हुए मार्च में प्रदर्शनकारी हाथों में तिरंगा और तख्तियां लेकर विधानसभा की ओर बढ़े। एक पोस्टर पर मुख्यमंत्री को लेकर लिखा था, “छात्रों की समस्याएं मत देखो, छात्रों की आवाज मत सुनो और छात्रों के सवालों का जवाब मत दो।” साथ ही आंदोलन का एक मानवीय पहलू भी है। नौ दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे जेएलकेएम नेता देवेंद्रनाथ महतो 10.5 किलोग्राम वजन घटने के बावजूद एंबुलेंस से मार्च में शामिल हुए। उन्होंने प्रदर्शनकारियों से शांति बनाए रखने की अपील की। आंदोलन की अगुवाई कर रहे जेपीएससी-जेएसएससी रिफॉर्म्स मंच ने भी कथित असामाजिक तत्वों को आंदोलन में घुसने से रोकने के लिए करीब 500 स्वयंसेवक तैनात किए। वहीं पुलिस का कहना है कि वह संयम बरत रही है। पूरे चार किलोमीटर मार्ग पर 1,500 से अधिक सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए और निषेधाज्ञा भी लागू रही।

आज रांची में जो कुछ हुआ उसको देखते हुए कहा जा सकता है कि बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि पुलिस ने लाठीचार्ज क्यों किया। सवाल यह भी है कि छात्रों की समस्याओं को लेकर राजनीतिक दलों की संवेदनशीलता सत्ता के साथ बदल क्यों जाती है? दिल्ली में छात्रों पर कार्रवाई हो तो लोकतंत्र खतरे में दिखाई देता है, लेकिन झारखंड में छात्रों पर पानी की बौछार और लाठीचार्ज हो तो वही आवाजें कमजोर क्यों पड़ जाती हैं? क्या छात्रों के अधिकार राजनीतिक सुविधा के अनुसार तय होंगे? क्या विपक्ष की जिम्मेदारी केवल तब तक है, जब तक सत्ता में उसका प्रतिद्वंद्वी बैठा हो? भाजपा ने इसी आधार पर कांग्रेस और विपक्ष पर दोहरे मापदंड का आरोप लगाया है।

बहरहाल, यह साफ नजर आ रहा है कि झारखंड के युवाओं को राजनीतिक बयानबाजी नहीं, स्पष्ट जवाब चाहिए। परीक्षा व्यवस्था में कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच, दोषियों पर कार्रवाई और भर्ती प्रक्रिया में भरोसा बहाल करना सरकार की जिम्मेदारी है। साथ ही विपक्ष की भी परीक्षा यही है कि वह सत्ता की राजनीति से ऊपर उठकर छात्रों के सवालों पर समान आवाज उठाता है या नहीं।

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