By दिव्यांशी भदौरिया | Oct 02, 2026
हिंदू धर्म में जितिया व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। माताओं के असीम प्रेम और समपर्ण का प्रतीक 'जितिया' (जीवित्पुत्रिका) व्रत हर साल पूरी श्रद्धा के साथ रखा जाता है। इस व्रत को मुख्य तौर पर बिहार, झारखंड सहित उत्तर भारत के कई हिस्सों में प्रचलित है। जितिया व्रत माताएं अपनी संतान की दीर्घायु, अच्छा स्वास्थ्य और उज्जवल भविष्य की कामना के लिए रखती हैं।
2 से 4 अक्टूबर तक चलेगा तीन दिनों का पर्व
2 अक्टूबर (नहाय-खाय): छठ पूजा के पहले दिन व्रती महिलाएं सुबह स्नान करके शुद्ध और सात्विक भोजन तैयार करती हैं। इस दिन नोनी का साग, मडुआ (रागी) की रोटी, तोरी (झिंगनी) और कद्दू की सब्जी बनाने और खाने की परंपरा है।
3 अक्टूबर (मुख्य निर्जला व्रत): शनिवार को जितिया का मुख्य व्रत रखा जाएगा। इस दिन व्रती महिलाएं सूर्योदय से पहले ब्रह्म मुहूर्त में ‘ओठगन’ की रस्म निभाएंगी। इस दौरान मीठा भोजन या दही-चूड़ा खाने की परंपरा है। इसके बाद सूर्योदय होते ही महिलाएं निर्जला व्रत शुरू करेंगी।
4 अक्टूबर (पारण): रविवार सुबह अष्टमी तिथि खत्म होने और सूर्य देव को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोला जाएगा। इसके बाद व्रती महिलाएं भोजन करके व्रत का पारण करेंगी।
शुभ मुहूर्त और पूजा का समय
- पंचांग के अनुसार, अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर की सुबह 7:59 बजे शुरू होगी और 4 अक्टूबर की सुबह 5:51 बजे समाप्त होगी।
- 3 अक्टूबर को सुबह 11:46 बजे से दोपहर 12:34 बजे तक व्रत का संकल्प लेना शुभ माना गया है। यह समय अभिजीत मुहूर्त है।
- जितिया व्रत की मुख्य पूजा शाम के समय की जाती है। 3 अक्टूबर को शाम 6:05 बजे से रात 8:29 बजे तक भगवान जीमूतवाहन की पूजा, चील-सियारिन की कथा और आरती करना शुभ रहेगा।
- 4 अक्टूबर को सुबह सूर्योदय के बाद 6:15 बजे से 7:27 बजे के बीच व्रत का पारण करना शुभ माना गया है।
पूजा सामग्री और विधि
भगवान जीमूतवाहन की प्रतिमा
फूल
फूलों की माला
पीले रंग का वस्त्र
सिंदूर
मौली
गंगाजल
पंचामृत
मिट्टी का दीपक
बाती
अगरबत्ती
ठेकुआ
पारंपरिक पकवान
बांस की डलिया
मरुआ का आटा
धूप
कपूर
तांबे का लोटा
जितिया व्रत की कथा की पुस्तक
बजरी
गोबर
कलश या लोटा
जल
अक्षत यानी साबुत चावल
चौकी
लाल या पीला कपड़ा
कुशा
रोली
चंदन
हल्दी
दूर्वा
ताजे फूल
मिठाई
भिगोया हुआ चना
पूजा में रखें ये प्रसाद सामग्र
पान
सुपारी
लौंग
इलायची
लाल या पीला जिउतिया धागा
मौसमी फल
व्रत के नियम
माताएं कथा सुनने के बाद संतान की रक्षा के लिए लाल-पीला जिउतिया धागा गले में पहनती हैं। पारण के दिन भी सात्विक आहार और नोनी का साग खाकर ही व्रत को पूरा किया जाता है। लोकल पंचांग के अनुसार, समय में थोड़ा- बहुत अंतर हो सकता है। इसलिए अपने क्षेत्र के पंचांग के समय का मिलान जरुर कर लें।
व्रत के एक दिन पहले नहाय-खाय की परंपरा निभाई जाती है। फिर घर और पूजा स्थल की साफ-सफाई करके सात्विक भोजन ग्रहण किया जाता है। इस दौरान मरुआ की रोटी और नोनी का साग खाया जाता है। हिंदूग्रंथ पढ़ें
जितिया व्रत में भक्ति भाव से पूजा-अर्चना और माता जितिया का स्मरण करें। व्रत पूरा होने के बाद विधि-विधान से व्रत का पारण किया जाता है। फिर जरुरतमंदों के अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान देना भी शुभ माना जाता है।
न करें ये गलतियां
- अपने शहर के पंचांग के देखें बिना दूसरे शहर के पारण समय का पालन बिल्कुल न करें।
- हर क्षेत्रीय पूजन सामग्री को लेकर तनाव न लें।
- अगर आपको गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, तो कठोर निर्जला व्रत न रखें।
- डॉक्टर द्वारा बताई गई जरुरी दवाओं का सेवन बीच व्रत के दौरान भी करें।
- अनुशासन और श्रद्धा भावना के बजाय डर या अंधविश्वास के प्रभाव में न आएं।
जीमूतवाहन की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय की बात है, गंधर्वों के राजकुमार जीमूतवाहन अपने परोपकार और पराक्रम के लिए जाने जाते थे। एक बार जीमूतवाहन के पिता उन्हें राजसिंहासन पर बिठाकर वन में तपस्या के लिए चले गए। लेकिन, उनका मन राज-पाट में नहीं लगा, जिसके चलते वे अपने भाइयों को राज्य की जिम्मेदारी सौंप कर अपने पिता के पास उनकी सेवा के लिए चले जा पहुंचे, जहां उनका विवाह मलयवती नाम की कन्या से हुआ।
एक दिन भ्रमण करते हुए उनकी भेंट एक वृद्ध स्त्री से हुई, जो नागवंश से थी। वह बहुत ज्यादा दुखी और डरी हुई थी। उसकी ऐसी हालत देखकर जीमूतवाहन ने उनका हाल पूछा, जिसपर उस वृद्धा ने कहा कि नागों ने पक्षीराज गरुड़ को यह वचन दिया है कि वे प्रत्येक दिन एक नाग को उनके आहार के रूप में उन्हें देंगे। उस स्त्री ने रोते हुए बताया कि उसका एक बेटा है, जिसका नाम शंखचूड़ है। आज उसे पक्षीराज गरुड़ के पास आहार के रूप में जाना है।
जैसे जीमूतवाहन ने वृद्धा की हालत देखी उन्होंने उसे आश्वासन दिया कि वो उसके पुत्र के प्राणों की रक्षा जरूर करेंगे। अपने कहे हुए वचनों के अनुसार, जीमूतवाहन पक्षीराज गरुड़ के समक्ष गए और गरुड़ उन्हें अपने पंजों में दबोच कर साथ ले गए। उस दौरान उन्होंने जीमूतवाहन के कराहने की आवाज सुनी और वे एक पहाड़ पर रुक गए, जहां जीमूतवाहन ने उन्हें पूरी घटना बताई।
तब पक्षीराज उनके साहस और परोपकार को देखकर दंग रह गए और प्रसन्न होकर उन्होंने जीमूतवाहन को प्राणदान दे दिया। साथ ही, उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि वे अब किसी नाग को अपना आहार नहीं बनाएंगे। तभी से संतान की सुरक्षा और उन्नति के लिए जीमूतवाहन की पूजा का विधान है, जिसे लोग आज जितिया व्रत के नाम से भी जानते हैं। कहा जाता है कि इस कथा के बिना जितिया व्रत (Jivitputrika Parv Ke Niyam) अधूरा होता है, इसलिए इसका पाठ जरूर करना चाहिए।
चील और सियारिन की कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक पेड़ पर रहने वाली चील और सियारिन ने साथ मिलकर जितिया का निर्जला व्रत रखने का संकल्प लिया। व्रत के दिन सियारिन भूख बर्दाश्त न कर सकी और उसने श्मशान जाकर अधजला शव खा लिया, जिससे उसका व्रत खंडित हो गया। दूसरी ओर, चील ने पूरी निष्ठा के साथ नियमपूर्वक अपना उपवास पूरा किया।
अगले जन्म में दोनों सगी बहनें बनकर राजघराने में ब्याही गईं। चील को व्रत के पुण्य से सात स्वस्थ पुत्र मिले, जबकि सियारिन की संतानें जन्म लेते ही मर जाती थीं। ईर्ष्या और जलन में आकर सियारिन ने चील के सातों बेटों के सिर कटवा कर चील के घर भिजवा दिए।
भगवान जीमूतवाहन ने अपनी कृपा से मिट्टी के सिर बनाकर और उन पर अमृत छिड़ककर सातों बालकों को फिर से जीवित कर दिया। जब सियारिन ने उन्हें को जीवित देखा, तो चील ने उसे पूर्वजन्म के व्रत और उसकी भूल की याद दिलाई। अपनी गलती के पश्चाताप में सियारिन ने उसी वृक्ष के पास जाकर प्राण त्याग दिए। तभी से संतान की लंबी उम्र और रक्षा के लिए यह कथा सुनने की परंपरा चली आ रही है।
।जितिया व्रत आरती।। (Jitiya Vrat Aarti In Hindi)
ओम जय कश्यप नन्दन, प्रभु जय अदिति नन्दन।
त्रिभुवन तिमिर निकंदन, भक्त हृदय चन्दन॥ ओम जय कश्यप...
सप्त अश्वरथ राजित, एक चक्रधारी।
दु:खहारी, सुखकारी, मानस मलहारी॥ ओम जय कश्यप....
सुर मुनि भूसुर वन्दित, विमल विभवशाली।
अघ-दल-दलन दिवाकर, दिव्य किरण माली॥ ओम जय कश्यप...
सकल सुकर्म प्रसविता, सविता शुभकारी।
विश्व विलोचन मोचन, भव-बंधन भारी॥ ओम जय कश्यप...
कमल समूह विकासक, नाशक त्रय तापा।
सेवत सहज हरत अति, मनसिज संतापा॥ ओम जय कश्यप...
नेत्र व्याधि हर सुरवर, भू-पीड़ा हारी।
वृष्टि विमोचन संतत, परहित व्रतधारी॥ ओम जय कश्यप...
सूर्यदेव करुणाकर, अब करुणा कीजै।
हर अज्ञान मोह सब, तत्वज्ञान दीजै॥ ओम जय कश्यप...
ओम जय कश्यप नन्दन, प्रभु जय अदिति नन्दन।
।।जीवित्पुत्रिका चालीसा।।
।।दोहा।।
जय जय जीमूतवाहन, जय जय जीवित्पुत्रिका।
मात-पिता की रक्षा करो, हर लो दुःख दरिद्रता।।
।।चौपाई।।
अश्विन मास कृष्ण पक्ष अष्टमी, नाम तुम्हारा जीवित्पुत्रिका।
सुख-शांति तुम दो माता, तुम बिन नहीं कोई सहारा।।
पुत्र की रक्षा करो माता, तुम तो हो जग पालनहारा।
पूत-सुपूत बनाओ माता, सुख-शांति तुम देना।।
कथा सुनी जब जीमूतवाहन की, दुख की घड़ी में तुम याद आई।
तुमने पुत्र को दिया जीवन, तुम्हारी कृपा सदा बनी रहे।।
जय जय माता तुम सबकी, हर लो हर संकट तुम हमारी।
बाल-बाल को रखो सुरक्षित, तुम्हारी महिमा सबसे न्यारी।।
जो जन चालीसा ये पढ़े, हर इच्छा उसकी पूरी हो।
मात-पिता को सुख-शांति मिले, और घर में धन-संपदा हो।।
पुत्र की रक्षा तुम ही करती, तुम तो जग की पालनहारी।
तुम्हारी दया से सब कुछ मिले, तुम सबकी हो पालनहारी।।
।।दोहा।।
जीवित्पुत्रिका माता, कृपा करो सब पर।
संतान को सुखी रखो, और दूर करो हर संकट।।