Jyoti Basu Birth Anniversary: बंगाल की राजनीति का अहम चेहरा थे ज्योति बसु, 4 बार प्रधानमंत्री बनने का गंवाया था मौका

By अनन्या मिश्रा | Jul 08, 2023

भारत की राष्ट्रीय राजनीति में कई ऐसे क्षेत्रीय नेता शामिल रहे, जिन्होंने देश की राजनीति को एक दिशा देने का काम किया है। ऐसे ही एक नेता में पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु का नाम शामिल है। बता दें कि उन्हें देश के प्रधानमंत्री बनने के कई मौके मिले। लेकिन उन्होंने वह सारे मौके गंवा दिए। आज ही के दिन यानी की 8 जुलाई को पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु का जन्म हुआ था। पश्चिम बंगाल के साथ ही उन्होंने देश की राष्ट्रीय राजनीति में काफी योगदान दिया है। आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर ज्योति बसु के जीवन से जुड़े कुछ रोचक तथ्यों के बारे में...

कोलकाता के बंगाली कायस्थ परिवार में 8 जुलाई 1914 को ज्योतिरेंद्र बासु का जन्म हुआ था। उनके पिता निशिकांत बसु एक डॉक्टर थे और उनकी मां का नाम हेमलता था। उन्होंने अपनी शुरूआती शिक्षा कोलकाता से पूरी की। इसके बाद उन्होंने कोलकाता से अपनी पढ़ाई पूरी की और वह कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गए। इस दौरान उनका झुकाव कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ हो गया था। वहीं साल 1940 में ज्योति बसु बैरिस्टर बन कर भारत वापस लौटे।

बंगाल के प्रमुख नेता

ट्रेड यूनियन की राजनीति में सक्रिय होने के बाद साल 1946 में राज्य की राजनीति में एंट्री की। वहीं डॉ बिधान चंद्र राय की लंबे मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान ज्योति बसु विपक्ष के नेता रहे। फिर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन होने के बाद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में शामिल थे। साल 1977 तक वह बंगाल के प्रमुख नेता के तौर पर अपनी पहचान बना चुके थे। साल 1977 में मार्क्सवादी पार्टी के जीतने के बाद उन्होंने बतौर मुख्यमंत्री पश्चिम बंगाल की सत्ता संभाली।

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बंगाल के मुख्यमंत्री

वह देश के पहले ऐसे मुख्यमंत्री थे, जो लगातार 25 सालों तक बतौर सीएम पश्चिम बंगाल की सत्ता को संभालते रहे। क्योंकि उनका कद राष्ट्रीय स्तर तक जाता दिखाई दे रहा था। ज्योति बसु का राष्ट्रीय राजनीति में एक अलग कद बनने लगा था। उनके अंदर किसी बड़े राष्ट्रीय नेता की तरह करिश्माई व्यक्तित्व नहीं था और न ही उनका औरा जेपी जैसा था, जो लोगों को अपनी तरफ आकर्षित कर सके। 

राज्य को नक्सलवाद से बचाया

प्राप्त जानकारी के अनुसार, साल 1980 में नक्सलवाद पश्चिम बंगाल में अपने पैर पसारने में कामयाब हो जाता, तो शायद वर्तमान समय में बंगाल दूसरा छत्तीसगढ़ होता। जहां पर नक्सलवादियों की गहरी जड़ें होती। लेकिन ज्योतिरेंद्र बसु और उनकी वामपंथी सरकार पर यह आरोप लगाया जाता था कि वह प्रदेश का विकास नहीं कर रहे। लेकिन 60-70 के दशक में बंगाल का जो हाल था। उसकी तुलना में वही विकास था। जिसके कारण लोग लंबे समय तक ज्योति बसु को राज्य का मुख्यमंत्री चुनते रहे।

बार बार प्रधानमंत्री बनने का मौका

बहुत कम लोग यह बात जानते हैं कि ज्योति बसु को एक बार नहीं बल्कि चार बार देश का प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला। पहली बार सला 1990 में वीपी सिंह की सरकार गिरने पर कांग्रेस प्रमुख राजीव गांधी की तरफ से बसु को देश का पीएम बनने का प्रस्ताव दिया गया। लेकिन बसु की पार्टी ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। फिर इसी के सात महीने बाद चंद्रशेखर की सरकार गिरने बाद राजीव गांधी ने एक बार फिर बसु के सामने यह प्रस्ताव रखा। लेकिन इस बार भी उन्होंने इस मौके को ठुकरा दिया।

साल 1996 में कांग्रेस और भाजपा दोनों की स्वतंत्र रूप से सरकार बनाने की स्थिति में नहीं थी। तब जनता दल के साथ कई छोटे-छोटे दलों और वामपंथी दलों ने एक संयुक्त मोर्चा बनाया। इस दौरान तीसरी बार ज्योति बसु को देश का प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया गया। इस प्रस्ताव पर काफी गंभीरता से विचार करते हुए पार्टी ने इसे खारिज कर दिया। जिसके बाद साल 1999 में ज्योति बसु को चौथी बाक पीएम बनाने का प्रस्ताव दिया गया। इस बार पार्टी और ज्योति बसु ने इस प्रस्ताव को मान लिया। लेकिन ज्योति बसु के प्रधानमंत्री बनन के लिए कांग्रेस के समर्थन की आवश्यकता थी। हालांकि इस बार कांग्रेस ने उनका साथ देने से मना कर दिया। इस तरह से ज्योतिरेंद्र बसु को चार बार देश का पीएम बनने का प्रस्ताव दिया गया था।

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