By नीरज कुमार दुबे | Oct 14, 2026
जम्मू-कश्मीर में जुमे की नमाज के दौरान दिए जाने वाले खुतबे यानी धार्मिक उपदेश में सामाजिक मुद्दों को शामिल करने के प्रस्ताव पर सियासी घमासान तेज हो गया है। दरअसल, जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड की अध्यक्ष डॉ. सैयद दरख्शां अंद्राबी के बयान के बाद घाटी की राजनीति गर्मा गई है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने इस पहल पर सवाल उठाते हुए इसे मुसलमानों के धार्मिक मामलों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कथित हस्तक्षेप से जोड़ा है। वहीं, मीरवाइज उमर फारूक के नेतृत्व वाले मुत्तहिदा मजलिस-ए-उलेमा ने भी धार्मिक स्वतंत्रता में दखल का आरोप लगाया है।
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लेकिन इस स्पष्टीकरण के बावजूद विवाद थमता नजर नहीं आ रहा। धार्मिक उपदेशों में सामाजिक मुद्दों को उठाने की पहल अब जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक अधिकार, धार्मिक स्वायत्तता और भाजपा की भूमिका पर एक नई बहस का केंद्र बन गई है।
श्रीनगर में राजनीतिक और धार्मिक नेताओं की आलोचनाओं के बीच आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में दरख्शां अंद्राबी ने स्पष्ट किया कि वक्फ बोर्ड ने अपने नियंत्रण वाली मस्जिदों को एक समान खुतबा देने का कोई बाध्यकारी निर्देश नहीं दिया है। उन्होंने कहा कि धार्मिक उपदेशों के विषय तय करने का अधिकार स्वतंत्र इस्लामिक विद्वानों, इमामों और खतीबों के पास ही रहेगा। न तो वक्फ बोर्ड की अध्यक्ष इस संबंध में कोई फैसला थोप सकती हैं और न ही बोर्ड के अधिकारी ऐसा कर सकते हैं। अंद्राबी ने कहा, "कोई आदेश नहीं है। कहीं भी कोई आदेश नहीं है।"
उन्होंने दोहराया कि समाज में फैली बुराइयों को दूर करने के लिए धार्मिक विद्वानों ने आपस में चर्चा की है और वे अपनी समझ के अनुसार तय करेंगे कि जुमे के उपदेश में किन विषयों को प्राथमिकता दी जाए। उनके अनुसार, इस पहल को सरकारी आदेश या धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप के रूप में पेश करना तथ्यों को गलत ढंग से प्रस्तुत करना है।
दरख्शां अंद्राबी ने सामाजिक समस्याओं का उल्लेख करते हुए कहा कि आज जम्मू-कश्मीर में युवाओं और परिवारों के सामने कई गंभीर चुनौतियां हैं। नशाखोरी, आत्महत्या, विवाह से जुड़ी परेशानियां, पारिवारिक तनाव और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर समाज के भीतर खुलकर चर्चा होना जरूरी है। उन्होंने कहा कि अगर समाज में नशे की समस्या गंभीर है, तो धार्मिक विद्वान अपने उपदेश में नशे के दुष्परिणामों पर बात कर सकते हैं। यदि बेटियों, विवाह से जुड़ी मुश्किलों या परिवारों की समस्याओं पर चर्चा की जरूरत महसूस होती है, तो उन विषयों को भी उठाया जा सकता है। आत्महत्या और मानसिक आघात के मामलों का जिक्र करते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर समाज के बच्चे ऐसी परिस्थितियों से क्यों गुजर रहे हैं और परिवारों में तनाव क्यों बढ़ रहा है। अंद्राबी का तर्क है कि धार्मिक उपदेश केवल इबादत और धार्मिक परंपराओं तक सीमित नहीं होने चाहिए, बल्कि समाज के सामने मौजूद वास्तविक समस्याओं के प्रति जागरूकता फैलाने में भी योगदान दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि समाज की समस्याओं को सबसे बेहतर तरीके से वही धार्मिक विद्वान समझ सकते हैं, जो लोगों के बीच रहते हैं और उनकी परेशानियों से परिचित हैं। इसलिए विषयों का चयन भी उन्हीं पर छोड़ दिया जाना चाहिए।
वक्फ बोर्ड की अध्यक्ष ने प्रस्तावित कोर कमेटी को लेकर भी सफाई दी। उन्होंने बताया कि इस समिति में धार्मिक विद्वान शामिल होंगे और वे स्वतंत्र रूप से सामाजिक तथा धार्मिक महत्व के मुद्दों पर विचार-विमर्श करेंगे। अंद्राबी के मुताबिक, वह स्वयं इस समिति की सदस्य नहीं होंगी और न ही उसके फैसलों में हस्तक्षेप करने का उनका कोई इरादा है। उन्होंने कहा कि धार्मिक मार्गदर्शन देना उनका काम नहीं है। वह स्वयं को धार्मिक शिक्षक नहीं मानतीं और इस विषय से जुड़े फैसले योग्य इस्लामिक विद्वानों पर ही छोड़ना चाहती हैं। उन्होंने धार्मिक विद्वानों की भूमिका की तुलना डॉक्टरों, इंजीनियरों और शिक्षकों से करते हुए कहा कि जिस तरह अलग-अलग पेशों से जुड़े लोग समाज की समस्याओं के समाधान में योगदान देते हैं, उसी तरह धार्मिक विद्वान भी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ जागरूकता फैलाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने राजनीतिक नेताओं से भी अपील की कि वे समाज में नशाखोरी, आत्महत्या और पारिवारिक तनाव जैसी समस्याओं पर ध्यान दें, न कि ऐसी पहल की आलोचना करें जिसका उद्देश्य इन चुनौतियों से निपटने के लिए जागरूकता बढ़ाना है।
इस विवाद ने उस समय और राजनीतिक रंग ले लिया, जब मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने वक्फ बोर्ड की अध्यक्ष पर भाजपा को खुश करने की कोशिश करने का आरोप लगाया। उमर अब्दुल्ला ने कहा कि भाजपा द्वारा नियुक्त अध्यक्ष को मुसलमानों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप की कोशिश बंद करनी चाहिए। इस आरोप पर पलटवार करते हुए दरख्शां अंद्राबी ने सवाल किया कि आखिर इस मामले में भाजपा ने हस्तक्षेप कहां किया है। उन्होंने कहा, "भाजपा ने कहां हस्तक्षेप किया? अगर मैं भाजपा की नेता हूं, तो मुझे गर्व होगा। आज मुझे गर्व महसूस होता है कि मैं भाजपा से हूं।"
उनके इस बयान ने विवाद को एक नया राजनीतिक आयाम दे दिया है। जहां उमर अब्दुल्ला इस पहल को भाजपा की कथित दखलंदाजी से जोड़ रहे हैं, वहीं अंद्राबी ने भाजपा से अपने जुड़ाव पर खुलकर गर्व जताते हुए हस्तक्षेप के आरोपों को चुनौती दी है।
पीडीपी प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी इस पहल पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा मुसलमानों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करना चाहती है और जम्मू-कश्मीर को अपनी नीतियों के परीक्षण की प्रयोगशाला बना रही है। महबूबा ने इस विवाद की तुलना समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर जारी बहस से करते हुए कहा कि धार्मिक मामलों में एकरूपता थोपने की कोशिश स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि जम्मू-कश्मीर में इमाम और मौलवी शुक्रवार को क्या उपदेश देंगे, यह तय करने का अधिकार किसी राजनीतिक नेतृत्व या बोर्ड को कैसे मिल सकता है। पीडीपी प्रमुख ने वक्फ बोर्ड को जम्मू-कश्मीर सरकार के अधीन सौंपने की मांग भी की। उनका कहना है कि यदि जुमे के खुतबे को लेकर कोई निर्णय करना है, तो मीरवाइज उमर फारूक के नेतृत्व वाले मुत्तहिदा मजलिस-ए-उलेमा जैसे धार्मिक संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण होनी चाहिए। महबूबा के आरोपों ने इस मुद्दे को धार्मिक स्वतंत्रता और राजनीतिक अधिकारों की बहस से जोड़ दिया है। हालांकि, दरख्शां अंद्राबी का कहना है कि धार्मिक उपदेशों के विषय तय करने का कोई आदेश जारी ही नहीं हुआ है।
मीरवाइज उमर फारूक के नेतृत्व वाले मुत्तहिदा मजलिस-ए-उलेमा (एमएमयू) ने भी इस मामले में कड़ा रुख अपनाया है। संगठन ने कहा कि किसी वैधानिक संस्था द्वारा मस्जिदों के मिंबर यानी उपदेश देने के स्थान से दिए जाने वाले भाषणों को तय या नियंत्रित करने का सुझाव भी अस्वीकार्य है। एमएमयू के मुताबिक, धार्मिक उपदेशों पर नियंत्रण का प्रयास धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक मामलों में स्वायत्तता के सिद्धांतों के खिलाफ होगा। संगठन ने स्पष्ट किया कि जम्मू-कश्मीर के मुसलमान इस तरह के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेंगे। इस विरोध के बाद विवाद का दायरा और व्यापक हो गया है। एक ओर वक्फ बोर्ड की अध्यक्ष किसी बाध्यकारी आदेश से इंकार कर रही हैं, तो दूसरी ओर राजनीतिक और धार्मिक नेता इस पहल को लेकर आशंकाएं जता रहे हैं।
बहरहाल, वक्फ बोर्ड की सफाई के बावजूद विवाद थमा नहीं है। कश्मीर की राजनीति गर्मा गई है और आने वाले दिनों में धार्मिक स्वायत्तता, सामाजिक सुधार तथा राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर यह बहस और तेज होने की संभावना है।