By नीरज कुमार दुबे | Sep 09, 2026
आतंकवादी कितनी भी धमकियां देते रहें, कश्मीर में अब उनकी दाल गलने वाली नहीं है। जिस डर के सहारे 1990 के दशक में कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़ने पर मजबूर किया गया था, उस दौर और आज के कश्मीर में जमीन-आसमान का फर्क है। मोदी सरकार के सुरक्षा तंत्र ने आतंकियों के लिए हालात कठिन किए हैं और अब जब बंदूक के दम पर दहशत फैलाना आसान नहीं रहा तो पाकिस्तान में बैठे उनके आकाओं और घाटी में सक्रिय आतंकी संगठनों की ओर से धमकी भरे पत्रों और निजी जानकारियां लीक करने जैसे हथकंडे अपनाए जा रहे हैं।
देखा जाये तो कश्मीरी पंडित समुदाय के लोगों के लिए यह महज एक नया खतरा नहीं है। 1990 के दशक में आतंकियों ने नामों की सूचियां दीवारों पर चिपकाकर और धमकियों के जरिए भय का माहौल बनाया था। फर्क सिर्फ इतना है कि तब इंटरनेट नहीं था, आज वही रणनीति डिजिटल माध्यमों के जरिए अपनाई जा रही है। कश्मीरी पंडित समुदाय की आवाज के रूप में सक्रिय सबा कौल ने इसे ‘‘बड़ा और चिंताजनक सुरक्षा संकट’’ बताते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय और जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल कार्यालय से कथित डेटा लीक की जांच की मांग की है। इससे पहले पीएम पैकेज कर्मचारी और एक्टिविस्ट राकेश हांडू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और जम्मू-कश्मीर पुलिस की साइबर क्राइम विंग को शिकायत देकर एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी। उनके मुताबिक 5 सितंबर के पत्र में गैर-स्थानीय कर्मचारियों को लिंग या पद की परवाह किए बिना निशाना बनाने की धमकी दी गई और ‘‘बॉडी बैग उनके मूल स्थानों पर भेजे जाएंगे’’ जैसी भयावह चेतावनी दी गई।
इसके अलावा, पीएम पैकेज की पृष्ठभूमि भी महत्वपूर्ण है। 2008 में केंद्र ने कश्मीरी प्रवासियों की वापसी और पुनर्वास के लिए 3,000 सरकारी नौकरियों वाला पैकेज घोषित किया था। 2015 में 3,000 और पद मंजूर किए गए, जिससे केंद्रीय वित्तपोषित पदों की संख्या 6,000 हुई। बावजूद इसके, आतंकी धमकियों में करीब 7,000 पंडित कर्मचारियों को निशाना बनाए जाने का दावा सामने आया है।
साथ ही सुरक्षा के साथ आवास का सवाल भी जुड़ा है। राकेश हांडू के मुताबिक करीब 6,000 पीएम पैकेज कर्मचारी वर्षों से घाटी में काम कर रहे हैं और कई किराये के मकानों में रहते हैं। जम्मू-कश्मीर में 6,042 ट्रांजिट क्वार्टर बनाए जाने के बावजूद कथित तौर पर करीब 800 ही आवंटित हुए हैं। कुछ आवासीय परिसरों की सुरक्षा, सड़क, जल निकासी, बाउंड्री और निर्माण पूरा होने को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। यानी ‘‘सामान्य स्थिति’’ का असली पैमाना केवल यह नहीं हो सकता कि बाजार खुले हैं या पर्यटक आ रहे हैं; असली कसौटी यह है कि जिस कश्मीरी पंडित को घाटी लौटाया गया है, क्या वह वहां सुरक्षित घर और सुरक्षित कार्यस्थल के भरोसे के साथ रह सकता है?
हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही अहम है। कश्मीर में हाल के दिनों में पर्यटन, सार्वजनिक गतिविधियों और अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में बढ़ोतरी हुई है। श्रीनगर में इस समय अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह का आयोजन चल रहा है और हाल ही में अमेरिकी राजदूत के कश्मीर दौरे ने भी सामान्य होते माहौल की तस्वीर पेश की थी। यही बदलता कश्मीर आतंकियों और पाकिस्तान में बैठे उनके आकाओं को सबसे ज्यादा खटकता है। जब बंदूकें वह भय पैदा नहीं कर पा रहीं जिसकी उन्हें तलाश है, तब धमकी पत्रों और साइबर माध्यमों से दहशत पैदा करने की कोशिश की जा रही है।
उधर, राजनीतिक मोर्चे पर भी विवाद तेज है। नेशनल कांफ्रेंस अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने इन धमकियों पर सवाल उठाते हुए इसे उपराज्यपाल प्रशासन की कथित साजिश तक बताया, जिस पर बीजेपी ने उन्हें आतंकवाद के प्रति नरम रुख रखने का आरोप लगाकर पलटवार किया। वहीं मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अपने पिता से अलग रुख अपनाते हुए धमकियों को गंभीरता से लेने और सुरक्षा एजेंसियों से स्रोत का पता लगाने की मांग की है।
बहरहाल, कश्मीरी पंडितों की सुरक्षित वापसी केवल नौकरी देने या मकान बनाने का प्रशासनिक लक्ष्य नहीं है। 2022 में राहुल भट की चाडूरा तहसील कार्यालय के भीतर हुई हत्या इस चुनौती की भयावह याद है। इसलिए आज की सबसे बड़ी परीक्षा यह है कि आतंकियों की धमकियों के बावजूद कश्मीरी पंडित घाटी में न केवल लौटें, बल्कि बिना डर के रह और काम भी कर सकें। आतंक का युग खत्म करने का दावा तभी पूरी तरह सार्थक होगा, जब धमकी देने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई के साथ हर लौटते परिवार को यह भरोसा भी मिले कि कश्मीर में उसका भविष्य सुरक्षित है।