क्या है विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग के स्थापना की कहानी? आक्रांताओं के आक्रमण के बाद भी बना रहा हिन्दुओं की आस्था का केंद्र

By प्रिया मिश्रा | May 18, 2022

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग देश के अलग-अलग हिस्से में स्थित हैं। ज्योतिर्लिंग का अर्थ है 'प्रकाश का स्तंभ'। 'स्तंभ' प्रतीक दर्शाता है कि कोई शुरुआत या अंत नहीं है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव स्वयं इन स्थानों पर प्रकट हुए थे. यही वजह है कि भक्तों के लिए इन ज्योतिर्लिंगों का विशेष महत्व है. ऐसा माना जाता है कि इन ज्योतिर्लिंगों के दर्शन-पूजन और नाम जपने मात्र से ही भक्तों के सभी पाप समाप्त हो जाते हैं। ज्योतिर्लिंग का अर्थ है 'प्रकाश का स्तंभ'। 'स्तंभ' प्रतीक दर्शाता है कि कोई शुरुआत या अंत नहीं है।


ज्योतिर्लिंग के पीछे की पौराणिक कथा 

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच इस बात पर बहस हो गई कि दोनों में सर्वोच्च देवता कौन है? इस पर भगवान शिव प्रकाश के स्तंभ के रूप में प्रकट हुए और दोनों से अंत खोजने के लिए कहा। लेकिन दोनों देवता ऐसा नहीं कर सके। ऐसा माना जाता है कि जिन स्थानों पर प्रकाश के ये स्तंभ गिरे थे, वहां ज्योतिर्लिंग स्थित हैं।


विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग कहाँ स्थित है?

भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से, विश्वेश्वर या विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग सबसे प्रसिद्ध है क्योंकि इसे दुनिया के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक माना जाता है। 'विश्वनाथ' का अर्थ है 'विश्व या ब्रह्मांड का शासक।' विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग भारत के उत्तर प्रदेश में वाराणसी में गंगा नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है। वाराणसी को पहले काशी कहा जाता था और इसलिए इस मंदिर को काशी विश्वनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है।


विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास

इस मंदिर का सबसे पहला उल्लेख पुराणों में मिलता है। इसे 1194 ईस्वी में कुतुब-उद-दीन-ऐबक द्वारा और फिर 1669 में मुगल सम्राट, औरंगजेब सहित अन्य आक्रमणकारियों द्वारा ध्वस्त कर दिया गया, जिन्होंने इसकी भूमि पर एक मस्जिद का निर्माण किया। इसे मुगल सम्राट अकबर के सेनापति राजा मान सिंह और उनके वित्त मंत्री राजा टोडर मल सहित विभिन्न शासकों द्वारा फिर से बनाया गया था। माना जाता है कि वर्तमान संरचना 1777 में इंदौर के मराठा शासक, रानी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा बनाई गई थी।


विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना

ऐसा माना जाता है कि माता पार्वती जी से विवाह करने के बाद भगवन शिव, कैलाश पर्वत आकर रहने लगे। लेकिन वहां पिता के घर में ही विवाहित जीवन बिताना पार्वती जी को अच्छा नहीं लग रहा था। उन्होंने एक दिन भगवान शिव से कहा कि आप मुझे अपने घर ले चलिए। आपसे विवाह होने के बाद भी मुझे अपने पिता के घर ही रहना पड़ता है। यहां रहना मुझे अच्छा नहीं लगता है। सभी लड़कियां शादी के बाद अपने पति के घर जाती हैं लेकिन मुझे अपने पिता के घर ही रहना पड़ रहा है। तब देवी पार्वती को खुश करने के लिए भगवान शिव ने राक्षस निकुंभ से काशी में अपने परिवार के लिए जगह बनाने का अनुरोध किया। माता पार्वती इस निवास से इतनी प्रसन्न हुईं कि उन्होंने सभी को भोजन कराया और इसीलिए उन्हें अन्नपूर्णी या अन्नपूर्णा के रूप में पूजा जाता है। माना जाता है कि भगवान शिव भी भोजन मांगते हुए उनके सामने एक भिक्षापात्र रखते हैं।


विश्वेश्वर मंदिर की खास बातें

माना जाता है कि विश्वेश्वर मंदिर की गर्भगृह के केंद्र में एक चांदी की वेदी पर ज्योतिर्लिंग है। यहाँ विष्णु, विनायक, कालभैरव और शनेश्वर जैसे अन्य देवताओं के मंदिर हैं। मंदिर के अंदर एक कुआं है, जिसे ज्ञान कुआं या ज्ञानवापी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि जब मुगल मंदिर को नष्ट करने आए थे तब लिंग यहां छिपा हुआ था। 1835 में महाराजा रणजीत सिंह द्वारा दान किए गए सोने के साथ शिखर को चढ़ाया गया था। चूंकि इसके तीन गुंबद सोने से मढ़े हुए हैं, पर्यटक इसे 'वाराणसी का स्वर्ण मंदिर' कहते हैं।

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