कद के छोटे लेकिन फौलादी इरादों के धनी थे Lal Bahadur Shastri, 58 साल बाद भी रहस्य बनी हुई है उनकी मौत

By अंकित सिंह | Jan 11, 2024

देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जिक्र जब भी होता है तो उनके साधारण जीवन और मजबूत इरादों की बात जरूर की जाती है। छोटे से कार्यकाल में ही उन्होंने देश को नई दिशा देने की कोशिश की। साथ ही साथ देश के मजबूत चट्टानी फौलाद को भी दुश्मन देश के सामने प्रस्तुत किया। हालांकि, स्वतंत्र भारत के दूसरे प्रधानमंत्री का निधन आज भी रहस्य बना हुआ है। निधन के लगभग 58 वर्ष बाद भी इस रहस्य से पर्दा नहीं हट सका है। छोटे कद वाले मगर विशाल व्यक्तित्व के धनी लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु को भले ही उस वक्त सामान्य घोषित कर दिया गया हो, मगर आज भी इसे सामान्य तौर पर स्वीकार नहीं किया जाता। उस वक्त उनके परिजनों ने तो हत्या की बात तक कह दी थी। 


परिवार ने जाहिर की थी शंका

हालांकि, जितनी मुंह उतनी बातें। लाल बहादुर शास्त्री के निधन को लेकर तरह-तरह की बातें कही जाती हैं। दरअसल, पाकिस्तान के साथ 1965 की जंग को खत्म करने के मकसद से एक समझौता पत्र हस्ताक्षर करने के लिए लाल बहादुर शास्त्री ताशकंद गए हुए थे। समझौते के महज 12 घंटे के बाद 11 जनवरी की मध्य रात्रि में 1:32 पर उनकी अचानक मौत हो जाती है। शास्त्री जी की मौत ने पूरे देश को शोक में डाल दिया था। लाल बहादुर शास्त्री की पत्नी ललिता शास्त्री ने दावा किया था कि उनके पति को जहर देकर मारा गया है। इतना ही नहीं, उनके बेटे सुनील शास्त्री ने सवाल उठाया था कि उनके पिता का शरीर नीला क्यों था? 

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समझौते से खुश नहीं थे

कहा तो यह भी जाता है कि समझौते को लेकर शास्त्री जी खुश नहीं थे। वह परेशान होकर अपने कमरे में टहलते हुए देखे गए थे। उस रात वह काफी असहज दिखाई दे रहे थे। लाल बहादुर शास्त्री के साथ उनके सूचना अधिकारी कुलदीप नैयर भी ताशकंद में थे। कुलदीप नैयर ने भी शास्त्री जी की मौत को लेकर शक व्यक्त किया था। हैरान करने वाली बात यह भी है कि भारत सरकार ने शास्त्री जी की मौत पर जांच के लिए जिस समिति का गठन किया था, उसमें उनके निजी डॉक्टर रहे आरएन सिंह और निजी सहायक रामनाथ की भी अलग-अलग हादसों में मौत हो गई। यह दोनों लोग शास्त्री जी के साथ ताशकंद में मौजूद थे। यही कारण है कि शास्त्री जी की मौत को लेकर आशंकाएं लगातार जताई जाती है।


पत्नी को देनी पड़ी थी अनशन की धमकी

वह लाल बहादुर शास्त्री ही थे जिनकी प्रेरणा से भारत की सेना लाहौर के करीब पहुंच गई थी। मगर अमेरिका तथा रूस की हस्तक्षेप के बाद युद्ध को रोकना पड़ा था। शास्त्री जी ने तब जय जवान जय किसान का नारा दिया था। एक बात यह भी है कि लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं। इंदिरा गांधी चाहती थीं कि लाल बहादुर शास्त्री का अंतिम संस्कार उनके घरेलू शहर इलाहाबाद में हो। हालांकि, लाल बहादुर शास्त्री का परिवार इसके लिए तैयार नहीं था। शास्त्री का अंतिम संस्कार दिल्ली में किए जाने की मांग को लेकर इंदिरा गांधी के रवैये से नाराज लाल बहादुर शास्त्री की पत्नी ललिता शास्त्री ने आमरण अनशन करने की धमकी दे दी थी। इसी के बाद इंदिरा गांधी को झुकना पड़ा और राजघाट के इलाके में शास्त्री का अंतिम संस्कार किया गया। दावा तो यह भी किया जाता है कि इंदिरा गांधी शास्त्री की समाधि पर जय जवान, जय किसान लिखा जाए या नहीं इसको लेकर असमंजस में थीं। हालांकि, ललिता शास्त्री ने आग्रह किया था कि उनके पति की समाधि पर उस नारे को लिखा जाए जो शास्त्री ने 1965 की लड़ाई के दौरान दिया था। यह नारा था- जय जवान, जय किसान। 


एक परिचय

वर्ष 1964 में प्रधानमंत्री बनने से पहले लाल बहादुर शास्त्री विदेश मंत्री, गृहमंत्री और रेल मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद संभाल चुके थे। ईमानदार छवि और सादगीपूर्ण जीवन जीने वाले लाल बहादुर शास्त्री नैतिकता की मिसाल थे। उन्हें भारतीय राजनैतिक जीवन में शुद्धता, मूल्यों, आदर्श की एवं सिद्धांतों पर अडिग रहकर न झुकने, न समझौता करने के आदर्श को जीने वाले महानायक के रूप में देखा जाता है। लालबहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को मुगलसराय (वाराणसी) में एक कायस्थ परिवार में मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव के यहाँ हुआ था। उनकी माँ का नाम रामदुलारी था। परिवार में सबसे छोटा होने के कारण बालक लालबहादुर को परिवार वाले प्यार में नन्हें कहकर ही बुलाया करते थे। भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान शास्त्रीजी 9 साल तक जेल में रहे थे। असहयोग आंदोलन के लिए पहली बार वह 17 साल की उम्र में जेल गए, लेकिन बालिग ना होने की वजह से उन्हें छोड़ दिया गया था। 


1928 में उनका विवाह मिर्जापुर निवासी गणेशप्रसाद की पुत्री ललिता से हुआ। ललिता शास्त्री से उनके छः सन्तानें हुईं, दो पुत्रियाँ-कुसुम व सुमन और चार पुत्र-हरिकृष्ण, अनिल, सुनील व अशोक। संस्कृत भाषा में स्नातक स्तर तक की शिक्षा समाप्त करने के पश्चात् वे भारत सेवक संघ से जुड़ गये और देशसेवा का व्रत लेते हुए यहीं से अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत की। शास्त्रीजी सच्चे गांधीवादी थे जिन्होंने अपना सारा जीवन सादगी से बिताया और उसे गरीबों की सेवा में लगाया। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के सभी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों व आन्दोलनों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही। जवाहरलाल नेहरू के देहावसान के बाद साफ सुथरी छवि के कारण शास्त्रीजी को 1964 में देश का प्रधानमंत्री बनाया गया।

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