देश की स्वतंत्रता के लिए प्राणों की आहुति दे दी थी लाला लाजपत राय ने

By शिवकुमार शर्मा | Nov 17, 2022

किसी भी व्यक्ति के द्वारा स्वयं के लिए किए गए कार्यों का समापन भी व्यक्ति के संसार से विदा लेने के साथ ही हो जाता है, परंतु उसके द्वारा समाज के लिए किए गए त्याग, समर्पण, बलिदान और सामाजिक योगदान उसे अमर बनाते हैं। भारत की आजादी की जंग में अंग्रेज सरकार से जूझने वाले सेनानियों में लाल, बाल, पाल का नाम अग्रगण्य है। यह बताना प्रासंगिक होगा कि लाला लाजपतराय का जन्म अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत में हुआ जो अब पाकिस्तान में है, बाल गंगाधर तिलक का जन्म महाराष्ट्र के रत्नागिरि में एवं बिपिन चंद्र पाल का जन्म अविभाजित भारत के हबीबगंज सदर उप जिला अंतर्गत हुआ था जो अब बांग्लादेश में है। इस प्रकार लाल, बाल, पाल तीनों नाम एक साथ होने पर किन्हीं तीन व्यक्तियों के एक साथ होने मात्र की जानकारी ही नहीं देते अपितु तत्कालीन अखंड भारत का बोध कराते हैं।

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उन्होंने यंग इंडिया, दुखी भारत, भारत पर इंग्लैंड का कर्ज, आर्य समाज, भारत का राजनीतिक भविष्य, भगवत गीता का संदेश, भारत की राष्ट्रीय शिक्षा की समस्या और संयुक्त राज्य अमेरिका एक हिंदू प्रभाव आदि पुस्तकों के साथ मैजिनी, गैरीबाल्डी, शिवाजी और श्रीकृष्ण की जीवनियाँ लिखीं। आर्य समाज में शामिल हुए, समाचार पत्र "आर्य गजट" के संस्थापक और संपादक बने। वे हिंदू समाज में जाति व्यवस्था और छुआछूत को समाप्त करने के हिमायती थे तथा निचली जातियों के लोगों को वेदऔर मंत्र पढ़ने के अधिकार के पक्षधर थे। माँ क्षय रोग से पीड़ित थीं इसलिए आम जनता के मुफ्त इलाज की व्यवस्था हेतु गुलाब देवी चेस्ट हॉस्पिटल खोला जो वर्तमान में गुलाब देवी मेमोरियल अस्पताल के नाम से पाकिस्तान के सबसे बड़े अस्पतालों में से एक है। वे भारत की पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करने वाले नेताओं में से एक थे। उनकी क्रांतिकारी लेखनी और ओजस्वी वाणी दोनों उनके प्रभाव का विस्तार किया। 

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किसान आंदोलन का समर्थन करने के कारण फिरंगी सरकार ने 1907 में बर्मा की मांडले जेल में भेज दिया। लॉर्ड मिंटो सबूत पेश नहीं कर पाया तो उसी वर्ष वापस स्वदेश आ गए। वे अमेरिका गए,वहां उन्होंने इंडियन होम रूल लीग, मसिक पत्रिका यंग इंडिया तथा हिंदुस्तान सूचना सेवा संघ की स्थापना की। भारत आकर सक्रिय राजनीति में भाग लिया, उन्हें पंजाब केसरी का संबोधन मिला। उनका मानना था कि "जीत की ओर बढ़ने के लिए हार और असफलता कभी-कभी आवश्यक घटक होते हैं"। जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद अंग्रेजों के विरुद्ध प्रदर्शन किया असहयोग आंदोलन का पंजाब में नेतृत्व किया जिसके फलस्वरूप 1921 से 1923 के बीच लाला जी को जेल में डाल दिया गया। साइमन कमीशन का विरोध किया तो अंग्रेजों ने आंदोलनकारियों पर क्रूरतापूर्वक लाठियां बरसाई। लालाजी बुरी तरह से घायल हो गए, उन्होंने कहा "मैं घोषणा करता हूं कि आज मुझ पर हुआ हमला भारत में ब्रिटिश शासन के ताबूत मेंआखिरी कील साबित होगा" 17 नवंबर 1928 को भारत माँ के सपूत ने देश की स्वतंत्रता के लिए प्राणों की आहुति दे दी। उनका बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। श्रद्धावनत हो हम पुण्य स्मरण करते हैं।

- शिवकुमार शर्मा

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