आतंकवादियों की गोलियों के साथ ही प्रकृति के प्रकोप से भी लड़ते हैं जवान, 2 वीरों की शहादत पर देश गमगीन

By नीरज कुमार दुबे | Oct 11, 2025

जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के कोकरनाग क्षेत्र में आतंकवाद विरोधी अभियान के दौरान लापता हुए भारतीय सेना के दो वीर सैनिकों के शव बरामद कर लिए गए हैं। दोनों सैनिक— लांस हवलदार पलाश घोष और लांस नायक सुजय घोष इस सप्ताह के आरंभ में अहलान गडोले वन क्षेत्र में गश्ती अभियान के दौरान खराब मौसम की चपेट में आ गए थे। सेना ने बताया कि गुरुवार को एक सैनिक का शव बरामद किया गया था, जबकि दूसरे का शव शुक्रवार को मिला।

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सेना ने जवानों की खोज के लिए हवाई और जमीनी टीमें तैनात की थीं। चिनार कोर ने बताया कि बचाव अभियान में हेलीकॉप्टरों की सहायता ली गई, लेकिन ऊँचाई वाले बर्फीले इलाके में मौसम की स्थिति ने तलाशी को अत्यंत कठिन बना दिया था। सेना की श्रीनगर स्थित 15 चिनार कोर इकाई ने एक्स पर एक भावनात्मक संदेश साझा करते हुए कहा, “चिनार कोर, कोकरनाग के किश्तवाड़ रेंज में अत्यधिक मौसम की स्थिति से जूझते हुए अथक आतंकवाद विरोधी अभियान चलाते हुए बहादुर लांस हवलदार पलाश घोष और लांस नायक सुजय घोष के सर्वोच्च बलिदान का सम्मान करता है। उनका साहस और समर्पण हमें हमेशा प्रेरित करता रहेगा।”

इस बीच, जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने भी दोनों सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा, “देश इन वीरों के बलिदान को कभी नहीं भूलेगा। वे हमारे सीमाओं की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले सच्चे नायक हैं।” सेना ने दोनों शहीदों के परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि “हम शोक संतप्त परिवारों के साथ खड़े हैं और उनकी भलाई के लिए प्रतिबद्ध हैं।”

हम आपको बता दें कि बीते कुछ दिनों में घाटी में तापमान में तेज गिरावट दर्ज की गई है। सोमवार के बाद से ऊँचाई वाले क्षेत्रों में हुई ताजा बर्फबारी के चलते तापमान में लगभग 10 डिग्री सेल्सियस तक की कमी आई है, जिससे सैनिकों को अभियान चलाने में अतिरिक्त चुनौतियाँ झेलनी पड़ रही हैं। इन दोनों सैनिकों का बलिदान इस बात की याद दिलाता है कि आतंकवाद विरोधी अभियानों में दुश्मन केवल गोलियाँ नहीं, बल्कि कठोर प्रकृति भी हो सकती है।

देखा जाये तो लांस हवलदार पलाश घोष और लांस नायक सुजय घोष की शहादत केवल दो सैनिकों की मृत्यु की खबर नहीं है— यह उन अनगिनत अनाम बलिदानों का प्रतीक है जो देश की सीमाओं पर प्रतिदिन होते हैं। जब हम “आतंकवाद विरोधी अभियान” कहते हैं, तो हमारे मन में प्रायः दुश्मन के साथ मुठभेड़ की तस्वीर उभरती है, परंतु कोकरनाग की यह घटना बताती है कि कभी-कभी सबसे बड़ा शत्रु प्रकृति स्वयं होती है।

भारतीय सेना के जवान न केवल आतंकियों से लड़ते हैं, बल्कि बर्फ़, अंधे तूफानों और शून्य से नीचे तापमान से भी जूझते हैं। ऐसे अभियानों में उनका साहस और अनुशासन ही उन्हें जीवित रखता है। परंतु यह भी स्पष्ट है कि अत्यधिक मौसम में अभियान की तैयारी, संचार प्रणाली और आपात राहत व्यवस्था को और सशक्त करने की आवश्यकता है। तकनीकी उपकरणों और मौसम निगरानी प्रणालियों को इस प्रकार के अभियानों में अधिक प्रभावी ढंग से एकीकृत किया जाना चाहिए।

इन शहीदों का बलिदान हमें यह सोचने पर भी मजबूर करता है कि क्या हम उनके परिवारों को पर्याप्त सहयोग, सुरक्षा और सम्मान प्रदान कर रहे हैं? देश की सुरक्षा के लिए जान देने वाले सैनिकों का ऋण कोई चुका नहीं सकता, परंतु उनकी विरासत को सम्मानपूर्वक संरक्षित रखना ही राष्ट्र की सच्ची श्रद्धांजलि होगी। कोकरनाग के पहाड़ों में गिरी यह बर्फ़ हमारे वीरों की यही कहानी कहेगी कि भारत के सिपाही न केवल गोलियों से, बल्कि प्रकृति के प्रकोप से भी लड़ते हैं, और हर बार विजेता वही होता है जिसे हम “भारतीय सैनिक” कहते हैं।

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