By नीरज कुमार दुबे | Oct 19, 2026
पाकिस्तान में भारत के खिलाफ आतंक की साजिश रचने वाले नेटवर्क को एक और बड़ा झटका लगा है। लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक सदस्यों में शामिल और आतंकी सरगना हाफिज सईद के करीबी चौधरी मोहम्मद सरवर उर्फ अबू हाशिम की लाहौर में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। अमेरिका उसे वैश्विक आतंकवादी घोषित कर चुका था। सरवर आतंकी संगठन के लिए पैसा जुटाने और उसके वित्तीय नेटवर्क को चलाने में अहम भूमिका निभाता था। उसकी मौत ने पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी तंत्र के भीतर हलचल बढ़ा दी है। हालांकि, उसकी मौत की असली वजह अभी साफ नहीं है, लेकिन भारत के दुश्मनों के लिए इतना संदेश जरूर है कि आतंक का साम्राज्य खड़ा करना आसान हो सकता है, मगर उसके अंजाम से बचना मुश्किल है। सरवर की मौत के बारे में सवाल उठ रहा है कि वह नशे की हालत में होने की वजह से खुद गिर कर मरा या उसे किसी ने धक्का दिया?
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हम आपको बता दें कि सरवर का लश्कर-ए-तैयबा से संबंध 2000 के शुरुआती वर्षों से बताया जाता है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, वह लंबे समय तक लाहौर में संगठन के नेतृत्व की भूमिका में रहा और जनवरी 2015 तक वह लश्कर का लाहौर प्रमुख यानी अमीर था। वह आतंकी संगठन के सरगना हाफिज सईद और वर्तमान उपप्रमुख सैफुल्लाह कसूरी का करीबी सहयोगी भी था। सरवर की भूमिका केवल संगठनात्मक गतिविधियों तक सीमित नहीं थी। अमेरिकी वित्त विभाग के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (ओएफएसी) ने 2016 में उसे और लश्कर के एक अन्य वरिष्ठ नेता शाहिद महमूद को विशेष रूप से नामित वैश्विक आतंकवादी घोषित किया था। अमेरिकी कार्रवाई का उद्देश्य संगठन की फंडिंग और उसे आर्थिक मदद पहुंचाने वाले नेटवर्क को बाधित करना था। इसके तहत अमेरिकी अधिकार क्षेत्र में आने वाली उनकी संपत्तियों और संपत्ति संबंधी हितों को अवरुद्ध करने की कार्रवाई की गई थी।
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, सरवर लश्कर के लिए धन जुटाने और उसे एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने में सीधे तौर पर शामिल था। वह पाकिस्तान की औपचारिक वित्तीय व्यवस्था का इस्तेमाल कर संगठन के लिए रकम जुटाता और स्थानांतरित करता था। वर्ष 2008 में उसने कारोबारियों के प्रतिनिधिमंडलों को लश्कर के ठिकानों तक ले जाकर चंदा जुटाने की गतिविधियों में भूमिका निभाई थी। 2009 के मध्य तक वह लाहौर में संगठन की वित्तीय शाखा का नेतृत्व करने वाले दो प्रमुख अधिकारियों में शामिल था।
अमेरिकी वित्त विभाग के अनुसार, सरवर के संबंध लश्कर के शीर्ष नेताओं से थे। वर्ष 2012 से 2013 के दौरान उसने संगठन के विदेश मामलों के प्रमुख हाफिज अब्दुल रहमान मक्की के साथ काम किया था। 2013 की शुरुआत में मक्की ने पाकिस्तान के भीतर अपनी यात्रा के खर्च के लिए सरवर से धन मांगा था। मक्की को भी नवंबर 2010 में अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में रखा गया था।
इसके अलावा, हाल के वर्षों में सरवर पंजाब प्रांत में पीएमएमएल की आड़ में संगठन की वित्तीय गतिविधियों और धन जुटाने के प्रयासों को संभाल रहा था। पीएमएमएल को हाफिज सईद के जमात-उद-दावा से जुड़ा राजनीतिक संगठन माना जाता है। सईद 2019 से लाहौर की कोट लखपत जेल में आतंकवाद के वित्तपोषण से जुड़े मामलों में दोषसिद्धि के बाद सजा काट रहा है। यह घटनाक्रम उस सवाल को फिर सामने लाता है कि आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करते समय उनके राजनीतिक और वित्तीय नेटवर्क को किस हद तक प्रभावी ढंग से निष्क्रिय किया जा सकता है।
हम आपको यह भी बता दें कि सरवर की मौत से कुछ महीने पहले उसके बेटे की भी सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। उसके निधन पर पीएमएमएल के नेताओं खालिद मसूद सिंधू, सैफुल्लाह कसूरी, हाफिज तलहा सईद, याकूब शेख, खालिद नईक गुज्जर और मुजम्मिल इकबाल हाशमी ने शोक जताया। मुजम्मिल इकबाल हाशमी ने उसे पार्टी का मजबूत और निडर नेता बताया। सरवर का अंतिम संस्कार रविवार देर रात लाहौर के चुबुर्जी इलाके में स्थित जमात-उद-दावा के मुख्यालय जामिया अल-कादसिया में किया गया।
देखा जाये तो सरवर की मौत को भारत के खिलाफ सक्रिय आतंकी नेटवर्क के संदर्भ में एक अहम घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, इससे लश्कर-ए-तैयबा का पूरा नेटवर्क खत्म हो गया है, ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। सरवर की संदिग्ध मौत के पीछे क्या परिस्थितियां थीं, इसका जवाब जांच से ही सामने आएगा। लेकिन एक बात साफ है कि भारत के खिलाफ आतंक की साजिश रचने वालों और उन्हें संरक्षण देने वाले तंत्र का खात्मा शुरू हो चुका है। जो लोग आतंक को हथियार बनाकर भारत की सुरक्षा से खिलवाड़ करते हैं, उन्हें कानून और सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई का सामना करना ही होगा।