नेता जी के नहाने का साबुन (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Mar 19, 2025

बात उन दिनों की है जब नेता जी चुनावी दौरे पर थे और जनता के बीच जाकर आत्मीयता दिखाने का नाटक कर रहे थे। "भाइयों और बहनों!"—नेता जी के इस उद्घोष से जनता में एकाएक ऊर्जा आ जाती, ठीक वैसे ही जैसे पुराने ट्रांजिस्टर में नया सेल डालने से आवाज़ तेज़ हो जाती है। वे गाँव की पगडंडियों पर चलते, गरीबों के घरों में बैठते, वहाँ की रोटी तोड़ते और फोटो खिंचवाकर मीडिया में अपनी सादगी की ब्रांडिंग करवाते। पर इस बार किस्सा कुछ अलग था। नेता जी को इस बार किसी गरीब के घर में रुकना पड़ा और सुबह नहाने के लिए साबुन की तलाश करने लगे। अब गाँव के घरों में साबुन कहाँ मिलता? एक बच्चे ने उन्हें कपड़े धोने वाला नीला टुकड़ा लाकर दे दिया। नेता जी उसे देखकर हक्के-बक्के रह गए। "अरे भई, ये कौन सा विदेशी ब्रांड है?"

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किस्सा यहीं खत्म नहीं हुआ। जैसे-तैसे साबुन को अपने शरीर पर आज़माने की कोशिश की, तो लगा मानो ज़िंदगी के सारे पाप धुलने की बजाय चिपक गए हों। अब नेता जी की त्वचा में जलन होने लगी, जैसे किसी ने मिर्ची पाउडर मिला दिया हो। “हे राम! ये साबुन बना है कि लोहा चमकाने वाला केमिकल?” नेता जी बाथरूम से निकलते ही सीधे पानी की टंकी के नीचे बैठ गए और वहाँ से चिल्लाए, "भइयो, मुझे तो लग रहा है कि तुम लोग इसी साबुन से बैलगाड़ी के पहिए चमकाते हो!" गाँव के लोग हँसने लगे, मगर कोई बोलता क्यों नहीं कि साबुन दरअसल उनकी कड़ी मेहनत का परिणाम है?

अब गाँव के सरपंच से रहा नहीं गया। उन्होंने कहा, "नेता जी, हमारी ज़िंदगी का असली रंग यही है! यह साबुन हमारी असली मेहनत की तरह है—कठोर, सख्त और झाग रहित! आप इसे महसूस कर रहे हैं, लेकिन हम इसे हर दिन जीते हैं।" नेता जी को पहली बार एहसास हुआ कि इस चुनावी दौरे का असली सबक यह नहीं कि वे कितने सरल दिख सकते हैं, बल्कि यह कि आम जनता की ज़िंदगी कितनी कठिन है। लेकिन, यह सोचकर ही उन्होंने अपने आसपास देखा, कहीं कोई पत्रकार तो नहीं?

साबुन के झटके से उबरते ही उन्होंने तुरंत अपना विदेशी ब्रांड वाला साबुन मँगवाया और कहा, "भाई, कुछ भी कहो, लेकिन चुनावी प्रचार के चक्कर में जान भी दांव पर नहीं लगानी चाहिए!" तभी गाँव का एक बुज़ुर्ग बोला, "बेटा, जो साबुन हमारी गरीबी नहीं धो पाया, वो तुम्हारी चालाकी क्या खाक धोएगा?" नेता जी चुप हो गए।

लेकिन यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती। नेता जी की पार्टी के कार्यकर्ताओं ने तुरंत घोषणा कर दी कि गाँव वालों के लिए मुफ्त साबुन योजना लाई जाएगी। अगले ही दिन ट्रक भर-भरकर चमचमाते साबुन बाँटे जाने लगे। लेकिन मज़ेदार बात यह थी कि वो सब साबुन वहीं के लोगों ने शहर में जाकर बनवाए थे, उसी नेता जी के चुनावी चंदे से!

तो, भाइयों और बहनों! कहानी की सीख यह है कि नेता जी का नहाने का साबुन बदल सकता है, पर जनता का पसीना आज भी वैसे ही बहता है। और वैसे भी, सियासत का असली साबुन तो वो होता है, जो वादों की मैल को आसानी से धो सके, मगर अफसोस! ऐसा कोई साबुन अब तक बना ही नहीं!

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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