तीन तलाक से महिलाओं को मुक्ति पर कट्टरपंथी हुए नाराज, उदारवादियों ने साधी चुप्पी

By अजय कुमार | Aug 01, 2019

एक बार में तीन बार तलाक−तलाक−तलाक (तलाक−ए−बिद्दत) कह कर किसी महिला की जिंदगी बर्बाद कर देने की 14 सौ साल पुरानी कुप्रथा अब इतिहास के पन्नों में सिमट गई है। तलाक−ए−बिद्दत को दोनों सदनों से पास कर दिया गया है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होते ही यह कानून बन गया है। कोई माँ−बाप या भाई−बहन नहीं चाहते हैं कि उनकी बहन−बेटी कभी तलाक−ए−बिद्दत का शिकार हो, लेकिन बात जब घर से बाहर निकल कर मुल्ला−मौलवियों और पुरूष प्रधान समाज की 'चौखट' पर पहुंचती है तो तलाक−ए−बिद्दत को गैर कानूनी बनाने वाले कानून की मुखालफत शुरू हो जाती है और फिर फैसला मोदी सरकार द्वारा लिया गया हो तो विरोध की वजह और भी मजबूत हो जाती है। वर्ना किसी पुरूष को यह अधिकार नहीं है कि वह ख्वातिनों के साथ सदियों से हो रही नाइंसाफी को जायज ठहराने की हिमाकत कर सके। यही वजह है कि तलाक−ए−बिद्दत को लेकर मुस्लिम समाज के कुछ रूढ़िवादी मानसिकता वाले कुछ पुरूष (जो अपने आप को मुस्लिम समाज का ठेकेदार समझते हैं) अभी भी इस कानून में रोड़ा डालने का सपना पाले बैठे हैं। इसमें ऑल इंडिया पसर्नल लॉ बोर्ड सहित तमाम मुल्ला−मौलवी शामिल हैं। यही वजह है एक तरफ तलाक−ए−बिद्दत को गैरकानूनी अपराध घोषित किए जाने का जहां मुस्लिम महिलाओं और तीन तलाक पीड़िताएं जश्न मना रही हैं, वहीं तमाम मौलाना इसे राजनीति से प्रेरित बता कर बिल को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की जुगत भिड़ा रहे हैं। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सलन लॉ बोर्ड ने जिस दिन तीन तलाक बिल पास किया, उस दिन को लोकतंत्र का काला दिन करार दिया।

बात विरोध के सुरों की कि जाए तो ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सचिव जफरयाब जिलानी ने तो राज्यसभा में बिल पास होते ही तुरंत विरोध में मोर्चा संभाल लिया। तंज भरे लहजे में उन्होंने कहा कि तीन तलाक बिल पास होना ही था। केंद्र की भाजपा सरकार अपने तय एजेंडे पर काम कर रही है। जिलानी साफ कहते हैं ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड अपने स्टैंड पर कायम है। बिल को चुनौती देने के लिए बोर्ड सुप्रीम कोर्ट जाएगा। जल्द ही बोर्ड बैठक कर अपनी आगे की रणनीति तय करेगा। जिलानी की तरह ही ऑल इंडिया इमाम काउंसिल के महासचिव मौलाना सुफियान निजामी भी अपनी बात आगे बढ़ा रहे हैं। वह कहते हैं कि लोकतंत्र में सभी को अपनी बात कहने का हक है। संसद में जिसका बहुमत होता है, उसी की जीत होती है। लिहाजा एक संवैधानिक तरीके से बिल पास हुआ है। राज्यसभा में बिल पास करवाने में उन पार्टियों का योगदान है, जिन्होंने राज्यसभा से वॉकआउट किया।

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उधर, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने बिना लाग−लपेट के तीन तलाक बिल को राजनीति से प्रेरित बताया। उनको लगता है कि मौजूदा बिल मुस्लिम महिलाओं को राहत देने के बजाय नुकसान पहुंचाने वाला है। फरंगी महली कहते हैं कि तीन तलाक पर रोक की मांग कर रही महिलाओं व अन्य संगठनों ने बिल पर एतराज जताकर उसमें बदलाव की मांग की थी, लेकिन केंद्र सरकार ने उनकी मांगों की अनदेखी की। यह लोकतंत्र के लिए सही नहीं है।

तत्काल तीन तलाक को गैर कानूनी बनाए जाने पर सहारनपुर स्थित दारूल उलूम ने यह कहते हुए चुप्पी साध ली कि इस पर उनका कोई नया रुख नहीं है। कोई भी कानून शरीयत से बड़ा नहीं है। दारूल उलूम के मोहतमिम मुफ्ती अबुल कासिम नौमानी ने कहा कि दारूल उलूम अपने पुराने स्टैंड पर कायम है। इस पर नया बोलने को कुछ नहीं है। बता दें कि तीन तलाक बिल को दारूल उलूम कानून के रास्ते से शरीयत में दखलअंदाजी करार देता रहा है। दारूल उलूम वक्फ के शेखुल हदीस और तंजीम उलमा−ए−हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अहमद खिजर शाह मसूदी ने तीन तलाक बिल पास होने का विरोध किया है। खिजर ने कहा कि सरकार दीनी मामलों में हस्तक्षेप कर रही है। उन्होंने कहा कि शरीयत के खिलाफ किसी बिल का समर्थन नहीं किया जाएगा। जमीयत दावतुल मुसलिमीन के संरक्षक मौलाना कारी इसहाक गोरा ने कहा कि तीन तलाक पर कानून बनाना सरासर इस्लाम और शरीयत में हस्तक्षेप है।

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राष्ट्रीय सुन्नी उलमा काउंसिल के अध्यक्ष मुफ्ती इंतेजार अहमद कादरी का कहना है कि तीन तलाक का कानून शरीयत पर सीधा हमला है। तलाक जैसी गंदगी और सजा से बचने के लिए केवल जागरूकता का ही एक रास्ता है। मुसलमान अपने मसले घर में सुलझाएं। कोर्ट−कचहरी और पुलिस थानों से बचें, यही शरीयत का पैगाम है। बरेली के नबीरे आला हजरत के मौलाना तसलीम रजा खां ने कहा कि उनका बहुमत है, वह कुछ भी कर सकते हैं। शरई कानून न बदला जा सकता है न उससे ऊपर कुछ है। कानून से कोई फर्क नहीं पड़ता।

लब्बोलुआब यह है कि तीन तलाक बिल पास होने को लेकर मुस्लिम समाज के पुरूष और महिलाएं बंटी हुई हैं। इसका सियासी फायदा आने वाले दिनों में मोदी सरकार को मिल सकता है। वैसे, भी लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद कुछ राजनैतिक पंडित कह रहे थे कि मोदी की शानदार जीत में मुस्लिम महिलाओं का भी बड़ा योगदान रहा था। दुख की बात यह है कि तीन तलाक बिल पास होने से खुश मुस्लिम महिलाओं को उन मुस्लिम पुरूषों का भी साथ नहीं मिल रहा है जो अपने आप को उदारवादी−बुद्धिजीवी वगैरह कहते हैं। अभी तक यह समाज महिलाओं के पक्ष में नहीं आया है।

-अजय कुमार

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